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हाथ से सीट न खिसक जाये, इसलिए महागठबंधन के फेवर में नहीं हैं कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता

NITESH OJHA
Ranchi : कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और झारखंड राज्य के सहप्रभारी उमंग सिंघार ने न्यूज विंग को दिये एक इंटरव्यू में यह तो स्पष्ट कर ही दिया कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं. साथ ही महागठबंधन में शामिल होकर पार्टी निश्चित तौर पर संगठनात्मक रूप से मजबूत हो रही है. लेकिन महागठबंधन की राजनीति को देखते हुए राज्यस्तरीय कुछ वरिष्ठ नेताओं को डर सता रहा है कि सीटों के बंटवारे के लिए अपनाये फॉर्मूला के बाद कहीं उनके हाथ से उनकी ही सीट खिसक न जायें. ऐसे में क्या वे नेता प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार के क्रियाकलापों का बहाना बनाकर महागठबंधन में पार्टी को नहीं जाने देने की चाहत रख रहे हैं या इसके पीछे उनकी अपनी निजी मंशा छिपी हुई है.

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बैठक में शामिल नहीं हुए थे राज्य के कई वरिष्ठ नेता

मालूम हो कि पार्टी के इन नेताओं ने तो दबे स्वर में यहां तक पार्टी आलाकमान को संकेत दे दिया है कि वे प्रदेश अध्यक्ष से खुश नहीं हैं. इसकी पुष्टि शनिवार को प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह द्वारा दिल्ली में हुई बैठक में राज्य के कई नेताओं के शामिल नहीं होने से भी हो जाती है. इस बैठक में पूर्व मंत्री सुबोधकांत सहाय, ददई दुबे, राजेंद्र सिंह, मन्नान मल्लिक, केएन त्रिपाठी, मनोज यादव शामिल नहीं हुए थे. बैठक में शामिल नहीं हुए इन नेताओं का कथित रूप से कहना है कि जिस तरह से प्रदेश अध्यक्ष ने हेमंत सोरेन को अभी से विपक्ष का नेता मान लिया है, इससे तो पार्टी में दिये उनके योगदान को आज नजरअंदाज किया जा रहा है. 

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वोट बैंक नहीं होने से महागठबंधन है जरूरी

हेमंत सोरेन के पूर्व के क्रियाकलाप पर पार्टी के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा संशय करने के सवाल पर नाम न जाहिर करने की शर्त पर कांग्रेस के ही एक पुराने नेता ने न्यूज विंग को बताया कि झामुमो के पास आज भी अपना एक वोट बैंक है. लेकिन राज्य की राजनीति में कांग्रेस पार्टी के पास अपना कोई वोट बैंक नहीं बचा है. पहले भी पार्टी आलाकमान ने सामान्य जाति के कई नेताओं को महत्वपूर्ण पद दिया था, लेकिन उसके बावजूद राज्य में आज पार्टी की स्थिति यह है कि सामान्य जाति का वोट बैंक एक तरह से खत्म हो चुका है. 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को राज्य की 14 सीटों में एक भी सीट हासिल नहीं हो सकी. वहीं, विधानसभा चुनाव में पार्टी केवल छह सीटों तक ही सीमित रह गयी थी. दूसरी ओर झामुमो की सीटों की संख्या को देखा जाये, तो विधानसभा चुनाव में उसे कुल 19 और लोकसभा चुनाव में कुल दो सीटों पर जीत मिली थी. ऐसे में कांग्रेस के लिए अपनी जमीनी स्थिति को मजबूत करना जरूरी है. 

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पार्टी को फिर से जिंदा करने के लिए महागठबंधन जरूरी

उन्होंने बताया कि पार्टी को फिर से जिंदा करने के लिए पार्टी आलाकमान को भी यही लगता है कि महागठबंधन में आने से ही पार्टी फिर से सत्ता में आयेगी. इससे विपक्ष सहित पार्टी के युवाओं में एक उत्साह का संचार होगा. इससे आनेवाले दिनों में पार्टी महागठबंधन में मजबूती के साथ खड़ा हो सकती है. अगर ऐसा नहीं होता है, तो कहीं न कहीं इसका फायदा भाजपा को ही होगा.

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हाथ से सीट न खिसक जाये, इसका है डर

इस नेता ने यह भी बताया कि प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार से नाराज चलनेवाले नेता उनपर यही आरोप लगाते हैं कि वह झामुमो का साथ देते हैं, लेकिन अगर उनसे व्यक्तिगत सवाल किया जाये कि क्या वे महागठबंधन में जाकर चुनाव लड़ने को तैयार हैं, तो उनका भी यही कहना होगा कि वे तैयार हैं. दरअसल उक्त नेताओं और प्रदेश अध्यक्ष के बीच लड़ाई इस बात को लेकर कतई नहीं है कि महागठबंधन को क्यों बनाया जायेगा, डर तो उन्हें केवल इसी बात का है कि ऐसा होने से उनकी ही सीट खतरे में आ सकती है. 

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पहले के चुनावों में पार्टी उठा चुकी है नुकसान

उन्होंने कहा कि पहले भी पार्टी आलाकमान ने अपने कुछ वरिष्ठ नेताओं के कहने पर राज्य की कुल 81 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये थे. लेकिन चुनाव के बाद पार्टी की क्या स्थिति है, यह किसी से छिपी नहीं रही. हटिया विधानसभा क्षेत्र में तो कांग्रेस पार्टी की स्थिति पांचवें स्थान पर आ गयी थी. ऐसे में अगर पार्टी महागठबंधन में शामिल न होकर चुनाव लड़ती है, तो उसका सत्ता में आना नामुमकिन है. यह बात पार्टी आलाकमान को भी पता है.

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