Opinion

पूंजीवाद का खोखलापन और आर्थिक सुधारों का नाटक

Faisal Anurag

क्या आर्थिक सुधार वास्तव में भारत को बेरोजगारी, भूख, गैरबराबरी से मुक्ति दिलाने की ताकत रखते हैं? यह सवाल बेहद अहम इसलिए है कि इन दिनों देश में सुधारों को लेकर बहस जारी है और कोयला सेक्टर के सुधारों के साथ तमाम सेक्टरों में किये जा रहे सुधारों के समर्थन में माहौल बनाया जा रहा है.

आर्थिक सुधारों को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि यह अतीत की गलत नीतियों से न केवल मुक्त करेगा बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण  होगा. यह भी तर्क दिया जा रहा है कि भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार की असमानताओं को भी दूर करने में सफल होगा.

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इन तर्कों के बावजूद कुछ वैश्विक अनुभव हैं जो कुछ और भी संकेत देते हैं. पूंजीवादी मॉडल अपने बचाव के लिए जिन उपायों को अपना रहा है उसमें आर्थिक सुधारों पर जोर है. इसमें दुनिया जिस तरह कॉरपोरेट ताकतों की गिरफ्त में जा रही है उसके भी कुछ सबक हैं.

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अमरीका में बर्नी सैंडर्स और ब्रिटेन में लेबर नेता जर्मी कोर्बिन ने दुनिया में जिस तेजी के साथ पूंजीवादी मॉडल की नाकामियों को उजागर किया है उससे वे तमाम सत्ताधारी परेशान हैं जो कारपोरेट हितों के अनुकूल इकोनॉमी को ढालना चाहते हैं. अमरीका में जिस तरह पूंजीवाद और आर्थिक सुधारों के दुष्परिणामों को लेकर चर्चा हो रही है और ब्रिटेन में निजीकरण के बोझ को उतार फेंकने के उदाहरण मिलने लगे हैं उससे फ्रांस सहित दुनिया के अनेक देशों में खलबली है. खास कर मजदूरों और किसानों के आंदोलनों ने उन नेताओं को चकित कर दिया है जो पूंजीवाद के पैरोकार हैं.

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सोवियत संघ के पतन के बाद का यह दौर बता रहा है कि दुनिया पिछले 40 सालों के तमाम आर्थिक प्रयोगों के बावजूद असमानता के जाल से उबर नहीं पायी है. अर्थशास्त्री थामस पिकेटी के मशहूर असमानता अध्ययन ने दुनिया में बहस खडी कर दी है कि इस आर्थिक निजाम में असमानओं में लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है और दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं की पोल तो कोविड-19 ने ही खोल दी है.

अरब व मध्यपूर्व के देशों में कच्चे तेल के दामों की गिरावट ने जो हालात बना दिये हैं उसमें पहली बार उन देशों में भी बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है. दुनिया के अधिकांश उन्नत देशों में तो बेरोजगारी और आर्थिक समानता खतरे की सीमा तक पहुंच चुकी है. अमरीका का ब्लैक लाइब्स मूववेंट केवल नस्लभेद के खात्मे तक की मांग नहीं कर रहा बल्कि वह आर्थिक असमानताओं वाली व्यव्स्था के खिलाफ भी आक्रोश व्यक्त कर रहा है. इस आंदोलन का असर यूरोप पर भी देखा जा सकता है.

भारत ने  1950 के बाद जिस मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव डाली थी वह 1990 के बाद के ग्लोबलाइजेशन के दोर में कमजोर हो गयी. जिन लोगों ने ग्लोबलाइजेशन में इतिहास का अंत देख पूंजीवाद की स्थायी जीत का एलान किया था वे ही अब कह रहे हैं कि ग्लोबलाइजेशन ने दुनिया में प्रतिस्पर्धा के समान प्लेटफॉर्म का सृजन नहीं किया. इसमें फुकोयाम भी शामिल होने लगे हैं जिनके विचारों ने 90 के दशक में धूम मचा दी थी. हॉवर्ड बिजनेस रिव्यू जैसी पूंजीवाद समर्थक पत्रिका को भी लिखना पडा है The World Is Still Not Flat. इसी शीर्षक से किताबें भी छपी हैं.

आखिर वे कौन से अनुभव हैं जो अब ग्लाबलाइजेशन का शोकगान गा रहे हैं और मुक्त व्यापार के माहौल को देशों के हितों के अनुकूल खारिज किया जाने लगा है. तमाम उन्नत या उन्नत होने का सपना पालने वाले देश अपने देश को प्राथमिकता बता कर उन तमाम वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं से पीछे हट रहे हैं जो कि विश्व व्यापार संगठन की बुनियाद है.

यदि अमरीका फर्स्ट के नारों को प्राथ्रमिकता दी जा रही है तो साफ है कि विश्व श्रम के स्वतंत्र आवागमन को बाधित तो किया ही जा रहा है, उत्पादों के लिए बाजार को भी सीमित किया जा रहा है. यह अपने आप में बताता है कि तमाम आर्थिक सुधारों के बावजूद देशों के भीतर असंतोष है और एक खास तरह का वर्गसंघर्ष आकार ले रहा है.

यदि अतीत की नीतियों को बोझ मान कर उन्हें उतार फेंकने की बात भारत में की जा रही है तो इसके निहितार्थ को भी समझने की जरूरत है. वास्तविकता तो यह है कि भारत ने आजादी के बाद प्रगति की है और उसकी प्रगति में प्राइवेट सेक्टर की तुलना में पब्लिक सेक्टर ने ही बड़ी भूमिका निभायी है. चूंकि प्राइवेट सेक्टर खुद में वह ताकत नहीं रखता कि वह किसी भी देश में लोगों की आर्थिक जरूरतों के अनुरूप विकास का हिस्सेदार बने और और अपने मुनाफे में हिस्सेदारी आमलोगों के साथ साझा करे. इस सूत्र को समझना जरूरी है.

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भारत के कोर सेक्टरों ने सरकारी क्षेत्र में रह कर ही चमत्कार किया है और भारत की विकास दर भी बडी भूमिका निभायी है. नुकसान झेल कर भी उसने नागरिकों के हितों का उल्लंघन नहीं किया है. लेकिन बाजार पर कब्जा की प्रतिस्पर्धा में खड़ी कॉरपोरोट ताकतों की निगाह उनके संसाधनों पर है. आर्थिक सुधारों का नया दौर उन तमाम अनुभवों को नकार कर खडा है जो एक बोझ के तौर पर नागरिकों के लिए सवाल बना हुआ है.

सुधारों के पक्षकारों को भारत की जमीनी सच्चाइयों के बारे में भी बताना चाहिए. भारत जैसे विविधता वाले देश के लिए आर्थिक सुधारों का दौर कितनी खुशहाली पैदा कर सकेगा और समाजिक आर्थिक असमानताओं का निदान कर सकेगा इस पर भी फोकस करना चाहिए. सरकारों का जनकल्याण की नीतियों से पीछे जाना बताता है कि राह आसान नहीं है. नेहरू ने भी आत्मनिभ्रर भारत का सपना जमीन पर उतारने का प्रसास करते हुए सरकारी क्षेत्र पर जोर दिया था.

जाहिर है कि आर्थिेक सुधार से उन तमाम असमानताओं को दूर करने की राह शायद ही निकले जो समान वितरण पर जोर दिये बगैर खत्म नहीं की जा सकतीं. इसके साथ रोजगार को लेकर वंचित तबको को मिली संवैधानिक गारंटी का भविष्य क्या होगा इसे भी देखे जाने की जरूरत है. इस तथ्य को भी समझा जाना चाहिए कि किसी एक देश का अनुभव दूसरे देश के लिए सीखने का विषय तो हो सकता है लेकिन उस पर पूरी तरह अमल कर देने भर से देश की वास्तविक समस्याओं का हल नहीं निकाला जा सकता है. यदि दुनिया में समाजवाद के प्रयोग कामयाब नहीं हुए हैं तो पूंजीवाद के भी नहीं.

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