
Shrinivas
आठ अक्टूबर लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की पुण्यतिथि थी. 1979 को इसी दिन उनका निधन हुआ था. यह देश, समाज के लिए अपूरणीय क्षति तो थी ही, उनके द्वारा स्थापित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के सदस्यों के लिए विशेष शोक का अवसर था, जिससे मैं भी जुड़ा था. इसलिए यह संस्मरण थोड़ा निजी भी है. इसलिए भी कि निधन के ठीक पहले छह अक्तूबर की रात मुझे उनकी सेवा में रहने का अवसर मिला, जो मेरे लिए एक अविस्मरणीय रात बन गयी.
तब जेपी की सेहत अच्छी नहीं थी. उनकी सेहत तो इमरजेंसी में जेल में रहने के दौरान ही खराब हो गयी थी. आरोप यह भी लगा कि जानबूझ कर उनकी सेहत को बिगड़ने दिया गया. हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है; न अब उस पर चर्चा करने की कोई जरूरत है. पर यह तो तथ्य है ही कि 1976 मे जेल से निकलने के बाद मुंबई के जसलोक अस्पताल में उनका गहन इलाज हुआ. हर दो दिन पर उनका रक्त शुद्ध कर पुनः चढ़ाया जाता था. प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने डायलिसिस मशीन के लिए एक लाख रुपये की सरकारी सहायता भेजी थी. जिसे जेपी ने विनम्रतापूर्वक यह कहते हुए वापस कर दिया था कि जन सहयोग से इसके लिए पर्याप्त राशि जमा हो चुकी है.
फिर वे पटना लौटे. तब भी उनको विशेष देखभाल की जरूरत थी. सो, उनके सचिव सचिदा बाबू के कहने पर वाहिनी का एक साथी हर रात जेपी की सेवा में रहता था. संयोग से छह की रात मेरी पारी थी. मैं तैयार होकर रात नौ बजे महिला चरखा समिति पहुंच गया. मैं रोमांचित था. अपने नायक सेनानायक के साथ, उनके इतने पास रहने, उनकी सेवा का अवसर मिलने को लेकर. पर घबराहट भी थी कि कहीं कोई चूक न हो जाये. सचिदा बाबू ने जरूरी निर्देश दे दिया- कि मुझे जेपी के कमरे में एक कुर्सी पर सजग होकर बैठे रहना है. जेपी इशारे से पानी मांग सकते हैं. या पाउडर को हाथ पर मलने का इशारा कर सकते है. बस मुझे सतर्क रहना है. कोई विशेष जरूरत हो, तो बगल के कमरे से नर्स या डॉक्टर को बुला लेना है.
रात तनाव में, पर आराम से कट गयी. एक बार उन्होंने पानी मांगा. एक बार पाउडर मलने का इशारा किया. पांच बजे के करीब नर्स ने आकर इशारा किया, मैं बाहर आ गया. मैंने चैन की सांस ली. तब यह नहीं मालूम था कि मैं जेपी का अंतिम बार दर्शन कर रहा हूं. पर बाद में इसी बात को संतोष के साथ याद करता रहा हूं.
हालांकि अगले दो दिनों का अनुभव और भी रोमांचक और यादगार है.
उसी दिन, यानी सात अक्तूबर ’79 को संघर्ष वाहिनी के अनेक साथियों के साथ मैं आठ को शुरू हो रही वाहिनी की राष्ट्रीय परिषद में शामिल होने मुजफ्फरपुर पहुंच गया. मेरा परिवार मुजफ्फरपुर में था, सो मैं डेरे पर ठहरा. कुछ और साथी भी. तब मुजफ्फरपुर में टीवी/दूरदर्शन तो पहुंच चुका था, अपने घर भी था. लेकिन उसके कार्यक्रम शाम पांच बजे ही शुरू होते थे. आठ तारीख की सुबह आठ बजे रेडियो पर वह मनहूस खबर- जेपी नहीं रहे- सुन कर हम स्तब्ध रह गए. जो जहां था, तत्काल पटना की ओर चल पड़ा.
अखबारों से मालूम हो चुका था कि जेपी के शव को श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में रखा गया है. हमारे पहुंचने तक हॉल और सामने के गांधी मैदान में भीड़ बढ़ती जा रही थी. संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ता भीड़ संभालने के काम में लगे हुए थे. देश भर के ख़ास लोगों का तांता लगा हुआ था. बाहर जो भी परिचित मिलता, एक बार अन्दर आकर अंतिम दर्शन कराने की गुहार करता. ऐसे नौजवान भी खुद को संघर्ष वाहिनी का बता कर वाहिनी के बैच की माग करते जिन्हें हम पहचानते भी नहीं थे. केन्द्रीय मंत्रियों (तब चरण सिंह की सरकार थी) और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के आने पर हलचल बढ़ जाती. उनके साथ की भीड़ अनुशासन तोड़ कर भीतर घुसना चाहती. तब वाहिनी के साथियों ने संयम और दृढ़ता का अद्भुत परिचय दिया. इंदिरा गांधी भी आयीं, पर संजय गांधी के आने पर खुद वाहिनी के कुछ साथी उत्तेजित हो गए थे, जिनको शांत कर दिया गया.
नौ अक्टूबर को शव यात्रा के लिए सेना की गाड़ी आ गयी. हमें यह अच्छा नहीं लगा, पर हम विवश थे. हम वाहिनी के साथियों ने बाजाप्ता गणवेश में अपने नायक को अंतिम सलामी दी और आगे की कार्रवाई की कमान सरकारी नुमाइंदों ने संभाल ली.
शव वाहन के साथ, आगे-पीछे युवाओं का हुजूम चल रहा था. लेकिन मैं वहीं से अकेला वाहिनी कार्यालय वापस लौट गया. तेज भूख लग रही थी. लोहानीपुर के पास एक फुटपाथी होटल में खाने बैठ गया. उधर रडियो पर बांस घाट पर हो रही अंत्येष्ठी विवरण सुनायी पड़ रहा था. जेपी के भतीजे ने मुखाग्नि दी. इतना सुनने के बाद खाना मुश्किल हो गया और मैं पैसे देकर दुकान से निकल गया.




