Opinion

डॉक्टरों की पीड़ा और सोशल डिस्टेंसिंग को समझे बिना हम कोरोना का सामना नहीं कर सकते

Faisal Anurag

जब कोई डॉक्टर निराशा में बोले मेरी कब्र पर मास्क पहुंचा देना, तो इस वक्तव्य की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था ओर वैश्विक आर्थिक ताकत का दावा करने वाले अनेक देशों की तरह भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की लाचारगी सामने आ रही है. अमरीका जैसे देश का राजनीतिक नेतृत्व कह रहा है कि अमरीका का संकट बेहद गहरा है.

जबकि कई अन्य देशों में नोवल कोरोना से लड़ने की प्रवृति बेहद लचर दिख रही है. यह हताशा का समय नहीं है. लेकिन अपनी कमियों को गंभीरता से लेने और युद्ध स्तर पर तत्वरित कदम उठा कर स्वसथ्य व्यवस्था को दुरूस्त करने का भी समय है.

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चीन ने नोबल कोरोना का मुकाबला इसी रणनीति से किया है. कुछ ही समय में अस्पताल बना कर बताया कि बहुत कुछ किया जा सकता है. सिंगापुर और दक्षिण कोरिया के अनुभव भी बहुत प्रेरक हैं. जिन्होंने बिना लॉकडाउन के ही अपने-अपने देशों में कोरोना पर रोकथाम के कारगर कदम उठाये हैं.

दुनिया के अनेक उदाहरण बताते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं को सरकार के नियंत्रण और दायित्व से बाहर करना किसी आपदा में कितना घातक हो सकता है. स्पेन इसका उदाहरण है जहां अंतत: सरकार को सख्त कदम उठाते हुए नेशनलाइजेशन करना पड़ा है. अमरीका और ब्रिटेन में भी यह मांग बढ़ रही है.

इस भयावह त्रासदी के बीच एक और बड़ा संकट दुनिया महसूस कर रही है. और वह है कि बड़े व पूंजीवादी देश में कोई किसी की मदद नहीं कर रहा है. इटली को बहुत मिन्नत के बाद यूरोपियन यूनियन से मामूली आर्थिक मदद मिली है. और समाजवादी देश क्यूबा जो हमेशा इटली के निशाने पर रहा है.

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और अमरीका सहित कई देशों के आर्थिक प्रतिबंध का लंबे समय से शिकार है- ने अपने डाक्टरों की एक बड़ी टीम इटली भेजी है. वह भी उस इलाके में जो सबसे ज्यादा प्रभावित और आर्थिक समृद्धि के लिए लिए जाना जाता है. जहां मिलान जैसा शहर है और विश्व हेरिटेज का सबसे समृद्ध केंद्र है. लोबांर्डी प्रांत इस समय बुरी तरह नोबल कोरोना से ग्रस्त है.

कयूबा के नेता फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा कहा करते थे कि वे ऐसे डाक्टरों का निर्माण चाहते हैं जो केवल देश ही नहीं, बल्कि मानवता की सेवा करे. भारी आर्थिक प्रतिबंध के बावजूद क्यूबा के चमत्कार के पीछे के राजनीतिक परिदृश्य और इक्छा शकित को समझा जाना चाहिए.

जब कि दूसरी ओर भारत के एक महिला डॉक्टर की यह पीड़ा बहुत कुछ बता देती है “एन95 मास्क और दस्ताने आ जाएं तो कृपया उन्हें मेरी कब्र पर भेज देना. ताली और थाली भी बजा देना वहां! सादर, निराश सरकारी डॉक्टर.”

हरियाणा की एक डॉक्टर कामना कक्कड़ ने करीब 16 घंटे पहले प्रधानमंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और हरियाणा के मंत्री अनिल विज को टैग करते हुए यह ट्वीट किया है. इसके बाद उन्होंने लगातार कई ट्वीट किये. इस पर कोई संतोषजनक जवाब दिया गया हो, हमें नहीं पता है.

इधर दिल्ली में एम्स तक के डॉक्टर कह रहे हैं कि हमारे पास अपनी सुरक्षा के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. डॉक्टर आदर्श प्रताप ने बताया है कि ‘कई वार्डों में पीपीई उपकरण जैसे कि गाउन, मास्क, सूट और दस्ताने वगैरह की कमी है.’

कृष्णकांत कहते हैं, इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है. इसलिए कुछ लोग डॉक्टर कामना को भी ट्रोल कर रहे हैं. वे सफाई दे रही हैं कि मुझे सिर्फ हमारे डॉक्टरों और मरीजों की फिक्र है. यह जरूरी सवाल हैं. लेकिन कहा जा रहा है कि निगेटीविटी मत फैलाइये.

नोबेल कोरोना से लड़ने के दो मॉडल हैं. एक दक्षिण कोरिया और सिंगापुर का. और एक चीन और इटली का. भारत को विश्व स्वास्थ्य संगठन में निर्देश के अनुसार ज्यादा से ज्यादा टेस्ट कर इस ओर कदम उठाने का कार्यभार है. लॉकडाउन के साथ इस कदम को उठाने की सलाह तमाम विशेषज्ञ दे रहे हैं.

भारत में टेस्ट की गति बेहद धीमी है. और कीट्स की कमी भी इससे तुरंत निजात की सलाह डॉक्टर्स और वैज्ञानिक दे रहे हैं.

एक अन्य बड़ी समस्या को मशहूर लेखक बिरेंद्र यादव कुछ इस तरह लिख रहे हैं, यह सचमुच बड़ी विडंबना है कि भारतीय समाज वर्ण और जाति व्यवस्था द्वारा पोषित जिस सोशल डिसटेंसिंग को मनुष्य विरोधी मानकर उससे मुक्त होने का अभियान चला रहा था, वही सोशल डिस्टेंसिंग अब जान बचाने का साधन बन रही है.

इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव लंबे समय में समाजघाती होने की आशंका से मुक्त नहीं हैं. डार्विनवाद का सिद्धान्त ‘समर्थ ही बचेगा’ अपनी समस्त कुरुपता के साथ पलक बिछाए हुए है. यह समय है कि हम रोजमर्रा की आमदनी पर जीवन बिताने वाले असमर्थ व बेसहारा लोगों को भी अपनी चिंता में शामिल करें. कहने की जरूरत नहीं कि सोशल डिस्टेंसिंग का अर्थ सोशल एपैथी (सामाजिक उदासीनता) तो नहीं ही होना चाहिए.

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