Opinion

प्रवासी मजदूरों की परेशानियों की अनदेखी का मामला अंतरराष्ट्रीय फलक पर बन रहा है गंभीर मुद्दा

Faisal Anurag

मजदूरों के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है. इसके पहले स्वत: संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य सुविधाओं पर गुजरात सरकार के खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट कड़ी प्रतिक्रिया दे चुका है. श्रम कानूनों में बदलाव के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय लेबर आर्गेनाइजेशन ने भी केंद्र सरकार को पत्र लिख कर आइएलओ कन्वेंशन का पालन करने को कहा है.

इससे जाहिर होता है कि सरकारों ने जिस तरह श्रमिकों के सवाल को निपटाने का रास्ता अपनाया है, उसे ले कर बेचैनी है. श्रमिकों के लिए चलाये जा रहे श्रमिक स्पेशल ट्रेन के रास्ता भटकने का मामला भी सामान्य नहीं है.

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रेल मंत्रालय की कार्यशैली पर यह स्वयं एक बड़ा सवाल है. 28 मई को सुप्रीम कोर्ट श्रमिकों के मामले पर फिर सुनवाई करेगा.

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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण, संजय किशन कौल, एमआर शाह की बेंच ने देश भर में अलग-अलग जगहों में फंसे प्रवासी मजदूरों की समस्याओं के लिए स्वतः संज्ञान लिया है. कहा है कि अख़बारों और तमाम मीडिया रिपोर्ट्स लगातार प्रवासी मजदूरों की अत्यंत ख़राब स्थिति दिखा रहे हैं. वो साइकिल से, पैदल और तमाम अन्य साधनों से लंबे सफ़र तय कर रहे हैं.

प्रवासी मजदूरों के द्वारा ये भी शिकायत की जा रही है कि वो जहां से भी जा रहे हैं वहां का प्रशासन भोजन और पानी देने में असमर्थ है. आज जब वर्तमान समय में देशव्यापी लॉकडाउन चल रहा है, तो इस समय समाज के इस हिस्से को सरकार द्वारा सहायता की सबसे ज्यादा ज़रूरत है.

केंद्र सरकार, राज्य सरकार और अन्य यूनियन टेरिटरीज द्वारा इस मुश्किल समय में इन लोगों के लिए अत्यधिक मदद की ज़रूरत है.

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कोर्ट ने कहा कि उसको लगातार इन प्रवासी श्रमिकों की ओर से भी अपीलें प्राप्त हो रही हैं. कोर्ट ने कहा, “इन प्रवासी मजदूरों को होने वाली समस्याओं को लेकर हमें कई पत्र भी प्राप्त हुए हैं. प्रवासी मजदूरों को अभी भी तमाम समस्याएं आ रही हैं. वो सड़कों पर, रेलवे स्टेशन पर और राज्य की सीमाओं पर फंसे हुए हैं.

केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकार इन्हें तुरंत उचित भोजन, रुकने की जगह और यातायात की सुविधाएं मुहैया कराएं. हालांकि भारत सरकार और राज्य सरकारें इनकी मदद कर रही हैं. लकिन अभी भी ये कदम अपर्याप्त हैं. और इनमें कई खामियां हैं. इन समस्याओं से निपटने के लिए प्रभावी क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है.

केंद्र और राज्य सरकारों के साथ संघ शासित राज्यों को 28 मई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. देखना है कि सरकारें किस तरह का जवाब दाखिल करती हैं. क्योंकि जो वीडियो वायरल हैं वे श्रमिकों की अंतहीन पीड़ा को बयान करने वाले हैं. विश्व मीडिया में श्रमिकों की बदहाली की रिपोर्टे भरी पड़ी है. भारत जैसे देश की जो तस्वीर इन रिपोर्टों से उभर रही है, वह भारत की छवि को प्रभावित कर रही है.

लेकिन जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ही कह रहा है कि सरकारों के प्रयास नाकाफी हैं. भारत की अर्थव्यवस्था बिल्कुल डगामगा रही है. ऐसे हालात में वर्क फोर्स जिस त्रासदी से गुजर रहा है, उसके गंभीर परिणाम भी सामने आ सकते हैं.

भारत ने आखिर अपने मजूदरों के प्रति जिस तरह की बेरूखी दिखायी है, इससे जाहिर होता है कि भारत का समाज गहरे रूप से विभाजित है. एक ओर गांवों के लोगों ने श्रमिकों को खाना पानी दे कर जिस तरह मानवीयता का प्रदर्शन किया, मध्यवर्ग उसमें विफल साबित हुआ है.

ऐसा लगता है कि मध्यवर्ग के सपने बदल गए हैं. और वह इन श्रमिकों से अपने को अलग समझता है. कोविड 19 ने जिस तरह के सामाजिक बदलाव की नींव डाली है, उसके और भी अमानवीय नतीजे आने की संभावना जानकार जता रहे हैं. मीडिया का बड़ा तबका भी श्रमिकों के सवाल को लेकर मुखर नही हुआ है.

आमतौर पर यह प्रवृति उभर कर सामने आ रही है कि सरकार को आलोचना से परे माना जा रहा है. जो लोकतंत्र के लिए घातक है. वीडैम की ताजा रिपोर्ट में भारत के लोकतंत्र को संकट के कगार पर बताया गया है.

आइएलओ के पत्र को ले कर दिल्ली की परेशानी बढ़ी है. बावजूद श्रम सुधार के नाम पर मजदूरों के छीने जा रहे अधिकारों को ले कर केंद्र कोई चिंता जाहिर नहीं कर रहा है. जब कि आइएलओ स्पष्ट कह रहा है कि भारत आइएलओ कन्वेंशन का हस्ताक्षरी है. और अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हट सकता है.

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