Opinion

भारत की इकोनॉमी हर रोज शून्य से नीचे नयी गहराइयों में गोता लगा रही है!

Soumitra Roy

इस साल जीडीपी में -5% तक गिरावट की आशंका ही काफ़ी नहीं थी कि दो दिन पहले केअर रेटिंग ने इसके -6.4% तक गिरने का अनुमान जताया है.

केअर का कहना है कि अनलॉक के बाद भी देश के उत्पादन क्षेत्र का दो-तिहाई हिस्सा 50-70% के बीच ही काम कर पा रहा है. होटल, ट्रैवल जैसे कई उद्योग अभी खुले भी नहीं हैं.

केअर ने यह भी कहा कि इस साल बम्पर कृषि उत्पादन से भी किसानों को राहत नहीं मिलने वाली, क्योंकि ज़रूरत से ज्यादा सप्लाई कीमतें कम करेंगी.

ग्रामीण तबके की जेब में पैसा नहीं होगा, तो वे खर्च भी नहीं करेंगे. निर्माण, खनन और बिजली क्षेत्र में अगले साल -9.5% की ग्रोथ का अनुमान है.

सेवा क्षेत्र में अनुमानित -6.5% ग्रोथ से नौकरियां घटेंगी और तनख्वाह कम होने से लोग त्योहारों में भी कम खर्च करेंगे.

दूसरी तरफ भारतीय बैंकों की स्थिति भी खस्ता होती चली जा रही है.

भारतीय बैंकों को कंगाल होने से बचाने के लिए सरकार की ओर से फौरन 15 अरब डॉलर (लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये) की सहायता की जरुरत बतायी जा रही है.

अगर भारत में कोरोना की स्थिति लंबे समय तक बिगड़ी रही और लोगों की माली हालत खराब रही तो वे पैसे के लिए बैंकों पर निर्भर रहेंगे.

उस समय बैंकों को 58 अरब डॉलर (करीब 7 लाख करोड़ रुपये) की फिर ज़रूरत होगी.

रेटिंग एजेंसी फिच का अनुमान है कि बैंकों की माली हालत का असल में पता इस साल दिसंबर में लगेगा.

जैसा की आशंका है, अगले साल कुछ बड़े बैंकों के डूबने का खतरा है, क्योंकि उनके NPA की स्थिति 14% तक बढ़ सकती है.

फिच के मुताबिक, सरकारी के मुकाबले निजी बैंकों की स्थिति बेहतर है. फिच ने अपनी रिपोर्ट में भारत की अगले वित्त वर्ष में विकास दर का अनुमान 9.5% से 8% कर दिया था.

अप्रैल-मई में सरकार को 33,850 करोड़ का राजस्व मिला, जबकि कुल खर्च 5.12 लाख करोड़ का रहा. इस तरह वित्तीय घाटा 4.66 लाख करोड़ तक पहुंच गया है. जो कि बजट लक्ष्य का 59% है.

अभी साल खत्म होने में करीब 6 माह बाकी हैं. कोरोना सिर पर जमा है और बगल में जंग का खतरा मंडरा रहा है.

डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं.

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