Opinion

सुशांत के बहाने: महामारी बनती आत्महत्या

Faisal  Anurag

सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड के बाद एक बार फिर से आत्महत्या की वजहों को लेकर भारत में बहस छिड़ गयी है. सोशल मीडिया से लेकर टेलिविजन और अखबारों के पन्ने इससे पटे रहे. हालांकि इससे पहले भी कई बार ये मुद्दा उठा और इसपर जोरदार बहस भी हुई. लेकिन अभी भी इसका कोई हल नहीं निकाला सका. आत्महत्या एक महामारी की तरह अपने पैर पसारता जा रहा है.

सिर्फ पिछले चार महीनों के आंकड़े की भयावहता और त्रासदी का अहसास करा देते हैं. जिससे जाहिर होता है कि भारत मानसिक बीमारी की गिरफ्त में कैद होता जा रहा है. एक स्टडी के अनुसार,  भारत में प्रति 10 लाख पर बीते कुछ वर्षों में आत्महत्या की घटनाएं एक लाख से बढ़कर 1.33 लाख तक पहुंच गयी है. लॉकडाउन के बाद यह आंकड़ा 1. 36 तक बढ़ने की बात की जा रही है.

एनसीआरबी के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर स्टडी में कहा गया है 2017 की तुलना में 2018 में आत्महत्या से मरने वालों की संख्या में 1.3 प्रतिशत ना सिर्फ इजाफा हुआ बल्कि 2019 में वह बढ़कर 1.39 प्रतिशत दर्ज हुआ है. 2020 में तो इसकी तस्वीर स्याह दिख रही है खासकर लॉकडाउन के बाद उपजे हालातों में.

इस स्टडी रिपोर्ट को दिल्ली के विशेषज्ञों ने तैयार किया है, जो मेंटल हेल्थ से जुडे हुए हैं. यह स्पष्ट करता है कि भारत में आत्महत्याओं की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है. आज भी मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाले सकल खर्च ही कम हैं, जबकि पश्चिम के देशों में इसके लिए सरकार भारी संसाधन और धन मुहैया कराती है.

रांची से प्रकाशित एक दैनिक की खबर के अनुसार,  झारखंड में आत्महत्या एक भयावह त्रासदी बन गयी है. जहां प्रत्येक साढ़े चार घंटे पर एक व्यक्ति के आत्महत्या की घटना प्रकाश में आती है. इस खबर के अनुसार, झारखंड में अप्रैल के बाद से अब तक 449 लोगों ने आत्महत्या की है. यह एक भयावह आंकड़ा है.

कोविड-19 के कारण झारखंड में अब तक 15 लोगों की ही मुत्यु हुई है. दोनों की तुलना बताती है कि कोविड-19 का असर संक्रमित नहीं हुए लोगों पर भी पड़ा है. बेरोजगारी, नौकरी जाने का भय और अवसाद घातक साबित हो रहा है. जब आत्महत्या की घटना किसी सेलिब्रिटी के साथ होती है, तो  उसकी चर्चा पूरे देश में होती है.

लेकिन गांव या आम आदमी की आत्महत्या चर्चा का विषय नहीं बनायी जाती है. इस समय विश्व में   में आत्महत्या को लेकर जिस तरह की बातें हो रही हैं, उनपर भी गौर करने की जरूरत है. स्वीडन-नार्वे जैसे देशों ने कोविड-19 के हमले के साथ ही अवसाद से अपने नागरिकों को बचाने के लिए विशेष प्रयास किये.

इससे प्रभावित होकर यूरोप के कई छोटे देशों ने अवसाद से नागरिकों को बचाने के लिए कदम उठाए. एशिया के देशों में इस तरह की किसी पहल का अभाव ही रहा.

सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आइएएस हर्ष मंदर कहते हैं कि कोरोना वायरस प्रभाव के दौर में भारत सरकार ने ठोस,कारगर और सुनियोजित कदम नहीं उठाया. लगातार गिरती अर्थव्यवस्था और तेजी से बढ़ रही बेरोजगारी आगाह करती है कि हम भुखमरी की स्थिति में जल्द ही पहुंचने वाले हैं.

जाहिर है कि कोरोना से निपटने में केंद्र सरकार की सारी नीतियां फेल हो चुकी हैं. मेरा मानना है कि सरकार की इस विफलता का खामियाजा हमारी कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा. इन बातों का महत्व केवल आर्थिक प्रबंधन से नहीं है, बल्कि उन संभावनाओं का आंकलन करने की नाकामयाबी भी है, जो किसी व्यक्ति को आत्महत्या की ओर धकेल देती है.

बेरोजगारी और इससे पैदा होने वाले डिप्रेशन से बचाने के लिए सरकार लोगों के विश्वास को बनाये रखने के लिए उन तक कैश पहुंचा सकती थी. अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और जयति घोष ने गणना की है कि हर नागरिक के पास क्रमश: तीन और छह महीने तक ये मदद पहुंचाने में जीडीपी का 3 फीसदी हिस्सा ही खर्च करना होता और राशन के लिए भारत सरकार को अपने 77 मिलियन टन के खाद्यान भंडार का सीमित संसाधन ही खर्च करना पड़ता. कम से कम बेरोजगार और नाकरी जाने  के भय के कारण लोगों में डिप्रेशन नहीं पैदा होता और भारत की अर्थव्यवस्था भी बुरी हालत में नहीं पहुंचती.

यदि यूरोप अमेरिका के कुछ देशों से तुलना की जाये तो 20 लाख करोड़ के पैकेज के बावजूद सबसे ज्यादा प्रभावित लोगों तक पहुंचाने में सरकार कारगर नहीं रही है. इस विषय के एक जानकार के अनुसार, क्रोनिक स्ट्रेस,एनजाइटी, डिप्रेशन महामारी के कारण पैदा हुए आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा बोध ने लोगों को बुरी तरह ग्रस्त किया है.

लॉकडाउन में ढील के बावजूद इन हालातों में ज्यादा बदलाव के संकेत नहीं हैं. सिर्फ सीआईपी के साथ इस दौरान संपर्क करने वाले लोगों की संख्या का इजाफा बताता है कि मध्यवर्ग भी इसकी चपेट में आ रहा है.

1929-30 की भयावह महामंदी के बाद यह पहला अवसर है, जब आर्थिक असुरक्षाबोध आत्महत्या का बड़ा कारण बन रहा है. जरूरत इस बात की है कि भारत के मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन पर फोकस किया जाये और श्रम शक्ति और युवाओं को असमय मौत से बचाया जाए.

कोविड-19 एक बड़ी चेतावनी के रूप में इस तथ्य को रेखांकित करता है कि सरकारों को मानसिक मामलों को भी गंभीरता से लेने की जरूरत है और समग्र महामारी से निपटने की रणनीति की समग्रता में इस सवाल को भी प्रमुखता देनी होगी.

एक विशेषज्ञ का सुझाव है कि भारत को मानसिक रोग से निपटने के लिए एक अलग मंत्रालय का गठन करना चाहिए और एक इमरजेंसी टास्क फोर्स का गठन करना चाहिए.

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