
Sanjay Prasad, Jamshedpur: पुणे के फिल्म मेकर विदित राय यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर रेडियो कभी देश का सबसे लोकप्रिय माध्यम क्यों हुआ करता था? आखिर रेडियो प्रसारण में ऐसी क्या खासियत थी जिसने देश में इसके प्रशंसकों की न केवल फौज खड़ी कर दी बल्कि रेडियो क्लबों के निर्माण में अहम भूमिका निभाई. अपने इसी प्रोजेक्ट को लेकर विदित सप्ताह भर पहले जमशेदपुर पहुंचे और यहां के श्रोता संघों के साथ ही लगभग 50 साल से रेडियो के सक्रिय श्रोता रहे जंग बहादुर सिंह से लंबी बातचीत की.
बकौल विदित, वैसे तो आज डिजिकल का दौर है लेकिन आज भी रेडियो के ऐसे हार्ड कोर श्रोता मिल जाते हैं जो रेडियो की लोकप्रियता और उस माध्यम की सशक्तता के बारे में कहानी कहते हैं. आज रेडियो का शक्ल बदल गया है और एफएम से लेकर पॉडकॉस्ट के जरिए रेडियो श्रोताओं तक पहुंच रहा है मगर जंग बहादुर सिंह सरीखे श्रोताओं से मिलने पर लगता है कि रेडियो कितना पावरफूल मीडियम है. किसी की जिंदगी में कैसे बस जाता है, किसी के दिलो दिमाग पर कितना असर डालता है. मैं यह जानकर हैरान हो जाता हूं कि जंग बहादुर सिंह जैसे श्रोता आज भी नियमित रूप से रेडियो सुनने के लिए न केवल समय निकालते हैं बल्कि उस पर अपनी राय भी रखते हैं.
उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से आज रेडियो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा. अब यह लोगों की जिंदगी बदल रहा है. देश में हजारों कम्युनिटी रेडियो चल रहे हैं जिसका संचालन स्थानीय कलाकार और प्रसारक अपनी भाषा में करते हैं. मुझे लगता है कि दूसरा कोई माध्यम नहीं है जो रेडियो की जगह ले सके. देश भर में मैं ऐसे श्रोताओं और क्लबों से बात कर रहा हूं. हाल ही में भुवनेश्वर में हुए रेडियो फेयर में भी भाग लिया. जल्द ही रेडियो की इस कहानी को डॉक्यूमेंट्री का शक्ल देने वाला हूं, ताकि आज की नई पीढ़ी और दुनिया जान सके कि भारत में सरकारों के साथ ही रेडियो का असर आम लोगों की जिंदगी पर कितना ज्यादा रहा है.




