
Faisal Anurag
सड़कों, रेल पटरियों और पगडंडियों पर पैदल चल रहे लाखों मजदूर गुस्से में चल रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट से कम से कम केंद्र के कहने का आशय तो यही है. अगर केंद्र की इस बात पर भरोसा किया जाये तो न तो मजूदरों के सामने कोई बेबसी है और न ही कोई तकलीफ है.
फिर भी वे गुस्से में हैं. किस बात को ले कर उन्हें गुस्सा है, इसे तो केंद्र ने नहीं बताया है. वित्तमंत्री तो कह ही चुकी हैं कि देश के किसी भी श्रमिक को कई परेशानी नहीं होने दी गयी है. उन्हें तीन टाइम खाना दिया गया है.
एपेक्स कोर्ट आदेश दे कि सभी जनपदों के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर यह सुनिश्चित करें कि उनके जनपदों से गुजर रहे प्रवासी मज़दूरों को पानी और खाना मिले. और उन्हें इंसान की तरह वाहनों का बंदोबस्त करके उनके घर छुड़वाया जाये.
यह दीगर बात है कि देश में दिल्ली, सूरत मुंबई समेत कई स्थानों पर मजदूर राशन और भोजन की मांग को ले कर सड़कों पर कई बार उतर कर विरोध जता चुके हैं.
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सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर विचार कर रहा था जिसमें मांग की गयी थी कि मजूदरों को तत्काल राहत मुहैया करायी जाये. और उन्हें पानी और भेजन दिया जाये. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को रद्द कर दिया और सड़कों पर चल रहे मजूदरों की रोकथाम के लिए राज्यों से कहा.
केंद्र की ओर से सरकारी वकील तुषार मेहता ने कहा कि सरकार ने मज़दूरों को उनके घर पहुंचाने के सारे प्रबंध किये हैं. पर बहुत से मज़दूर अपनी बारी की प्रतीक्षा करने की बजाय गुस्से में पैदल ही चल पड़े हैं. जिससे यह दुर्घटना हुई. इस याचिका को ले कर यह उम्मीद बनी थी कि कोर्ट सरकार को कोई दिशानिर्देश देगी.
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केंद्र सरकार तो दावे कर रही है कि उसने मजूदरों के आवागमन के लिए श्रमिक ट्रेन और बसों का प्रबंध किया है. दूसरी ओर सडकों पर 1947 के बाद का सबसे भवायह दृश्य दिख रहा है. टीवी पर हर किसी ने देखा है कि बच्चा ट्राली बैग पर लेटा हुआ जा रहा है. कोई गाड़ी में जुत गया है. गर्भवती औरतें सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रही हैं.
श्रावस्ती के एक परिवार को देखा, वो ठेले से चला गया. इससे पहले सदियों पहले इस प्राचीन नगर ने इतनी लंबी पैदल यात्रा तय की होगी. या फ़िर साहित्य में ही. राहुल सांकृत्यायन के उपन्यास ‘सिंह सेनापति’ का एक पात्र है जो शिक्षा के लिए तक्षशिला तक जाता है. लेकिन वास्तविकता में इतनी लंबी यात्रा का शायद ही कोई प्रसंग कई बरसों में घटित हुआ होगा.
सवाल उठता है कि आज इस तरह के हालात क्या सिर्फ गुस्से के कारण ही दिख रहे हैं. या सरकार की लापरवाही भी इसके लिए जिम्मेदार है. पिछले छह सालों में देखा गया है कि भारत में सरकार की कोई जिम्मेदारी ही नहीं तय की जाती है. या तो विपक्ष को देषी करार दिया जाता है या फिर लोगों को ही. दो साल पहले जब किसानों का दिल्ली मार्च हुआ था तब भी यही कहा गया था कि किसानों की तमाम मांगों को केंद्र ने हल कर दिया है.
फिर भी वे पैदल मार्च कर रहे हैं. देश में तैयार नया मध्यवर्ग इस तर्क का सबसे बड़ा संवाहक बना हुआ है. श्रमिकों को लेकर भी उसकी टिप्पण्यियां बताती हैं कि वह किस तरह श्रम के साथ हिकारत का भाव रखने लगा है.
इस हालात पर लेखक सोमप्रभ ने मार्मिक टिप्पणी की है. उन्होने लिखा है, अब यही लगता है कि इन सब बहसों से कुछ नहीं हासिल होने जा रहा है. यह आंकड़ों की जालसाजी राजनीति का चरित्र हो गई है.
बस कोशिश करिए कि लोगों की कुछ न कुछ सहायता की जा सके. और मुझे कम से कम संदेह नहीं है कि आबादी का बड़ा हिस्सा ऐसा है जो कहीं भी सहयोग नहीं कर रहा है. और वह यहां मेरी सूची में भी है. वरना हम ऐसी कहानियां देख सुन रहे होते.
जो भी अलग-अलग कोशिश हो रही है, उनकी क्षमता बहुत नहीं है. वह हजाऱ दो हजार लोगों को मदद कर सकते हैं. कुछ हो सकते हैं जिनका स्केल और ऐसे काम का अनुभव बड़ा हो, इसलिए जो लोग काम कर रहे हैं, उन्हें मदद करें.
इन पैदल श्रमिकों के बच्चों को रास्ते में केवल बिस्कुट या केला का ही सहारा है. रास्ते में अनेक जगहों पर गरीब ग्रामीणों ने ही अपना पेट काट कर इन मजूदरों के लिए भोजन और पानी का प्रबंध जरूर किया है. लेकिन किसी संगठित संस्था और सरकार की कोई मदद इन मजूदरों को नहीं मिली है.
एक ओर वे जहां थे उन्हें किराया देने का संकट था तो राशन का भी. आखिर तमाम घोषणाओं के बाद भी मजदूरों ने अपनी जिस बेबसी का बयान किया है, उससे तो सरकारों के तमाम तंत्र और उनकी संवेदनशीलता को ले कर ही सवाल खडे होते हैं.
पैदल मजदूरों को अनेक स्थानों पर पुलिस ने डंडे मारे हैं, और गाडियों ने कुचला है. इसमें अब तक 60 मजदूर अपनी जान दे चुके हैं.
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