National

#ICSE 10वीं के सिलेबस से हटा लघु कथा ‘जामुन का पेड़’, सरकारी व्यवस्था पर व्यंग्य कसती थी कहानी

New Delhi: आइसीएसई 10वीं बोर्ड के हिन्दी के सिलेबस से जामुन का पेड़ चैप्टर को हटा दिया गया है. ये कहानी कृष्ण चंदर द्वारा लिखित एक व्यंग्यात्मक लघु कथा है. जामुन का पेड़ सरकारी कार्यों की लेटलतीफी पर एक व्यंग्य था.

जिसे आइसीएसइ बोर्ड ने परीक्षाओं से महज 3 महीने पहले सिलेबस से हटाया है. और आइसीएसई काउंसिल की ओर से जारी नोटिस के मुताबिक, 2020 और 2021 की बोर्ड परीक्षाओं में इस कहानी से जुड़े सवाल नहीं पूछे जाएंगे.

इसे भी पढ़ेंःबैंक फ्रॉड केस को लेकर देशभर के 169 ठिकानों पर #CBI का सर्च अभियान, 35 मामले दर्ज
कृष्ण चंदर की इस व्यंग्यात्मक कहानी में एक शख्स जामुन के पेड़ के नीचे दब जाता है. उसे बचाने की बजाये विभिन्न अधिकारी एक दूसरे पर जिम्मेदारियां डालते रहते हैं और मामला आखिरकार पीएमओ तक पहुंचता है. लेकिन जब तक पेड़ के नीचे दबे शख्स को बचाने की कार्रवाई को हरी झंडी मिलती है, तब तक उसकी मौत हो जाती है.

ram janam hospital
Catalyst IAS

क्यों हटाई गयी कहानी

The Royal’s
Pitambara
Sanjeevani
Pushpanjali

अंग्रेजी अखबार द टेलिग्राफ की खबर के अनुसार, एक राज्य विशेष के अधिकारियों ने ‘जामुन का पेड़’ कहानी पर आपत्ति जताई. लेकिन सूत्रों का कहना है कि कुछ अधिकारी इसे वर्तमान सरकार की आलोचना के तौर पर देख रहे थे. इस चैप्टर के माध्यम से बताया गया था कि किस तरह से सरकारी काम में देरी होती है. यह कहानी 2015 से हिंदी सिलेबस का हिस्सा थी. कृष्ण चंदर ने 60 के दशक में जामुन का पेड़ कहानी लिखी थी.

हालांकि, काउंसिल के सेक्रेटरी और चीफ एग्जीक्यूटिव गेरी अराथून ने की मानें तो कहानी को 10 वीं बोर्ड के सिलेबस से इसलिए हटाया गया क्योंकि यह ‘दसवीं के बच्चों के लिए सही नहीं थी.’ हालांकि, ऐसा क्यों है या कहानी को लेकर किस बात पर आपत्ति है, इन बातों पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा.

इसे भी पढ़ेंः#Maharashtra में नई सुगबुगाहटः शिवसेना-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की संभावना, कांग्रेस का भी होगा अहम रोल

क्या है कहानी का सार

कृष्ण चंदर द्वारा लिखित लघु कथा, ‘जामुन का पेड़’ सरकारी कार्यों की लेतलतीफी पर एक व्यंग्य है. कहानी में, आंधी-तूफान में सेक्रेटेरिएट के लॉन में लगा एक जामुन का पेड़ गिर जाता है, जिसके नीचे एक मशहूर कवि दब जाता है.

लॉन का माली दबे हुए शख्स को बचाने की पहल करता है. और इसकी जानकारी चपरासी को देता है. चपरासी मदद करने की जगह मामला क्लर्क पर टाल देता है. बढ़ते-बढ़ते मामला बिल्डिंग सुपरीटेंडेंट से होते हुए उच्चाधिकारियों तक पहुंच जाता है.

चार दिनों के बाद मामला चीफ सेक्रेटरी तक पहुंचता है. लेकिन यहां भी राहत कार्य शुरू होने के बजाये फिर से एक दूसरे पर जिम्मेदारियां थोपने का दौर चलता है. मामला कृषि, वन विभाग से लेकर संस्कृति विभाग इसके बाद हेल्थ डिपार्टमेंट तक पहुंचता है. स्वास्थ्य विभाग इसे विदेश मंत्रालय भेज देता है. क्योंकि ये वही जामुन का पेड़ है, जिसे पड़ोसी मुल्क के पीएम ने बोया था.

पड़ोसी देश के रिश्ते खराब होने का हवाला देते हुए विदेश मंत्रालय पेड़ को काटने की इजाजत नहीं देता है. अंत में यह मामला प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचता है. जहां अधिकारियों से राय मशविरा करने के बाद प्रधानमंत्री शख्स की जान बचाने के लिए पेड़ को काटने पर सहमत होते हैं. लेकिन जब तक बिल्डिंग सुपरिटेंडेंट को ये आदेश मिलता है, तब तक पेड़ के नीचे दबे कवि की मौत हो जाती है.

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार पर आरबीआइ के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और अभिजीत बनर्जी जैसे अर्थशास्त्री यह आरोप लगाते रहे हैं कि सरकार में निर्णय लेने की प्रक्रिया ‘अति केंद्रीकरण’ की वजह से धीमी हो गई है.

इसे भी पढ़ेंःदीवाली भी बाजार में नहीं लौटा पायी रौनक, #GDP ग्रोथ रेट गिरकर 5.8 प्रतिशत पर आने की आशंका: रिपोर्ट

Related Articles

Back to top button