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भूख से बाकी बच्चे भी ना मर जाएं, इस डर से गांव छोड़ भाई के घर चली गई थी संतोषी की मां, सास वापस लेकर आई

Pravin Kumar/ Manjusha Bhardwaj
Ranchi/Simdega, 18 October: इधर झारखण्ड सरकार अपनी सफलता के 1000 दिन पूरे होने की खुशियां मना रही है. सरकार के इस जश्न के बीच 11 साल की एक गरीब बच्ची की भूख से जान चली जाती है. संतोषी की भूख से मौत के बाद पूरा परिवार डरा-सहमा है. भूख का भय ऐसा कि मां अपने दो छोटे बच्चों की जान बचाने के लिए गांव छोड़ भाई के घर चली गयी. आज सुबह सास वापस लेकर गांव आई.

इस पूरे मामले को लेकर कोईली देवी की भाभी फुलो देवी और भाई चंदन नायक ने बताया कि हमारी बहन कोयली देवी 15 अक्टूबर को हमारे घर (बानो प्रखंड का कोबड़ा गांव) आयी थी. अपने साथ वह दो बच्चे प्रकाश और चांदो को लेकर आयी थी. वह काफी डरी-सहमी हुई थी. वह सिमडेगा अस्पताल से सीधे मेरे घर आयी थी. वह अपने गांव नहीं गई क्योंकि उसके घर में खाना नहीं था. उसके बाकी दो बच्चे भी कहीं भूख के शिकार ना हो जाएं. यह डर उसे सता रहा था कहीं उनका हाल भी संतोषी स ना हो जाये.

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फुलो देवी बताती हैं कि कोईली डरी-सहमी थी. अस्पताल में भी उससे कई लोग मिलने आए थे. उन लोगों ने दबाव बनाया था कि बोलो तेरी बेटी की मौत भूख से नहीं बिमारी से हुई है. गांव के भी कुछ लोग उस पर दबाव बना रहे थे. इसी डर से वह गांव ना जाकर अपने भाई-भाभी के घर चली गई.

क्या कहती हैं समाज सेविका तारामणि साहू

भूख से मौत के बाद जिला प्रशासन क्या कार्रवाई कर रहा है, के सवाल के जवाब में समाज सेविका तारामणि साहू कहती हैं कि प्रशासन की ओर से बच्ची के परिवार को 50 हजार रुपये देने की घोषणा की गयी है, लेकिन यह भी अभी तक उस परिवार को नहीं दिया गया है.

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क्या सच में हुई मलेरिया से संतोषी की मौत

संतोषी की मौत मलेरिया से होने के सरकारी दावे पर सामाजिक कार्यकर्ता तारामणि बताती हैं कि वह 21 अगस्त से उस परिवार को मिल रही हैं. बीते 25 सितंबर को भी वह उस परिवार से मिली थी. अक्टूबर में भी मिली है. लगातार तीन महीनों से वह उस परिवार से मिलती आ रही है. लेकिन ऐसी कोई बात नहीं थी कि बच्ची की तबीयत खराब थी. इस परिवार को राशन नहीं मिल रहा है, यह जनता दरबार में हमने डीसी को आवेदन लिख कर बताया था. तारामणि ने बताया कि बच्ची को मलेरिया नहीं था, इस बात की पुष्टि स्वास्थ्य विभाग की एएनएम भी करती हैं. एएनएम की रिपोर्ट में इस तरह की किसी बीमारी की कोई पुष्टि नहीं की गई है. मैंने खुद भी देखा कि वह बच्ची बीमार नहीं थी और मलेरिया का कोई मामला नहीं था.

जिन लोगों पर भूख से हुई मौत की जिम्मेदारी होनी चाहिए, सरकार ने उन्हें ही जांच का जिम्मा दे दिया. इस जांच टीम ने आठ घंटे में जांच रिपोर्ट तैयार कर ली. इतने कम समय में जांच करना और रिपोर्ट तैयार करना खासकर ऐसे संवेदनशील मामले में, क्या संभव है. इस जांच टीम की वैद्यता पर भी सवाल है, क्योंकि जिन्हें दोषी होना चाहिए, वे ही जांच कर रहे हैं.

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प्रशासन पर मामले को भटकाने का आरोप

तारामणि के अनुसार प्रशासन अब हम पर आरोप लगा रहा है कि हम इस मामले को भूख से हुई मौत बताने पर तुली हुई है. यह गलत है. प्रशासन के पास सारी चीजें दर्ज हैं कि बच्ची की भूख से मौत हुई और उसके परिजन भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं.

प्रशासन अब तक सिर्फ प्रलोभन देने का काम कर रही है ताकि इस मामले को यहीं दबाया जा सके. इस पूरे मामले को करीब से जानने और समझने और उठाने वाली तारामणि साहू पर प्रशासन द्वारा कई तरह का दबाव डाला जा रहा है. तारामणि साहू ने खुद कहा कि मुझ पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि मैं डीलरों को बदनाम कर रही हूं. लेकिन मैं डीलर को बदनाम नहीं कर रही हूं बल्कि यह व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई है. प्रशासन मुझे तंग कर रहा है  और अब मुझे उस गांव में भी जाने से रोका जा रहा है जहां यह पूरा मामला हुआ है. इससे यही साफ होता है कि मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जा रही है.

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बच्ची की मौत के बाद प्रसाशन की कार्रवाई

बच्ची की मौत का मामला जब सामने आया तो इसने सरकार के साथ-साथ प्रशासन को भी हिला कर रख दिया. इसके बाद प्रशासन भी आनन-फानन में जांच में लग गया. जांच के लिए सिमडेगा डीसी, बीडीओ, डीडीसी, स्वास्थ्य विभाग और राशन डीलर भी गांव पहुंचे. पूरे मामले की जानकारी ली और जांच रिपोर्ट तैयार की.
रिपोर्ट के मुताबित यह बताया गया है कि बच्ची की मौत मलेरिया से हुई थी. जबकि बच्ची की मां का कहना है कि उसकी बेटी भात मांगते-मांगते मर गई. चार दिनों से बच्ची के घर में खाना नहीं बना था. परिवार ने कुछ नहीं खाया था. इस घटना की स्वतंत्र जांच करने वाली फैक्ट फाइंडिंग टीम का यह कहना है कि परिवार को पिछले छह महीनों से राशन नहीं मिला था. क्योंकि राशन डीलरों का कहना है कि परिवार का आधार कार्ड राशन कार्ड से नहीं जुड़ा हुआ है. वहीं दूसरी ओर सीएम रघुवर दास ने भी इस पूरे मामले की जानकारी सिमडेगा डीसी से ली. 24 घंटों के अंदर पूरे मामले की जांच करने का आदेश दिया. साथ ही सीएम ने पीड़ित परिवार को 50 हजार रुपये मुवावजा देने की भी बात कही है.

आधार को राशन कार्ड से जोड़ने का क्या है मामला

बता दें कि झारखंड में लगभग 11.5 लाख राशन कार्ड किसी ना किसी वजह से रद्द कर दिये गए है. इसका एक प्रमुख कारण है आधार कार्ड से राशन कार्ड का लिंक नहीं होना. जानकार बताते हैं कि पहले भी सुदूरवर्ती इलाके के लाभुकों का राशन कार्ड डीलर के पास ही रहता था. वो अपने मनचाहे ढंग से लाभुकों को राशन उपलब्ध कराते थे. कोईली देवी ने भी यह कहा है कि उनका राशन कार्ड डीलर के पास है. छह महीने पहले ही डीलर ने राशन कार्ड ले लिया था. सवाल उठता है कि राज्य में इतने सारे राशन कार्ड रद्द करने का आदेश किसने दिया, क्यों दिया और इसका मकस्द क्या था? संतोषी की मौत के मामले में क्या यह सब जिम्मेवार नहीं है?  क्या इस सरकारी लापरवाही के लिए इन्हें सजा मिलेगी? यह संतोषी की मौत का मामला नहीं बल्कि यह व्यवस्थाजन्य संस्थानिक हत्या है. इस मार्मिक घटना के बाद क्या राज्य में भूख से होने वाली मौत की स्थिति बदलेगी. और अगर बदलेगी भी तो कब..?

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सरयू राय का मुख्य सचिव पर हमला

खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री सरयू राय का कहना है कि अगर किसी के पास आधार कार्ड नहीं है तो उसका राशन कार्ड कट जाएगा ऐसा नहीं है. ऐसा किसी ने किया है तो गलत किया है. सुप्रीम कोर्ट ने लिखित में यह आदेश दिया है कि जिसका आधार कार्ड नहीं है उसका आधार कार्ड बनवाया जाए. ताकि लोगों को राशन मिल सके. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश इस साल के अप्रैल महीने में दिया था. सरयू राय ने मुख्य सचिव राजबाला वर्मा पर ठिकरा फोड़ते हुए कहा कि मुख्य सचिव ने 27 मई को एक वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सभी जिला अपूर्ति पदाधिकारियों को कहा था कि जिनके पास आधार नहीं है उनका राशन कार्ड काट दो. इसके बाद मैंने मुख्य सचिव से पूछा कि राशन कार्ड काटने की बात कही गयी है जबकि सुप्रीम कोर्ट का ऐसा कोई आदेश नहीं है. ऐसा नहीं होना चाहिए.

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राशन दुकान वाले ने जो किया वो गलत : खाद्य मंत्रालय

इस मामले में खाद्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि सिमडेगा जिले के राशन दुकान वाले ने जो किया वो बिल्कुल गलत था. क्योंकि देश के किसी भी हिस्से में राशन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ना अनिवार्य नहीं बनाया गया है. जाहिर है कि यह पूरा मामला अपराधिक लापरवाही से जुड़ा है जिसका खामियाजा 11 साल की बच्ची संतोषी को भुगतना पड़ा.

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झारखंड में आज भी भूख की वजह से मासूमों की जान जा रही है. हैरानी की बात है कि सरकार तरक्की के दावे कर रही है. लेकिन क्या सच में तरक्की हो रही है. क्या राज्य सच में उन्नति कर रहा है.

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