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Manjusha Bhardwaj/Vikash Kr. Mishra
Ranchi/ Giridih, 30 October: आदिम जनजाति को बचाने के लिए राज्य एवं केंद्र सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाएं शुरु की है. लेकिन यह योजना इन लोगों तक पूरी तरह से नहीं पहुंच पाती है. जिसकी वजह से आदिम जनजातियों की बात तो दूर की है, जरुरतमंद और लाचार लोगों तक भी सरकार की योजनाएं नहीं पहुंच पाती हैं. शायद इसी का नतीजा है की हाल के दिनों में एक 11 साल की बच्ची संतोषी की मौत भूख के कारण हो गयी. झारखंड को अलग हुए आज 17 साल हो गये हैं, लेकिन फिर भी यहां की स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है. कभी मात्र 50 रुपये के अभाव में इलाज नहीं होता है और उसकी मौत हो जाती है, कहीं खुन की कमी की वजह से मौत हो जाती है, तो कहीं कुपोषण की वजह से मौत होती है. कारण कुछ भी रहे मुख्य बात यह है कि मौत तो हो रही है.
इलाज के अभाव में तीन वर्षीय बच्ची व नवजात की मौत, मां की हालत गंभीर
ताजा मुद्दा गिरिडीह के सरिया प्रखंड के अमनारी बिरहोर टंडा गांव की है, जहां फिर दो मासूमों की जान गयी है, और उनकी मां जिंदगी और मौत के बीच जुझ रही है. घटना के बारे में बता दें कि कमली देवी नाम की महिला की तीन वर्षीय बेटी पींकी की मौत तबियत खराब होने की वजह से शनिवार को हो गयी. वहीं कमली ने प्रसव के दौरान अपने दूसरे बच्चे को भी खो दिया. इधर प्रसव के बाद से कमली की स्थिति भी गंभीर बनी हुई है. डॉक्टरों का कहना है कि उसे खुन की कमी है. जिसकी वजह से उसे गिरीडीह सदर अस्पताल से धनबाद रेफर कर दिया गया है. ताकि उसका बेहतर इलाज हो सके.
कमली ने अपने दो बच्चों को तो हमेशा के लिए खो दिया और अब वो भी जिंदगी की जंग लड़ रही है. पर क्या यह किसी ने सोचा है कि कमली की हालत क्यों ऐसी हो गयी है ? क्या कोई इसके लिए जिम्मेदार है… और अगर है तो कौन है वो?
मौत का कारण बनता स्वास्थ्य व्यवस्था
इधर इस पूरे मामले के बाद स्थानीय लोगों का कहना है कि इलाके का अस्पताल बंद रहता है. इसी वजह से कमली ने घर में ही बच्चे को जन्म दिया, लेकिन उसके बच्चे ने जन्म लेते ही मौत को गले लगा लिया. वहीं उसकी तीन साल की बच्ची की भी स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं मिलने के कारण मौत हो गयी. क्योंकि बच्ची बीमार थी और इलाके का अस्पताल तो बंद रहता है. तो ऐसे में लोग इलाज के लिए जाए तो कहां जाए. इससे अस्पताल को क्या अगर उनकी वजह से किसी की मौत भी हो जाती है तो क्या. वहां पर नियुक्त किये लोगों को बिना काम के भी पैसे तो मिल ही रहें होंगे. उनका जीवन तो चल ही रहा होगा. क्या फर्क पड़ता है अगर ऐसे में किसी और की जिंदगी की गाड़ी रुक भी जाती है तो.
आंगनबाड़ी का हाल भी बेहाल
इतना हीं नहीं अगर हम इलाके के आंगनबाड़ी केंद्र के बारे में बता करें तो वहां भी पांच महिनों से पोषाहार नहीं बंटा है. वहीं वहां से दो-तीन किलोमीटर दूर केशवारी स्थित उपस्वास्थय केंद्र भी नहीं खुलता है. यदि यहां के लोग सरिया के स्वास्थय केंद्र इलाज के लिए जाते हैं तो वहां भी डॉक्टरों की घोर कमी का लोगों को सामना करना पड़ता है.
कागजों में सीमित सरकार की योजनाएं
विलुप्त हो रहे बिरहोर के संरक्षण के लिए एक तरफ सरकार लाखों रुपये पानी की तरह बहा रही हैं. वहीं कई सामाजिक संस्था बिरहोर के संरक्षण को लेकर लाख दावे भी करती रहती हैं. लेकिन इन दावों की जमीनी हकीकत कुछ और ही है. केवल कागजों में ही तमाम तरह की बातें और एक से बढ़कर एक दावों की खाना पूर्ति की जाती हैं क्योंकि अगर असल जिंदगी में इन सभी योजनाओं और दावों को पूरा किया जाता तो शायद किसी की जिंदगी व्यवस्था की वजह से नहीं जाती.
सरकार की व्यवस्था पर सवाल
बहरहाल, स्वास्थ्य व्यवस्था में कमी के कारण इसी प्रखंड में कुछ दिन पहले भी बिरहोर जाति के लोगों की मौत हो चुकी हैं. अब ऐसे में फिर हुई घटना से जिला प्रशासन के साथ-साथ राज्य सरकार पर भी सवालिया निशान खड़ा हो रहा हैं, कि आखिर बिलुप्त हो रहे बिरहोरों का किस प्रकार से संरक्षण किया जा रहा हैं. क्या संरक्षण के नाम पर मात्र खाना पूर्ती की जा रही है?
क्या बच पायेगी कमली की जिंदगी
डॉक्टरों ने कमली की तबियत खराब होने का कारण खुन की कमी बताया है. लेकिन क्या कमली को समय पर खुन मिल पाएगा ? क्या उसकी जिंदगी बच पाएगी ? यह सवाल शादय कुछ अजीब लगे लेकिन ऐसे मौके पर यह सवाल उठना तो लाजमी है क्योंकि अगर आपको याद होगा तो बता दें कि राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में एक गर्भवती महिला को पांच घंटे तक खून नहीं मिलने के कारण जुलाई में उसकी मौत हो गई थी. डॉक्टर महिला का वार्ड बदलते रहे, आैर आखिरकार महिला की जान चली गई. मृतका का नाम रुनिया देवी था. महिला की मौत के बाद महिला के पति पप्पू नायक ने इसे डॉक्टरों की लापरवाही बताया था.
भूख के कारण हुई थी बच्ची की मौत
इस तरह का मामला कोई पहली बार सामने नहीं आया है. इससे पहले भी व्यवस्था को शर्मशार करने वाली कई ऐसी घटनाएं हुई है. हम बात कर रहें है हाल के दिनों में राज्य के सिमडेगा जिले में एक 11 साल की बच्ची की मौत के बारे में. जो कि भुख की वजह से 28 सितम्बर 2017 की रात को मौत का शिकार हो गयी थी. झारखंड में खाद्य सुरक्षा की स्थिति धीरे-धीरे बेहतर होती जा रही है, अब कोई राज्य में भूखा नहीं मरेगा, हर किसी को मिलेगा अनाज जैसे वाद सरकार करती नजर आ रही है. तो फिर ऐसे में बच्ची की मौत भूख से क्यों हो जाती है. वह भूख से लगातार रोते हुए कह रही थी- दे नी आयो भात, दे नी आयो भात..(मां भात दो ना… मां भात दो ना). यह बुदबुदाते हुए 11 साल की संतोषी की भूख से मौत हो गयी.
जिंदगी की किमत से बड़ी थी 50 रुपये की किमत
झारखंड के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स का हाल भी कुछ ठीक नहीं. जहां बच्चे की मौत ऑक्सीजन या किसी दवा की कमी से नहीं बल्कि जांच के लिए पिता के पास 50 रुपये नहीं होने के कारण हुई थी. और उस पर भी शर्मनाक यहां के स्वास्थ्य मंत्री का बयान रहा था. क्योंकि जब इस खबर को मीडिया में उछाला गया तो झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, ‘जिसने खबर छापी उसे ही 10-10 रुपये चंदा देना चाहिए था और बच्चे का इलाज कराना चहिए था.
इस मामले में पिता के पास 50 रुपये कम होने के कारण एक साल के मासूम श्याम का सीटी स्कैन नहीं हो पाया. इस कारण उसका समय पर इलाज शुरू नहीं हो सका. बेबस पिता संतोष कुमार अपने बच्चे को बचाने के लिए डॉक्टर और जांच घर के चक्कर लगाता रहा. पर वह अपने मासूम बच्चे को नहीं बचा पाया. आखिरकार उचित इलाज के अभाव में श्याम की मौत हो गई. क्या यहां पर वह पिता कुसुरवार था जिसके पास 50 रुपये नहीं थे या यहां की व्यवस्था जिसने महज 50 रुपये के लिए बच्चे का इलाज नहीं किया. अस्पताल को 50 रुपये की किमत शायद बच्चे की जिंदगी की किमत से ज्यादा लगी. तभी तो उसका इलाज ना करना बेहतर समझा और उसे मरने दे दिया.
खून का इंतजाम कर रहा था पिता तब तक हो गयी बेटे की मौत
इतना ही नहीं गुमला के सदर अस्पताल में भी इलाज के अभाव में एक बच्चे की मौत हो गयी. बच्चे का नाम राजदेव महली था जो कि सिसई प्रखंड के बरगांव नवासी सुरेश महली का पुत्र था. उसकी मृत्यु 29 अगस्त को गुमला के सदर अस्पताल में हुआ था. राजदेव 14 दिनों से बीमार था और उसे 28 अगस्त की रात सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था. मृतक के पिता ने बताया था कि भर्ती कराने के बाद डॉक्टर ने प्राथमिक जांच किया और पानी चढ़ाने को कहा. रातभर में आधा बोतल पानी चढ़ा. जिसके बाद सुबह डॉक्टर ने खून की कमी बताते हुए खून का इंतजाम करने को कहा लेकिन जब तक पिता खून का इंतजाम कर वापस लौटा उसके पुत्र की मौत हो चुकी थी. अब यहां किसे दोषी मानेगें आप. उस पिता को जिसे यह तक पता नहीं था कि उसके बच्चे के शरीर में पानी की कमी थी या खून की या फिर से एक बार व्यवस्था को जहां बीमार के लिए समय पर खून भी उपलब्ध नहीं है.
कई सवालों के बीच घिरा झारखंड
इन सभी मामलों के बाद किसे जिम्मेदार कहेंगे आप? क्या कभी व्यवस्था सुधर पायेगी? क्या कभी सरकार की योजनाएं कागजों के अलावा जमीनी हकिकत में भी नजर आयेगी? आखिर कब इस तरह के कारणों की वजह से लोगों की जान जानी बंद होगी? क्या कभी सपनों का झारखंड बन पायेगा?




