Praveen Kumar
Ranchi, 30 October: न्यू एजी को-आपरेटिव कॉलोनी आदिवासियों की हड़पी हुई जमीन पर खड़ा है. जिनकी जमीनें हड़पी गई, उन्होंने अफसरों के आगे हाथ जोड़े, अदालत में मुकदमा किया. पर उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है. अब तो उन्हें यह भी लगने लगा है कि वह यूं ही मर-खप जायेंगे, पर न्याय नहीं मिलेगा. newswing.com ने जब जमीन मालिकों से बात की, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आये. पता चला कि जो व्यक्ति पहले खुद की जमीन पर खेती करके घर चलाते थे, कुछ सालों बाद उनके परिवार के लोग किसी तरह दाई-मजदूरी का काम करके गुजारा भर कर पा रहे हैं.
1961 को सिर्फ 31.52 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ था
दस्तावेज के मुताबिक तीन फरवरी 1961 को पहले चरण की जमीन अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी की गई थी. यह जमीन एजी कार्यालय में काम करने वाले लोगों के लिए आवासीय परिसर बनाने के लिए लिया गया था. जिसमें जमीन का कुल रकबा 31.52 एकड़ था. बाद में 28 अगस्त 1970 को दूसरी बार 43.42 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने की कोशिश की गई. जिसका आज तक शहर के मूल वंशिदे विरोध कर रहें हैं.
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दूसरे चरण की जमीन अधिग्रहण के समय से ही कर रहे विरोध
जब दूसरे चरण की जमीन अधिग्रहण की बात सामने आयी थी, तब कडरु के मूल बाशिंदे इसका विरोध करने लगे. बहुत सारे मूल बाशिंदे जो अब भूमिहीन हो गए हैं और उनका अस्तित्व भी मिट गया है. वे लोग कहां हैं किसी को नहीं मालूम. दूसरे चरण की जमीन अधिग्रहण के समय से ही आदिवासी समाज संगठित होकर इसका विरोध करना शुरु कर दिये.
पुलिस और प्रशासन के बल पर हुआ कब्जा
नदी टोली के पुराने वंशिदे बताते हैं कि हमारी जमीन पुलिस और प्रशासन के बल पर हथियाया गया है. इतना ही नहीं जमीन मालिकों को किसी तरह का मुआवजा भी नहीं मिला. हम लोग 1971 से ही कोर्ट कचहरी का दरवाजा खटखटा रहे हैं. लेकिन अभी तक हमें किसी तरह का न्याय नहीं मिला. हमारी जमीन में पैसे वाले लोगों ने कब्जा कर लिया है. और इस उम्मीद के साथ आज भी कोर्ट कचहरी और जहां भी अवसर मिले दरवाजा खटखटाते हैं कि हमारी खोई हुई जमीन, जो एजी को-आपरेटिव कॉलोनी बनाने के लिए लूटी गयी है, वह वापस मिलेगा.
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नवरी केरकेट्टा ने बताया, हमलोग रोते हुये खुद को उजड़ता देख रहे थे
स्व. विसवा केरकेट्टा की पत्नी नवरी केरकेट्टा बताती हैंः हम लोगों का तीन एकड़ जमीन एजी को-अॉपरेटिव कॉलोनी में लूट लिया गया है. जिसका हम लोग शुरू से ही विरोध कर रहे हैं. वह 1970 के दशक को याद करते हुए बताती हैं कि जहां अभी एजी को-आपरेटिव कॉलोनी है, वहीं पर मेरा घर हुआ करता था. बड़ा सा कुआं और बारी हुआ करता था. जिस में हम लोग खेती करते थे. पूरा परिवार खुशी-खुशी रहते थे. 1971 में जब हम लोग पैसा नहीं लेना चाहे, तो किसी गिरी को याद करते हुए बताती हैं कि उसने महिला पुलिस बुला कर हम लोगों के घर और खेतों पर बुलडोजर चलाया. जमीन समतल की गयी. हमलोग रोते हुये खुद को उजड़ता देख रहे थे. हम लोग फोर्स के समाने बेबस और लचार थे. फोर्स की उपस्थिति में पूरे इलाके की चारदीवारी करायी गयी.
हम लोगों को मारा पीटा जाता था
हम लोग अपना बैल बकरी भी अगर उस तरफ नदी के पार ले जाते थे, तो हम लोगों को मारा पीटा जाता था. हमारे बैल बकरी को भगा दिया जाता था. महिलाओं को भी मारा पीटा जाता था. सरकार के द्वारा 1992 में तत्कालीन डीसी थे, उन्होंने 9 एकड़ जमीन वापस करने के लिए कहा था. उस नोटिस की प्रति दिखाते हुए कहती हैं, यह जमीन वापस करने के लिए कहा गया था. लेकिन आज तक हम लोगों का 9 एकड़ जमीन भी वापस नहीं हुआ है. ऐसे में हम लोग का रोजी-रोटी चलाना काफी मुश्किल हो गया है. पैसे वाले लोग आदिवासियों की जमीन हड़प लिए हैं. आज वही लोग हमारे परिवार और समाज के लोगों को दाई डेरा काम करने के लिए अपने घरों में बुलाते हैं. उनके लिए हम लोग कुली, कबाड़ी और दाई का काम करते हैं, जिन्होने हमारी जमीन लूट ली है. अब तो उनकी सेवा करना हमारी नियति बन गई है, जिससे हम लोगों का परिवार चलता है.
इतवारी कच्छप बताती हैं, हम लोगों को मारने की भी कोशिश की गई
बस्ती के सबसे बुजुर्ग महिला इतवारी कच्छप की उम्र करीब 110 साल है. वह बताती हैंः बाबू हमरे कर बगरा जमीन रहे. धान कर खेती होवत रहे, जिकरे से हमरे कर परिवार चलत रहे. आगे बताती हैंः हम लोगों को तो एक बार मारने की भी कोशिश की गई, मेरा पति जमीन चले जाने के सदमे के कारण ही मर गए. अपने बच्चों को लेकर किसी तरह हम लोग एजी को-आपरेटिव कॉलोनी के सबसे निचले हिस्से में आ गए. यहां अभी भी हमारी जमीन है, जिस पर कुछ लोग कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं. इस जमीन पर भी दलालों की नजर है. इस जमीन को भी लूटने की पूरी कोशिश की जा रही है. सरकार द्वारा जो इंदिरा आवास मिला उससे घर बना रहे थे. तो उस समय भी बस्ती के कुछ लोग और दलाल आकर रोकने की कोशिश किये. जमीन के कागज रहते हुए भी हमें जमीन नहीं मिल रही है.
आंखों के समाने अपनी जमीन लूटते देखे हैं और आज भूमिहीन हैं: करमा
इतवारी के पुत्र बुधवा उरांव उर्फ करमा बताते हैं कि उनका 3.61 एकड़ जमीन एजी को-आपरेटिव कॉलोनी में चला गया है. जिसका उन्हें कोई पैसा नहीं मिला है. उस समय 12 हजार मुआवजा दिया जा रहा था. जिसे हम लोग नहीं लिये हैं. हम लोगों के साथ-साथ कई ऐसे परिवार हैं, जिन्होंने आजतक मुआवजा नहीं लिया है. वे सभी आज तक जमीन वापसी की लड़ाई लड़ रहे हैं. अपनी आंखों के समाने अपनी जमीन लूटते देखे हैं और आज भूमिहीन हो गये हैं. बुधवा उरांव बताते हैं कि जिस जमीन पर वह रह रहे हैं, उस जमीन के लिए भी उन्हें लगतार धमकी दी जा रही है. इस जमीन से हट जायेंगे, तो हम लोग कहां जायेंगे. इसी जमीन में मेरे पिता को दफनाए हैं. इसी जमीन में हम अपने दादा को दफनाए हैं. तो छोड़ कर हम कहां जाएंगे. यह जमीन तो हमारा है.
आज भी 3 एकड़ 96 डिसमिल का रसीद कट रहा
बुधवा उरांव के मुताबिक आज भी इस पूरे जमीन 3 एकड़ 96 डिसमिल का रसीद कट रहा है. पैसे वाले और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से पिछले एक साल से हमारा रसीद काटना बंद करा दिया गया है. सरकार इनकी है. सरकार में बैठे अधिकारी इनके हैं. कोर्ट इनका है. इसीलिए हम आदिवासियों को न्याय नहीं मिल रहा है. हम अपनी जमीन वापसी के लिए मरते दम तक संघर्ष करेंगे. दलाल लोग धमकी देते हैं कि बुढ़िया और मैं जब मर जायेंगे, तो हमारे बच्चों से यह जमीन हड़प लेंगे. उसके बाद विरोध करने वाला कोई नहीं बच जाएगा.
1970 से ही हम लोग कोर्ट कचहरी का चक्कर लगा रहे: सुनील लिंडा
सुनील लिंडा जिनका 2.82 एकड़ जमीन एजी को-आपरेटिव कॉलोनी में चला गया है. वह कहते हैं, अब तो परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. घर के नाम पर हमारे सर के उपर छोटा सा छत है. बाकी सभी जमीन हम लोगों से लूट लिया गया है. 1970 से ही हम लोग कोर्ट कचहरी का चक्कर लगा रहे हैं. पुरानी बातों को याद करते हुए कहते हैं कि यहां पर लालू यादव भी आए थे. उन्होंने भी कहा था कि 9 एकड़ जमीन आदिवासियों को वापस कर दिया जाए. लेकिन आज तक वह 9 एकड़ जमीन भी वापस नहीं हुआ है. इस 9 एकड़ जमीन को वापस करने के लिए हमारी यह दूसरी पीढ़ी संघर्ष कर रही है. संघर्ष का क्या नतीजा निकलेगा, यह तो हम नहीं जानते लेकिन अपनी जमीन वापसी के लिए मरते दम तक संघर्ष करेंगे.
विडंबना आदिवासी जमीन वापसी का
एजी को-आपरेटिव कॉलोनी जिस मकसद से बनाया गया था, वह मकसद कभी पूरा नहीं हुआ. को-ऑपरेटिव के कई लोग को-ऑपरेटिव के संविधान में छेड़छाड़ करते रहे हैं. इसकी कई बार जांच भी हुई. डीसी से लेकर तमाम पदाधिकारी की भूमिका की भी जांच की हुई. 1992 में रांची के डीसी सुधीर प्रसाद थे. उन्होंने भी आदिवासियों से हड़पी गयी इस जमीन के लिए जांच कमेटी का गठन किया था. कमेटी की रिपोर्ट कहां गई, यह तो नहीं पता लेकिन आदिवासियों को आज तक उनकी जमीन वापस नहीं मिली.
जमीन हेरा फेरी मामले में उपायुक्त सहित कई अधिकारियों पर कार्रवाई की अनुशंसा हुई थी
एजी को-आपरेटिव कॉलोनी में जिनकी जमीन गई वह भूस्वामी पुराने अखबार की प्रति कटिंग दिखाते हुए कहते हैं. यह 1992 में पटना से प्रकाशित अखबार की प्रति है, जिसमें जमीन की हेरा फेरी के मामले में उपायुक्त सहित कई अधिकारियों पर कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी. लेकिन उन तमाम लोगों पर क्या कार्रवाई हुई, तो पता नहीं. हमें हमारी जीन अभी तक वापस नहीं मिली.
सीएनटी की धारा 49 का हुआ खुलेआम उल्लंघन
यह राजधानी में सिमटते आदिवासियों की कहानियां हैं, जो न्याय की उम्मीद में आज भी कोर्ट कचहरी का दरवाजा खटखटा रहे हैं. जनकारों का मानना है, सीएनटी की धारा 49 के तहत वैसे किसी परिवार की जमीन अधिग्रहित नहीं की जा सकती, जिससे वह भूमिहीन हो जायें. इस कानून का भी उल्लंघन रांची और झारखंड के कई शहरो में किया जाता रहा है. एजी को-आपरेटिव कॉलोनी में उन तमम अधिकारियों को जमीन दी गयी, जो अदिवासियों के जमीन हड़पने में सहयोग किये. वह लोग आज भी एजी को-आपरेटिव कॉलोनी में रहते हैं और जिनकी जमीन लूटी गयी, उनका वजूद तक नहीं बचा है. और जो बचे हैं, आज भी संघर्षरत हैं. बता दें कि वर्तमान एजी कॉलोनी में सिर्फ दो आदिवासी परिवार बचे हुए हैं.




