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#Lockdown के बाद राइस मिलों को मिल रहा केवल दस प्रतिशत धान,  अब आठ दिन का ही बचा स्टॉक

  • ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रांसपोर्टेशन नहीं होने से भविष्य में हो सकता है चावल संकट
  • राज्य के 150 मिलों  पर चावल निर्यात से लेकर खाद्यान्न आपूर्ति तक की है जिम्मेवारी

Chhaya

Ranchi : लॉकडाउन भले ही कोरोना के संक्रमण से लोगों को बचाने के लिए की गयी हो. लेकिन इसके परिणाम काफी दूरगामी होंगे. कुछ हद तक इसके साइड इफेक्ट्स अभी से ही नजर आने लगे हैं. लॉकडाउन वन के दौरान केंद्र सरकार ने खाद्यान्न मिलों को छूट दी थी. लेकिन अब लॉकडाउन दो आते-आते इन खाद्यान्न मिलों की स्थिति भी खस्ता हो चली है.

विशेषकर धान मिलों की स्थिति में इसका काफी असर पड़ा है. राज्य में ऐसे मिलों की संख्या लगभग 150 है. ग्रामीण क्षेत्रों से ही इन मिलों में धान उपलब्ध होते हैं. भले ही ये मिल खुले हों, लेकिन पिछले एक महीने से गांवों में भी लॉकडाउन है. गांवों में धान ढुलाई के लिए ग्रामीण किसानों को वाहन नहीं मिल पा रहे.

नतीजा ये है कि मिलों में अब महज आठ से नौ दिनों तक के ही धान उपलब्ध हैं. जिससे आने वाले समय में राज्य में चावल की कमी की संभावना है. राज्य में खाद्यान्न का मुख्य स्रोत चावल है. सरकार की ओर से राहत कार्यों के तहत भी लॉकडाउन के दौरान चावल बांटे जा रहे हैं. जिससे आपूर्ति कम होने की संभावना है.

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लॉकडाउन के बाद से मिलों को दस प्रतिशत धान ही मिल रहा

रानी सती फूड एंड ग्रेन्स प्राइवेट लिमिटेड और श्री बालाजी फूड एडं ग्रेन्स प्राइवेट लिमिटेड के मालिक सुशील पोद्दार ने जानकारी दी कि राज्य में धान मिलों की क्षमता 50 टन से 400 टन तक की है. और इन मिलों में धान राज्य के अलग-अलग हिस्सों से ही आती हैं. लॉकडाउन के बाद से भले ही मिल खुले हों, लेकिन धान इन मिलों में कम उपलब्ध हो रहे हैं.

सुशील चेंबर ऑफ कॉर्मस में राइस इंडस्ट्रीज कमेटी के सदस्य भी हैं. इन्होंने बताया कि जब से लॉकडाउन हुआ है, तब से दस प्रतिशत धान ही मिलों को मिल पा रही हैं. जबकि इनकी बिक्री भी सरकारी दरों में की जा रही हैं.

सरकारी दर के अनुसार, राज्य के धान से प्रोसेस्ड चावल 25 से 27 रूपये प्रति किलो बिक रहे हैं. इनके अनुसार, राज्य में उसना चावल की अच्छी उपज होती है. जो अन्य राज्यों में भी निर्यात की जाती है. ऐसे में इन मिल मालिकों को धान प्रोसेस्ड करने से कोई लाभ नहीं है. वहीं आने वाले दिनों में धान आपूर्ति की कमी भी हो सकती है.

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अन्य राज्यों की तरह दो बार नहीं होती धान की बुआई

झारखंड में धान की बुआई जून-जुलाई के महीनें में की जाती है. जिसकी कटाई नवंबर के आसपास की जाती है. जबकि हरियाणा, पंजाब, बंगाल जैसे राज्यों में दो बार धान की बुआई की जाती है. किसान या तो धान, सरकारी केंद्रों में बेचते है. या बिचैलियों के जरिये.

अधिकांश किसानों को सरकारी क्रय केंद्रों पर धान बेचने पर जल्द से जल्द एमएसपी का लाभ नहीं मिल पाता है. वहीं बिचैलियों से धान बेचने पर किसानों को जल्द से जल्द लाभ मिलता है. धान बिचैलियों से बेचे जाने से, बिचैलियों की ओर से स्टॉक करके रख ली जाती है. धान न ही मिल पहुंच पाते हैं और न ही प्रोसेस्ड हो पाते हैं.

चेंबर अध्यक्ष कुणाल आजमानी ने बताया कि अभी जो स्थिति है, उससे ऐसा ही लग रहा है की धान अतिरिक्त स्टॉक में है. वाहनों की कमी तो है ही. लेकिन प्रोसेस्ड राइस निर्यात भी हो रहे हैं. जिससे भविष्य में चावल की कमी राज्य में होने की संभावना है.

राज्य के चावल की मांग अन्य राज्यों में

राज्य में उसना चावल की उपज अधिक है. जिसकी मांग बंगाल, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में अधिक है. काफी मात्रा में चावल यहां से इन राज्यों में निर्यात किये जाते हैं. जबकि इन राज्यों में बासमती चावल आयात किया जाता है. राज्य में बासमती चावल का उपयोग बहुत सीमित है.

सुशील पोद्दार ने बताया की राज्य में निम्न वर्गीय लोगों की संख्या अधिक है. जो उसना चावल पर निर्भर हैं. इनमें बासमती जैसे चावल खरीदने की क्षमता भी नहीं है. ऐसे में अगर स्थिति सामान्य नहीं हुई और अगर सरकार राज्य के बाहर जा रहे उसना चावल के निर्यात पर रोक नहीं लगाती है. तो खाद्यान्न की कमी हो जायेगी.

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