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पढ़ें दर्द के कराहती प्रवासी बच्ची सोनोती सोरेन की पूरी कहानी

Shyam Meera Singh

सोनोती झारखंड की रहने वाली है, परिवार गुड़गांव में कंस्ट्रक्शन मजदूरी करता था. आज से 9 दिन पहले यानी 8 मई के दिन सोनोती के परिवार ने खट्टर सरकार की वेबसाइट पर जैसे-तैसे रजिस्ट्रेशन करवाया. रजिस्ट्रेशन में जबाव आया “Thank You for Registering With Government of Hariyana For permission to travel Your Acknowledgement No. is 527020”

इससे कुछ भी अधिक रजिस्ट्रेशन रसीद पर लिखा हुआ नहीं था. कब जाना है, या आगे की सूचना कब मिलेगी. कुछ भी नहीं. अब आप सोचिए जब पता था, रजिस्ट्रेशन मजदूरों के लिए करवाए जा रहे हैं, तब जबाव केवल अंग्रेजी में ही क्यों दिये जा रहे हैं? क्या सरकार को सच में ऐसा लगता है मजदूरों को अंग्रेजी आती होगी? सीरियसली? इससे आगे क्या होना है, मजदूरों को कोई खैर-खबर नहीं, हफ्ते भर इंतजार के बाद ये परिवार गुड़गांव से झारखंड के साहिबगंज जाने के लिए पैदल ही निकल पड़ा.

करीब 10 से अधिक लोग थे और ये एक बच्ची. गुड़गांव से साहिबगंज की दूरी 1400 किमी से कुछ अधिक है. गुड़गांव से चलते-चलते प्रवासियों का ये परिवार उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले में पहुंचा. मथुरा तक इन्होंने करीब 190 किमी तक का सफर पैदल या कुछ लिफ्ट लेकर कर तय कर लिया.

कल रात के ढाई बज रहे होंगे, मथुरा के ही नेशनल हाइवे-2 की सड़क पार करते समय ये बच्ची एक एम्बुलेंस की चपेट में आ गयी. इसके सर से लेकर घुटने तक का एक-एक हिस्सा टूट रहा है. रात में ही सोनोती के परिवार ने नजदीकी पुलिस से मदद मांगी. पुलिस इन्हें अस्पताल ले जाने के लिए टालती रही, ये कहकर कि वे स्वयं फोन करके मेडिकल फैसिलिटीज का इंतजाम कर लें.

मजदूरों के पास फोन नहीं थे, न मथुरा के अस्पतालों की जानकारी थी, जो फोन थे भी वे चार्ज नहीं थे. मजदूरों की असमर्थता को देखकर अंत में पुलिस ने ही रात में ही एक डॉक्टर से बच्ची की मलहम पट्टी करवा दी. उसके बाद सोनोती को ऐसे ही छोड़ दिया, न कोई दवाई, न आगे के लिए कुछ.

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घायल और दर्द से कराहती प्रवासी बच्ची सोनोती सोरेन अपनी मां के साथ

पुलिस ने घायल बच्ची के परिवार को ऐसे ही छोड़ दिया, पैदल जहां जाना है, वहां चले जाइए. आपको बता दूं परसों रात ही गृह मंत्रालय का देशभर के लिए एक सर्कुलर जारी हुआ है कि कोई भी प्रवासी सड़कों पर, रेल की पटरियों पर पैदल न दिखे, यदि दिखे तो उन्हें मनाया जाए, क्वारंटाइन किया जाए, शेल्टर होम ले जाया जाए, उनका रजिस्ट्रेशन करवाकर सुरक्षित उनके घर तक पहुंचाया जाए.

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लेकिन यहां पुलिस ने सोनोती को शेल्टर होम ले जाने तक कि जरूरत न समझी, न ये कि इन्हें यहीं रोक लिया जाए, तब तक के लिए क्वारेंटाइन कर दिया जाए तब तक कि उनका रजिस्ट्रेशन हो और उनके जाने का इंतजाम न हो जाए. पुलिस की ये असंवेदनशीलता उस परिवार के साथ थी, जिसकी बच्ची मरने को धरी हुई थी.

रात तीन से चार बजे के बीच, सोनोती का परिवार वहीं लौट आया, जहां एक्सीडेंट हुआ था यानी NH2 हाइवे. चूंकि वहीं पर लोहे का एक फ्लाईओवर था जिसपर आराम करने के विचार से ये परिवार सड़क पार कर रहा था. तभी ये प्यारी सी बच्ची एक एम्बुलेंस की चपेट में आ गयी थी.

मैं सोनोती से अगली सुबह यानी कल सुबह के करीब 10 बजे मिला. तब सोनोती दर्द से कराह रही थी, दर्द से बिलबिलाती बच्ची का चेहरा देखने में भी मन पसीज जा रहा था.

-सोनोती को दर्द से बिलबिलाते देख, अस्पताल पहुंचाने के लिए मैंने सबसे पहले 100 नंबर पर कॉल मिलाया. दो बार मिलाने के बाद भी आपातकालीन नंबर पर फोन नहीं मिल पाया.

-उसके बाद मैंने बच्ची की वीडियो बनाकर, अपने जानने वाले मथुरा के SP(क्राइम) को व्हाट्सएप पर भेजी. उन्होंने भी सीन करने के बाद कोई जबाव नहीं दिया. जबकि वीडियो के साथ मैंने लोकेशन, और डिटेल्स भेजी थीं. पूरी वीडियो में बच्ची दर्द से कराह रहा थी, मुझे मालूम नहीं कि उस वीडियो ने पुलिस के इतने संवेदनशील नौजवान आईपीएस का भी ध्यान क्यों नहीं खींचा. (मुझे मालूम है उनके यहां जिक्र से मैं अपना एक जानने वाला खो रहा हूं)

-फिर मैंने मथुरा सदर के SDM को घायल बच्ची के बारे में फोन पर खबर दी. बताया कि ऐसे-ऐसे 8 साल की प्रवासी बच्ची घायल है और कल रात से अब तक इस बच्ची को कोई मदद नहीं मिली है. आप कृपया करके बच्ची और बच्ची के परिवार को शेल्टर होम भिजवाईए. पूरी बातचीत मैंने बेहद अदबी दिखाई, सम्मान और अनुग्रह के साथ निवेदन किया.

लेकिन मथुरा सदर के SDM ने उल्टा मुझसे ही सवाल कर दिया कि ये प्रवासी आते ही क्यों हैं? जब कहा हुआ है कि घर से नहीं निकलना है, फिर क्यों निकलते हैं? इतना असंवेदनशील जबाव सुनकर भी मैंने इतने सक्षम अधिकारी से सोनोती के लिए शेल्टर हाउस और मेडिकल असिस्टेन्स की अपील की. मथुरा सदर SDM ने मुझसे कहा “यहां से कोसी भेज दीजिए वहां से प्रवासियों को उनके राज्य ले जाया जा रहा है.

उनके लिए कोई शेल्टर की व्यवस्था नहीं दी जा रही.” आपको बता दूं कोसी मथुरा का बॉर्डर है, जिसे क्रॉस करने के बाद ही ये प्रवासी मजदूर मथुरा में प्रवेश कर सके थे. यदि ऐसी कोई व्यवस्था थी तो उन्हें बॉर्डर क्रॉस करते समय ही क्यों नहीं रोका गया. क्या ये पुलिस की लापरवाही नहीं है? जब कल मैं मथुरा से गुजरने वाले NH2 हाइवे पर प्रवासियों की रिपोर्टिंग कर रहा था, उस वक्त भी सैंकड़ों प्रवासी मजदूर पैदल-पैदल ही चले जा रहे थे.

साफ है SDM सिर्फ मुझे टाल रहे थे. या मथुरा बॉर्डर पर प्रवासी मजदूरों के प्रवेश को गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा है न ही उन्हें रोका जा रहा है. हद्द तब हो गयी, जब मैंने कहा कि आप कैसे भी प्लीज इन्हें कोसी वापस भिजवा दीजिए. तब SDM ने तल्खी के साथ उल्टा मुझसे ही कह दिया कि आप भिजवाने की व्यवस्था कर दो. आप ही भिजवाईये इन्हें.

कोसी नाम की जगह, घटनास्थल से कोई 40 किमी दूर है, लॉकडाउन में निजी वाहनों, चारपहिया कारों पर प्रतिबंध है, तो मैं उन दस से अधिक प्रवासी मजदूरों को कैसे कोसी पहुंचा सकता था? और पुलिस प्रशासन का काम पत्रकार करने बैठ जाएंगे तो बाकी पीड़ितों की रिपोर्ट कौन करेगा? जब मैंने कहा कि मैं पत्रकार हूं, मैंने नागरिक कर्तव्य के चलते आपको सूचित किया है. इन प्रवासी मजदूरों को आप कोसी पहुंचवाइये और ऐसा गृह मंत्रालय का आदेश है तो SDM ने फोन ही काट दिया.

पढ़ें दर्द के कराहती प्रवासी बच्ची सोनोती सोरेन की पूरी कहानी
सड़क हादसे में घायल प्रवासी बच्ची सोनोती सोरेन को लेकर सड़क किनारे पड़ी हुई उसकी मां, जिसे लाख मिन्नतों के बाद भी कोई मदद नहीं मिली.यही है सिस्टम.

उसके बाद दोबारा मिलाने पर SDM ने मेरा फोन नहीं उठाया. ये रवैया उत्तरप्रदेश प्रशासन का उस बच्ची के प्रति था, जो घायलावस्था में सड़क पर पड़ी थी. यदि यही बच्ची किसी अमीर, नेता, विधायक, मंत्री, उद्योगपति, अभिनेता की होती, तो क्या तब भी उत्तरप्रदेश प्रशासन का यही रुख रहता? जो 8 साल की घायल प्रवासी बच्ची सोनोती के लिए था?

-इसके कुछ मिनट बाद ही मुझे हाइवे पर जाती एक पुलिस PCR दिखी. मैंने उन्हें हाथ देकर रोका और बच्ची को शेल्टर हाउस ले जाने के लिए उनसे रिक्वेस्ट की. मैंने कहा आप एकबार बच्ची को बस देख लीजिए. वह घायल पड़ी हुई कराह रही है.

लेकिन पुलिस ने कोई अधिक रुचि नहीं दिखाई, ऐसा लग रहा था जैसे बिलबिलाती घायल बच्ची के कराहने की घटना हुई ही नहीं है. पुलिस को मनाने में मुझे दसेक मिनट लग गए. पुलिस की PCR लगातार हमें टालती रही. पुलिस इसी पर बहस करती रही कि ये जगह किस थाने में आती है. पुलिस की PCR हमसे यही कहती रही कि यहां से कुछ दूर एक चेक पॉइंट है, इनसे कहिए कि वहां जाकर शिकायत करें. मैंने कहा ये बच्ची घायल है, पीड़ित है और ये लोग ही पुलिस के पास जाएं, जबकि आप सामने हैं, ये कैसी न्याय की बात है?

आप पुलिस हैं, आप कोऑर्डिनेट करिए. उनसे कहिए. काफी बहस के बाद पुलिस की PCR वैन, लोकल चेकपॉइंट पर सूचना के लिए जाने लगी. चूंकि बच्ची लगातार कराह रही थी, इसलिए पुलिस PCR के पीछे-पीछे मैं भी अपनी बाइक लेकर चला आया. वहां चेकपॉइंट महज 200 मीटर दूर था. यहां बैठे SI ने मुझसे कहा कि ये पुल से नीचे हमारा क्षेत्र समाप्त हो जाता है, ये हमारे थाने में नहीं आता. जबकि पुल से पचास मीटर दूर लोहे के बने फ्लाईओवर पर ही बच्ची लेटी हुई थी. ऐसा दृश्य हम सिर्फ टीवी में देखते हैं.

जब पुलिस घटना और पीड़ित को छोड़ थाने क्षेत्र पर बहस करने लगती है. मैंने कहा कि आप इन्हें शेल्टर होम भिजवा दीजिए और इस बच्ची का इलाज करवाइए. उन्होंने कहा हमारे थाने क्षेत्र में कोई भी शेल्टर होम नहीं है.

SI ने मेरे सामने ही अपने सीनियर पर व्हाट्सएप मैसेज किया और ये जबाव दिखाया कि कोई शेल्टर होम नहीं है. जहां मजदूरों को क्वारंटाइन किया जा सके, ठहराया जा सके. इसकी पूरी वीडियो मेरे पास सुरक्षित है. SI ने कहा मानवता के नाते मैं उस बच्ची की दवाई की व्यवस्था करवा सकता हूं.

लेकिन हमारे यहां मजदूरों के ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं है. आप दूसरे हाइवे के थानाध्यक्ष से फोन कर लीजिए. आपको दोबारा बता रहा हूं, जहां वह बच्ची घायल पड़ी थी उसकी दूरी उत्तरप्रदेश के पुलिसकर्मियों से मात्र 200 मीटर थी. चेकपॉइंट से बच्ची तक बाइक से पहुंचने में सिर्फ एक मिनट का समय लगता है.

मैंने SI से कहा पूरे मथुरा में जहां भी शेल्टर होम हो, आप इसे वहां पहुंचवाइए. लेकिन शेल्टर होम के नाम पर पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए.

– चेकपॉइंट के SI से लेकर मैंने हाइवे थाना क्षेत्र के इंस्पेक्टर पर फोन लगाया, फोन पर ही उन्हें घायल बच्ची के बारे में सूचना दी. इंस्पेक्टर ने उल्टा मुझे इठलाकर कह दिया कि आप भी तो मानवता के नाते बच्ची को अस्पताल पहुंचा सकते हैं. इस पूरी बातचीत के दौरान पुलिस इंस्पेक्टर की टोन मुझे ही दोषी ठहराने की थी. इस पूरी बातचीत की कॉल रिकॉर्डिंग मेरे पास सुरक्षित है.

-जब बच्ची और बच्ची के परिवार के ठहरने के लिए शेल्टर होम को लेकर पूरे उत्तरप्रदेश प्रशासन, उत्तरप्रदेश पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए तो दर्द से कराहती उस बच्ची की दवाई लेने के लिए मैंने अपने एक साथी दोस्त जो स्वयं भी मेडिकल से ही सम्बंधित है उसे, पुलिस की गाड़ी के साथ दवाई लेने भेज दिया.

उससे पहले मेरे उसी दोस्त ने बच्ची के लिए दर्द की दवाई (Pain Killer) दे दी थी. लेकिन उधर से सिर्फ मेरा दोस्त ही लौटा, पुलिस नहीं लौटी. जो दवाइयां डॉक्टर ने दी थीं, हमने बच्ची के परिवार को सौंप दी.

तभी एक छोटे ट्रक जैसे दिखने वाले पिकअप ने प्रवासी मजदूरों के लिए अपनी गाड़ी रोक ली. जो कुछेक किलोमीटर आगे तक और जानी थी. मैंने सोनोती के परिवार वालों को सलाह दी कि वे शहर में ही रुकें, ताकि उनके रहने की इधर ही शहर में कोई व्यवस्था सम्भव हो सके.

मैं और सोनोती के परिवारजन, दोनों ही जानते थे पैदल-पैदल झारखंड जाना मुमकिन नहीं है, वह भी तब जब एक प्यारी सी बच्ची अपनी जान से जूझ रही हो. बावजूद उसके प्रवासी मजदूरों का वह परिवार उम्मीद हारकर आगे जाने पर विचार कर चुका था.

पिकअप रुकी, प्रवासी परिवार उसमें चढ़ गए. सोनोती को भी उसी ट्रक नुमा पिकअप में चढ़ा लिया गया. मुझे याद है अर्धविक्षिप्त सी बच्ची जाते-जाते हाथ हिलाकर बाय कर रही थी. वो दृश्य अब भी मेरी आंखों में चल रहा है. मुझे मालूम था सोनोती से ये हमारी आखिरी मुलाकात है. ये ही आखिरी दुआ सलाम है. मन व्यथित नहीं था लेकिन गीला जरूर हो चुका था. ये जानकर भी कि पूरी आपदा इस वक्त “छूने” में है.

जाते-जाते सोनोती के हाथ को अपने हाथ में लेने के मोह से मैं बच न सका. छूने से मरते हैं, भला कोई मरता है. छुअन आत्माओं की वस्तु विनिमय है. मैं जब कुछ अधिक नहीं कर सका तो छूकर माफी मांग ली. पत्रकार के रूप में माफी मांगने का एक यही विकल्प मेरे पास था. सोनोती ने माफ किया, नहीं किया मालूम नहीं.

सोनोती को जाते-जाते देख मेरे मन में एक ही प्रश्न बार-बार आ रहा था. उत्तरप्रदेश पुलिस ने सोनोती की मदद करने में कोई रुचि नहीं दिखाई. प्रशासन ने भी बच्ची पर दया नहीं की. SDM, SP, SO, किसी का भी मन उस बच्ची के लिए नहीं पिघला. लेकिन उस पिकअप के ड्राइवर को ही दया क्यों आयी, मालूम नहीं.

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