वाराणसी : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शनिवार को विकास के सही अर्थ को समझने की जरूरत पर बल दिया और समाज विज्ञानियों से पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए विकास के तरीके खोजने की अपील की। इंडियन सोसियोलॉजिकल सोसायटी के 40वें राष्ट्रीय महासम्मेलन का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता में छिपी हुई है और एकरूपता लाने की अब तक की तमाम कोशिशें असफल ही साबित हुई हैं।
राष्ट्रपति ने अन्ना हजारे द्वारा किए गए आंदोलन का संदर्भ देते हुए कहा कि जन जागरूकता के जरिए लोकशक्ति में इजाफा हुआ है और सरकार को सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत कायम करने के लिए बाध्य किया है।
राष्ट्रपति ने कहा, “इससे पता चलता है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था ऐसा रूप ले चुकी है जिसमें विधान और कार्य का मूल्यांकन एवं निरीक्षण आम जनता किसी भी स्तर पर कर सकती है, भले ही उसके पास निर्वाचित प्रतिनिधि को उसके कार्यकाल के बीच से अपदस्थ करने का अधिकार नहीं है।”
राष्ट्रपति ने कहा कि समाजवेत्ताओं को देश की सफलता एवं विफलता का बारीक मूल्यांकन करना चाहिए।
मुखर्जी ने कहा, “विकास के सही अर्थ को समझने की जरूरत है। क्या इसका आशय सिर्फ सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि से है या इसका संबंध सकल राष्ट्रीय खुशी से भी है, जैसा कि भूटान ने अपनाया है?”
विकास, विविधता एवं लोकतंत्र विषय पर राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि भारत जल्द ही आठ से नौ फीसदी की वार्षिक वृद्धि दर हासिल कर लेगा और तीन हजार अरब की अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा। (आईएएनएस)




