
Ranchi : बुधवार को राजधानी रांची के करमटोली में सीएम हेमंत सोरेन ने केंद्रीय धुमकुड़िया भवन का शिलान्यास किया. लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की राशि से 12 महीने के भीतर इस भवन को तैयार किया जायेगा. मौके पर आदिवासी कल्याण मंत्री चंपई सोरेन, पूर्व मंत्री सुबोधकांत सहाय, विधायक बंधु तिर्की औऱ विधायक राजेश कच्छप सहित अन्य दिखे. पर इस कार्यक्रम में मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव की अनुपस्थिति खटकी. कहा जा रहा है कि वे बुधवार को अपने आवास में पार्टी के जिलाध्य़क्षों के साथ बैठक में थे. इसे लेकर कई बातें उठ रही हैं.
करमटोली के आयोजन स्थल से महज 200 मीटर की ही दूरी पर बरियातू में उनका आवास है. जनजातीय समाज (उरांव) के एक बड़े नेता हैं, मंत्री हैं, प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं. बावजूद इसके उनको आमंत्रित नहीं किये जाने पर चर्चा होने लगी है.
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सरकारी कार्यक्रमः धुमकुड़िया समिति
धुमकुड़िया समिति (अभी भंग) के कार्यकर्ता औऱ पूर्व में करमटोली केंद्रीय सरना समिति के प्रमुख रहे सूरज टोप्पो के मुताबिक यह एक सरकारी (कल्याण विभाग) कार्यक्रम था. ऐसे में मेहमानों की सूची सरकार के स्तर से तैयार की गयी थी.
समिति की कार्यसमिति की बैठक में सुबोधकांत सहाय, राजेश कच्छप और बंधु तिर्की को धुमकुड़िया भवन के लिए जमीन दिलाने सहित अन्य योगदान के लिए बुलाये जाने पर विचार हुआ था.
रामेश्वर उरांव बेशक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं पर उन्हें सरकार की ओऱ से आमंत्रित किये जाने या नहीं किये जाने पर वे कैसे कुछ कह सकते हैं. बंधु औऱ राजेश उरांव जनजाति से आते हैं. इस नाते उरांव समाज के नेता कार्यक्रम में शरीक तो थे ही.
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सरना समाज को टारगेट कर रही मिशनरीः शिवशंकर
पूर्व भाजपा विधायक शिवशंकर उरांव कहते हैं कि रामेश्वर उरांव को बुलाना, न बुलाना अपनी जगह एक अलग विषय है. पर बंधु और अन्य नेताओं का मोरल राइट तो बनता ही नहीं. सरना संस्कृति, विरासत को छोड़ वे चर्च की शरण में जा चुके हैं.
वास्तव में यह केंद्रीय धुमकुड़िया नहीं, ईसाइयों का नकली धुमकुड़िया है. मिशनरी समाज में धुमकुड़िया की तो कहीं बात ही नहीं. चर्च लगातार सरना समाज की विरासत को मिटाने की साजिश में लगा रहा है.
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धुमकुड़िया से ट्राइबल समाज का नाता
सूरज टोप्पो बताते हैं कि जनजातीय समाज में हर गांव में धुमकुड़िया हुआ करता था. धुमकुड़िया एक ऐसा स्थल है जिसका आदिवासी समाज से खास तौर पर उरांव जनजाति की परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. रांची और इसके पश्चिमी हिस्से लोहरदगा, गुमला में उरांव जनजाति की बहुलता है. उनके बीच धुमकुड़िया की जबर्दस्त अहमियत रही है.
धुमकुड़िया पुरखों के अनुभवों और ज्ञान को नयी पीढ़ी को हस्तांतरित करने का सशक्त जरिया रहा है. ट्राइबल समाज के युवाओं को जिम्मेदार बनाने, उन्हें सामाजिक परंपराओं से अवगत कराने और व्यावहारिक जीवन के लिए प्रशिक्षित करने की परिपाटी इसके जरिये रही है.
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