
Faisal Anurag
विदेश में भारत की सेकुलर छवि को मजबूती प्रदान करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने भारतीय दूतावासों को एडवाइजरी जारी किया है. अध्योध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भारतीय संविधान की मजबूती और न्यायिक संस्थानों की स्वतंत्रता के आलोक में पेश करने का निर्देश दिया है.
भारत के वैश्विक इमेज के लिए चिंतित मोदी सरकार के इस एडवाइजरी का उल्लंधन मुख्यमंत्री रघुवर दास सहित कुछ भाजपा नेता खुलेआम कर रहे हैं. रघुवर दास ने तो इस मामले को झारखंड में चुनावी प्रचार का एजेंडा बनाने का प्रयास किया है.
बड़े पदों पर बैठे नेताओं की इस भूमिका से न केवल भारत के संविधान के मूल्यों का उल्लंधन हो रहा है, बल्कि न्यायिक निष्पक्षता को भी विवादों में डाला जा रहा है. चुनावी कामयाबी के लिए भाजपा के नेताओं के इस तरह के बयानों पर पार्टी नेतृत्व खामोश है.
यह सामान्य राजनीतिक आचरण तो नहीं ही कहा जा सकता है.
Official talking points to embassies on Ayodhya verdict leaked. The government’s repeated tough talk on India’s “internal affairs” is belied by the lengths it goes to to explain those internal matters worldwide, while refusing to brook questioning from within the country. https://t.co/H3Na6XPeZ2
— Suhasini Haidar (@suhasinih) November 16, 2019
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दूतावासों के लिए जारी एक प्रपत्र में ग्यारह निर्देष दिये गये हैं. विभिन्न देशों में दूतावास इसी एडवाइजरी के आलोक में भारत का पक्ष पेश कर रहे हैं. भूटान के भारतीय दूतावास ने इस आशय का प्रेस रिलीज जारी किया है.
इस प्रपत्र की मूल बात यह है कि भारत के संविधान में अल्पसंयख्कों के हितो की गारंटी है. और भारत में न्यायपालिका निष्पक्ष है और स्वतंत्र है. उसके फैसले को कोई प्रभावित नहीं कर सकता है. इस प्रपत्र में कहा गया है कि भारत की न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी मजबूती संविधान के बुनियादी ढांचे में ही अंतरननिहित है.
भूटान के सबसे बड़े अखबार द भूटानीज के संपादक तेनजिंग लामसांग ने भारत सरकार का प्रपत्र ट्वीट कर कहा है कि भारत सरकार ने हाइडल पावर प्रोजेक्ट के लिए बुलायी गयी प्रेस कांफ्रेस में एक प्रेस रिलीज जारी किया है. उन्होंने लिखा है कि मेरे रिपोर्टर ने इस प्रेस रिलीज को ले कर अपने कंफयुजन की चर्चा करते हुए इस प्रपत्र की जानकारी एक दिन बाद दी.
मैंने इस प्रपत्र के प्वाइंट 8 और 9 को बेहद दिलचस्प पाया. इस ट्वीट को द हिंदू की नेशनल एडिटर सुहासिनी हैदर ने रिट्वीट किया है. सुहासिनी सुब्रहमण्यम स्वामी की पुत्री हैं.
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दूसरी ओर भाजपा के नेताओं ने इस फैसले को वोटरों के धु्रवीकरण के नजरिये से पेश किया है. रघुवर दास ने इसमें अग्रणी भूमिका निभायी है. रघुवर दास ने अपने एक भाषण में कहा कि कांग्रेस ने अध्योध्या मामले को लंबे समय से लटकाये रखा है.
लेकिन केंद्र में बहुमत की सरकार बनते ही राम मंदिर बनाने की राह प्रशस्त कर दी गयी. रघुवर दास के भाषण से जाहिर होता है कि वे अध्योध्या फैसले के लिए सारा श्रेय भाजपा और उसके नेतृत्व को ही दे रहे हैं.
यह बयान न केवल न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता को विवादित कर रहा है, बल्कि यह भी बताने का प्रयास है कि मोदी सरकार के कारण ही अध्योध्या विवाद का फैसला आया है. दुनिया के अनेक देशों में भारत की छवि प्रभावित हुई है. बंगला देश में तो यह बात भी तेजी से फैलायी गयी है कि भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ केंद्र सरकार ने इस तरह का फैसला करवाया है.
कश्मीर के सवाल पर पहले ही तुर्की, मलेशिया ओर ईरान जैसे देशों के कड़े तेवर सामने आ चुके हैं. इसके अलावे अमरीकी कांग्रेस की मानावाधिकार समिति और ब्रिटेन की कई पार्टियों ने इस मामले पर कड़ा रुख दिखाया है.
दुनिया के कई अखबारों ने भी अध्योध्या फैसले को ले कर जो रुख दिखाया है, उससे भारत सरकार की छवि प्रभावित हुई है. भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ट्वीट कर इस तरह की खबरों का खंडन किया है.
ऐसे पेचीदा सवाल पर भारत की राजनीति में चुनावी नजरिये से जिस तरह की बातें भाजपा नेता कर रहे हैं वह न केवल भारत की वैश्विक छवि के लिए घातक है, बल्कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मूल्यों की घोर अवमानना भी है.
चुनावों के समय इस तरह की हरकत पर केंद्रीय नेतृत्व की खामोशी इस तरह के बयानों को हवा ही दे रही है. चुनाव के समय किसी भी तरह की गोलबंदी करने की प्रक्रिया लोकतंत्र ओर प्रगति की राह का बाधक ही होता है.
चुनावों के प्रचार अभियान को संवेदनशील सवालों पर केंद्रित करना और चुनाव के बाद विकास का राग अलापने का अंतरविरोध बताता है कि भाजपा अपने ही पांच सालों के परफारमेंस को ले कर आश्वसत नहीं है. झारखंड के विधानसभा चुनाव में जिस तरह भाजपा ने प्रत्याश्यिों को टिकट दिया है, उससे भी जाहिर होता है कि अपराध और भ्रष्टाचार को ले कर जो बातें कही जाती रही हैं, भाजपा का अचरण ठीक उसके उलटा ही है.
भाजपा की केंद्र और राज्यों की तमाम सरकारों में सरयू राय इकलौते मंत्री थे जो अपनी ही सरकार की कमियों और भ्रष्टाचार को ले कर मुखर रहे हैं. ई भी स्वस्थ लोकतांत्रिक दल इस तरह की आलोचना की स्वतंत्रता की हर हाल में हिफाजत करता है.
लेकिन भाजपा ने न केवल सरयू राय को अपमानित किया, बल्कि उन्हें चुनाव के लिए टिकट भी नहीं दिया. इससे जाहिर होता है कि पार्टी किसी भी तरह की आलरोचना को सुनने तक को तैयार नहीं है. सरयू राय को तो यहां तक कहना पड़ा है कि उन्होंने दो मुख्यमंत्रियों को भ्रष्टाचार के कारण जेल भेजवाया है.
वे नहीं चाहते कि तीसरा भी जेल जाये. इस से जाहिर होता है कि उन्होंने रघुवर दास की सरकार के भ्रष्टाचार को ले कर स्पष्टता दिखायी है. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इस नेता की बात नहीं सुन कर साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार को ले कर उसका नजरिया बेहद सबजेक्टिव है.
वह भ्रष्टाचार केवल विपक्षी दलों के नेताओं में ही देखती है. यदुरप्पा के मामले में भाजपा ने जो नजरियरा अपनाया, अब दूसरे राज्यों में उसी पर चल रही है.
भाजपा ने भ्रष्टाचार के आरोपी और अपराधियों के आरोपियों को टिकट देने की प्रतिस्पर्धा में पहला स्थान हासिल कर झारखंड में राजनीतिक अवसरपरस्ती का नया चेहरा दिखाया है.
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