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प्रशांत किशोर के लिए चुनौतियां कम नहीं

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Faisal Anurag

प्रशांत किशोर वैसे तो मीडिया के प्रिय रहे हैं. लेकिन मंगलवार के प्रेस कॉन्फ्रेंस ने कई सवालों को जन्म दिया है. इसका कारण प्रशांत किशोर की अब तक की भूमिका ही रही है.

राजनीतिक दलों के चुनाव प्रबंधन के लिए मशहूर हुए प्रशांत किशोर के इस दावे को संदेह से देखा जा रहा है कि वे राजनीति में सचमुच किसी बड़े बदलाव के संकल्प के साथ आए हैं और वे स्वतंत्र भूमिका निभाएंगे जैसा कि उन्होंने दावा किया है.

बिहार वैसे भी एक ऐसी राजनीतिक भूमि है, जहां किसी भी व्यक्ति की कड़ी परीक्षा ली जाती है. चुंकि अबतक प्रशांत किशोर ने नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के साये के साथ ही पहचान बनायी है. इसलिए गांधी बनाम गोडसे की राह की उनकी बात को कड़े परीक्षण के दौर से गुजरना पड़ रहा है.

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प्रशांत किशोर को इस सवाल का जबाव तो देना ही होगा कि जब वे नरेंद्र मोदी के चुनाव का प्रबंधन कर रहे थे, तब गोडसे की राह थी या नहीं या जब नीतीश कुमार ने उन्हें अपनी पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया तो नीतीश भाजपा के साथ थे या नहीं.

प्रशांत किशोर 2019 के लोकसभा चुनाव को एक विभाजक रेखा बता रहे हैं, लेकिन यही वह दौर है जब वे नीतीश कुमार की पार्टी के लिए भाजपा के साथ वार्ताकार थे. बावजूद इन सवालों के प्रशांत किशोर ने बिहार में एक नई राजनीतिक बहस तो शुरू कर ही दी है.

बिहार में उन्होंने एक ऐसे समय में गांधी बनाम गोडसे की बहस को खड़ा किया है जबकि बिहार का चुनाव मात्र छह माह दूर है. चुनाव की रणनीति के बतौर सभी पार्टियां सक्रिय है. माना जा रहा है कि बिहार में एनडीए बनाम राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच ही संघर्ष होगा.

इस ध्रुवीकृत चुनाव को प्रशांत किशोर कितना प्रभावित कर सकेंगे. उन्होंने एक करोड़ युवाओं को अपने साथ लाने की महत्वंकांक्षी योजना जरूर घोषित की है लेकिन अगले दस सालों में देश के 10 उन्नत प्रदेशों में बिहार को शामिल करने का उनका नारा युवाओं को कितना प्रभावित कर सकेगा यह तो समय ही बतायेगा.

बिहार में एक तरफ जहां दिल्ली से भी ज्यादा आक्रामक चुनाव प्रचार की रणनीति के साथ एनडीए तैयार है, वहीं विपक्ष के पास भी उस चुनौती का सामना करने का हुनर और सामाजिक समीकरण मौजूद है.

बावजूद इसके लोकसभा चुनाव में बिहार में भाजपा ने एक जातियों के विभिन्न तबकों के बीच राष्ट्रवाद के अलावे भी हिंदुकरण का आकर्षण पैदा कर समर्थन बढ़ाया है.

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लेकिन बिहार के चुनाव में उसके टिकाये रखने की संभावना को लेकर सवाल मौजूद हैं. झारखंड के विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव में मिले वोट शेयर को भाजपा बचाये नहीं रख सकी और सामाजिक समीकरणों में भी भाजपा लोकसभा वाली स्थिति नहीं बना पायी. बिहार में इसके दोहराव की संभावना को एकसिरे से खारिज नहीं किया जा सकता.

यानी एनडीए के लिए वोट शेयर को बनाये रखना आसान नहीं है. राजद यदि विपक्ष को पूरी तरह अपने साथ लाने में कामयाब हुआ, तो एनडीए के लिए नीतीश कुमार का नेतृत्व होने के बावजूद सत्ता वापसी आसान प्रक्रिया नहीं होगी. बिहार के जानकार बताते हैं कि राजद के लिए जरूरी है कि वह लेफ्ट सहित तमाम ताकतों के साथ सम्मानजनक समझौता करे.

दिल्ली की तुलना में बिहार एक ज्यादा जटिल राज्य है और सामजिक समीकरणों की अहम भूमिका है. राजद के पास सामाजिक समीकरण को अपने पक्ष में करने के अवसर मौजूदा हालत में कहीं ज्यादा सहज हैं. नीतीश कुमार के समाने कई सवाल हैं जिसमें उनकी सुशासन छवि का कमजोर होना भी है.

बिहार में नीतीश कुमार का वह मास्टर स्ट्रोक जिसको आधार बना कर किसी भी से वे आगे निकलते रहे हैं, इस बार बहुत कमजोर दिख रहा है. वैसे नीतीश कुमार को अपनी छवि का सहारा तो है लेकिन प्रशांत किशोर ने जिस पिछलग्गूपन का सवाल उठाया है उसका जबाव देना नीतीश कुमार के लिए आसान नहीं है.

पिछले तीन सालों में हरेक मामलों में जिस तरह भाजपा की नीतियों के साथ नीतीश कुमार ने तालमेल बैठाया है उससे उनके एक खास समर्थक आधार में बिखराव हुआ है. ऐसी हालत में प्रशांत किशोर उनके खिलाफ सवाल उठा कर भी उनके लिए राहत पहुंचा सकते हैं.

वैसे प्रशांत किशोर की तुलना में कन्हैया कुमार की यात्राओं को बिहार की राजनीति में गौर से देखा जा रहा है. बावजूद इसके कि लेफ्ट में व्यापक एकता की चुनौती बरकरार है. किसी मुद्दे पर समर्थन जुटाना एक बात है लेकिन उसके वोट में तब्दील होना दूसरी.

तेजस्वी यादव की सभाओं में भी भीड़ हो रही है. बिहार में सभाओं की भीड इस बात की गारंटी नहीं है कि वह किसी के भविष्य की संभावना उससे बलबती है. बिहार का हर चुनाव दिलचस्प होता है. अनेक कोणों की मौजूदगी के बावजूद सीधा टकराव ही होता रहा है. लेफ्ट पार्टियों को भी देश के हालात के अनुकूल ही अपनी रणनीति को अंजाम देना होगा, जहां विपक्ष के वोटों का कम से कम बिखराव हो. लेकिन वोट का बिखराव रोकने का दायित्व राजद पर ज्यादा है.

जानकारों के इस विश्लेषण के बावजूद प्रशांत किशोर के कदमों पर नजर रखने की जरूरत है. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुकांत नागार्जुन ने फेसबुक वॉल पर पोस्ट में लिखा है: नीतीश कुमार की राजनीतिक शैली और शासन काल के बिहार के बारे में प्रशांत किशोर की बातों से मीडिया अधिक आहत दिखता है. यह विकास का ही नीतीश-स्वरूप है.

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