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मनरेगा कानून के 13 सालः राज्यभर में मजदूरों का प्रदर्शन, रैलियां और सम्मेलन

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Ranchi: आज नरेगा दिवस के अवसर पर झारखंड के हज़ारों नरेगा मज़दूर सड़क पर उतरे. राज्य के कई हिस्सों में  रैलियां निकलीं और प्रदर्शन हुए. 30 से अधिक प्रखंडों में मज़दूरों ने नरेगा में कम मजदूरी दर, काम की कमी, मज़दूरी भुगतान में देरी और मजदूरों के अन्य अधिकारों पर हो रहे प्रहार के खिलाफ़ आवाज़ उठायी. साथ ही साथ मज़दूरों ने अपने काम के अधिकार व सम्मान के साथ जीवन जीने के लिए कुछ मांगें रखीं. मजदूर नेताओं ने कहा कि आज नरेगा कानून को लागू हुए 13 साल हो गये हैं. लेकिन मज़दूरों के लिए काम का अधिकार महज़ मज़ाक बन के रह गया है.

लातेहार, चंदवा

मज़दूरों ने समय पर काम या मज़दूरी न मिलने के कारण हुई कठिनाइयों के बारे में चर्चा की. लातेहार ज़िले के चंदवा प्रखंड की एक सभा में कई मजदूरों ने कहा कि उन्होंने जॉब कार्ड के लिए नवम्बर 2018 में आवेदन दिया था. लेकिन अभी तक उन्हें कार्ड निर्गत नहीं हुआ है. दुमका ज़िले के जामा प्रखंड के कुछ मजदूरों ने बताया कि योजनाओं की कमी का बहाना बनाकर अक्सर ग्राम पंचायत प्रतिनिधि उन्हें रोज़गार नहीं देते. महुआडार प्रखंड की सभा में एक मज़दूर ने कहा कि चूंकि कर्मचारियों को लापरवाह होने पर दंड नहीं मिलता, वे मजदूरों के अधिकारों का बेरहमी से हनन कर रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि यह माहौल तभी सुधरेगा अगर काम न देने वाले कर्मचारियों से दंड वसूला जायेगा. रोज़गार के अन्य उपायों की कमी को देखते हुए, मज़दूरों ने यह मांग रखी कि हर ग्रामीण परिवार को साल में कम से कम 150 दिन के काम की गारंटी मिलनी चाहिए.

गुमला, बसिया

गुमला ज़िले के बसिया प्रखंड में आयोजित 500 मज़दूरों के एक धरने में अनेक मज़दूरों ने समय पर मज़दूरी न मिलने की शिकायत की. अनेक मज़दूरों का मज़दूरी भुगतान बकाया है. क्योंकि प्रखंड प्रशासन द्वारा उनके जॉब कार्ड को रद्द कर दिया गया है. अनेक मज़दूर अपनी मज़दूरी से इसलिए वंचित हैं क्योंकि उनकी मज़दूरी नरेगा की ऑनलाइन व्यवस्था में रिजेक्ट हो गयी है. जब मौके पर उपस्थित झारखंड नरेगा वॉच की सह-सयोंजिका तारामणि साहू ने इन मुद्दों को उठाया, तो कार्यक्रम में उपस्थित स्थानीय पदाधिकारी उठकर चले गये. उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी मज़दूर को देरी से भुगतान होता है, तो उसे मुआवज़े के रूप में बकाया मज़दूरी का 0.05 प्रतिशत का अधिकार है. पर अधिकतर मजदूरों को मुआवज़े की इतनी कम राशि भी नहीं मिलती. उन्होंने कहा कि जिस भी मज़दूर को समय पर मज़दूरी नहीं मिलती, उसे मज़दूरी भुगतान कानून के अनुसार 2,500 रुपए का मुआवज़ा मिलना चाहिए. गढ़वा ज़िले के मेराल प्रखंड में मज़दूरों के समूह को नानपाटिया देवी ने कहा कि 2015-16 में 14 दिनों के लिए किये गये काम का भुगतान अभी भी लंबित है. उनके गांव के लगभग 32 मज़दूरों का भुगतान बकाया है.

लातेहार, महुआडार

मज़दूरों ने नरेगा की तुच्छ मज़दूरी दर के विरुद्ध अपना आक्रोश ज़ाहिर किया. इस वर्ष झारखंड की मज़दूरी दर में कुछ भी बढौतरी नहीं हुई है. साथ ही साथ, वर्तमान नरेगा मज़दूरी राज्य की न्यूनतम मज़दूरी दर से 71 रुपये कम है. मौके पर महुआडार के नरेगा सहायता केंद्र की अफ़साना ने कहा कि एक-के-बाद-एक वेतन आयोग की अनुशंसों के अनुसार सरकारी अफ़सरों के वेतन में लगातार वृद्धि होती है. लेकिन मज़दूरों पर यह नियम लागू नहीं होता. उन्होंने यह मांग रखी कि खाद्य सामग्रियों में महंगाई एवं सम्मानजनक जीवन की आवश्यकता को देखते हुए, नरेगा मज़दूरों को कम-से-कम सातवें वेतन आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार तय 18,000 प्रति माह की न्यूनतम मज़दूरी दी जाये.

रांची  

झारखंड में काम कर रही शोधकर्ता सकीना धोराजीवाली ने नरेगा बजट के साल दर साल अपर्याप्त होने  पर चिंता ज़ाहिर की. 2019-20 के बजट में मनरेगा बजट को 61,084 करोड़ से घटाकर 60,000 करोड़ कर दिया गया है. इस वर्ष के स्वीकृत लेबर बजट को ही पूर्ण करने के लिए ही कम-से-कम और 5000 करोड़ की आवश्यकता होगी. इससे स्पष्ट समझा जा सकता है कि 2019-20 की शुरुआत व्यापक पैमाने पर लंबित मज़दूरी से होगी एवं मज़दूरों को मिलने वाले रोज़गार में और गिरावट आयेगी.

पलामू  

महिलाओं, बुज़ुर्गों व आदिम जनजाति के समुदाय की नरेगा में बहुत कम भागीदारी पर चिंता जताते हुए विकास सहयोग केंद्र (पलामू) के जवाहर मेहता ने दैनिक मज़दूरी और काम की मात्रा के अनुसार रोज़गार देने की मांग की. मज़दूरों के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों पर बल देते हुए उन्होंने समग्र सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की मांग की. जिसके तहत मातृत्व भत्ता, जीवन बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएं, पीएफ़, ग्रेच्युटी एवं बच्चों की गुणवत्तापूर्वक शिक्षा का अधिकार की मांग की.

मनिका  

झारखंड नरेगा वॉच के संयोजक जेम्स हेरेंज ने मनिका में रैली को संबोधित करते हुए कहा कि नरेगा झारखंड जैसे गरीब राज्य का चेहरा बदल सकता है. उन्होंने सामाजिक सुरक्षा पेंशन व मातृत्व भत्ते की आवश्यकताओं पर बात रखते हुए पेंशन की राशि बढ़ाकर कम-से-कम 2,500 रु प्रति माह करने की मांग की. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के अनुसार गर्भवती महिलाओं को बिना किसी शर्त 6,000 रु प्रति बच्चे का मातृत्व भत्ता देने की मांग की. मज़दूरों ने प्रशासन को राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री के नाम उक्त मांगों के साथ ज्ञापन सौंपा.

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