Opinion

कंफर्ट ज़ोन से परहेज करने वाले और ज़मीन से जुड़े पत्रकार थे कमाल खान

Mukhtar Khan

 

पत्रकारिता की दुनिया से अचानक कमाल खान का यूं जाना बहुत ही दुखद है, पिछले 22 वर्षों से वे पत्रकारिता के पेशे से जुड़े थे. एनडीटीवी में रहते हुए जिस तरह धीर-धीरे उनकी पत्रकारिता में निखार आता गया वो काबिल-ए-तारीफ है.

 

प्रायः किसी भी चैनल से जुड़ने के बाद पत्रकार फील्ड की पत्रकारिता छोड़ डेस्क तक पहुंचना की फ़िराक में लगे रहते हैं. लेकिन कमाल खान अंत तक ज़मीन से ही जुड़े रहे. और यहीं से ज़मीनी हक़ीक़त से दुनिया को आगाह करते रहे. उन्होंने लखनऊ छोड़ दिल्ली जाने की दौड़ से अपने आप को अलग ही रखा. वे दाफ्तरी वातावरण में पहुंचकर अपने आप को कैद नहीं करना चाहते थे. अवाम के बीच रहकर उन्होंने सदा अवामी मसायल को ही फोकस किया.

वे इस बात से बखूबी वाकिफ रहे होंगे कि डेस्क से एंकरिंग करने में एक व्हाइट कॉलर जॉब का सुरूर है, लेकिन इस मोह से उन्होंने अपने आप को सदा बचाए ही रखा. दफ्तर में आप के पास रिसोर्स मैटेरियल के रूप में पुस्तकें तो होती हैं लेकिन ज़मीन से जुड़ी वह हक़ीक़त नहीं होती जिस में समय समय पर बदलाव आता रहता है.

हम ने देखा प्राय: बहुत से पत्रकार यहां पहुंचकर एक तरह के कंफर्ट ज़ोन के आदी हो जाते हैं. और डेस्क पर बैठकर बौद्धिक जमा खर्च की पत्रकारिता करने लगते हैं.

कमाल खान की पत्रकारिता कई मानो में औरों से अलग थी. वे माइक हाथ में लेकर निरा बकवास ही नहीं किया करते थे. उनकी रिपोर्टिंग से उनकी ज्ञान और समझ की गहराई का पता चलता है. लखनऊ में रहते हुए उन्होंने यहां से उत्तर भारत की राजनीति, सामाजिक जीवन, यहां हो रहे आंदोलन, यहां की सांस्कृतिक धरोहर, मंदिर मस्जिद की सियासत प्रत्येक विषयों को बहुत ही सलीके के साथ पेश किया. हमने उन्हें कभी तल्ख होते नहीं देखा, रिपोर्टिंग के समय उनकी शालीनता गज़ब की हुआ करती थी.

 

अपनी रिपोर्टिंग पर उन्होंने कभी अपनी ज़ाति कमज़ोरियों को हावी नहीं होने दिया. कड़वी से कड़वी बात वह निहायत ही अदब के साथ पेश करने का गुर, वे खूब जानते थे.

पिछले दो महीनों के अंतराल में हम ने इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दो बड़े पत्रकारों को खो दिया. एक विनोद दुआ और दूसरे कमाल खान, मुझे विनोद दुआ और कमाल खान की शैली में बहुत हद तक समानता नज़र आती है. हो सकता है कमाल विनोद दुआ से प्रभावित रहे हों, विनोद दुआ जहां अपनी रिपोर्टिंग के दौरान ऊर्दू के खूबसूरत अशआर और पंजाबियत का इस्तेमाल कर एक समां सा बांध देते, वहीं कमाल शेरों के साथ-साथ दोहे, और श्लोकों का भी खूब प्रयोग किया करते थे.

कमाल खान की रिपोर्टिंग में कहीं भी द्वेष या तास्सुब की भनक तक नहीं होती. कमाल भारतीय संस्कृति और धर्म की गहरी समझ रखते थे. उन्होंने कई बार अयोध्या जा कर वास्तविक स्थिति की बड़ी बेबाकी के साथ रिपोर्टिंग की.
अपनी रिपोर्ट के दौरान वे किंचित भी लाऊड नहीं होते, शुरू से आखिर तक चेहरे पर वही संजीदगी. उनके चेहरे की यह संजीदगी अपने पेशे के प्रति उनके कमिटमेंट को दर्शाती थी. जब कभी वे अयोध्या, फैज़ाबाद से रिपोर्टिंग करते तो रामायण का कोई न कोई प्रसंग ज़रूर सुनाते, उनकी शैली से लगता जैसे श्री राम के आदर्श उनके रोम रोम में बसे हों….

 

वहीं जब लखनऊ तहज़ीब से जुड़े इमाम बाड़ों की रिपोर्टिंग करते तो हसन हुसैन के जीवन मूल्यों को एक एक कर बताते जाते. इस लिए उनकी रिपोर्टिंग में एक अनोखापन सा जुड़ गया था. अपनी पांच से सात मिनट की रिपोर्टिंग में वे दर्शकों पर के मानस पर एक प्रभाव छोड़ जाते.

कहते हैं कि वे अपनी किसी भी रिपोर्टिंग से पहले उस विषय का भरपूर अभ्यास करते, किताबों के वर्क पलटते इस के बाद अपनी रिपोर्ट पेश करते. यानी पांच मिनिट की रिपोर्ट के लिए घंटों की तयारी करते.
कमाल बखूबी ये जानते होंगे, सब से तेज़… और सनसनी पैदा करने वाले टीवी रिपोर्टरों के इस दौर में इस तरह की मेहनत करने वाले पत्रकार की कोई कद्र नहीं है. वे यह भी जानते थे कि इस तरह की पत्रकारिता में अवश्य ही उन्हें बहुत कुछ खोने के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा. अपने पीछे से आते हुए लोगों को आगे जाते हुए भी उन्होंने जरूर देखा होगा.

 

कमाल खान ने अपने पेशे के प्रति ईमानदार बने रहे, अपने ज़मीर की आवाज़ को उन्होंने हमेशा तरजीह दी. यही ईमानदारी,प्रतिबद्धता, सरोकार के कारण ही उनकी रिपोर्टिंग में हमे एक आत्मविश्वास और सच्चाई नज़र आती है.
पत्रकारिता के पेशे से जुड़े लोगों के लिए कमाल खान की पत्रकारिता ज़रूर एक आदर्श बनी रहेगी.

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