
Faisal Anurag
इस साल तीन खरब की इकोनॉमी बनाने का लक्ष्य रखा गया है. यानी इस साल 1 खरब से अधिक की वृद्धि. बजट का मकसद इकोनॉमी को रिफॉर्म,परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म करने पर वित्त मंत्री का जोर है.
यह पांच सालों से चली आ रही नीति में किसी बड़े बदलाव का संकेत इससे नहीं मिलता है. लेकिन यह साफ है कि भारत का बाजार एफडीआइ के लिए पूरी तरह खोला जाएगा और निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाएगा. मोदी सरकार इस नीति पर ही पिछले पांच सालों से चलती आ रही है.
विदेशी निवेश के दरवाजे तमाम कोर सेक्टर में खोलने की घोषणा इस बजट का सार है. इसमें किसानों, तमाम क्षेत्रों के समूहों और युवाओं की आकांक्षाओं को साधने का उपक्रम दिखाने की कोशिश जरूर की गयी है, लेकिन वास्तविकताओं को कैसे हल किया जायेगा, इसका जबाव देने में बजट कारगर नहीं दिख रहा है.
मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम ने आर्थिक समीक्षा पर बोलते हुए मोदी सरकार की भावी आर्थिक नीतियों और प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर दिया है. निर्मला सीतारमण का बजट भी इन्हीं नीतियों के बीच विभिन्न तरह के आर्थिक अंतरविरोधों को साधने का उपक्रम है.
कॉरपारेट की अपेक्षाओं को प्राथमिकता के साथ आमलागों के बीच भी लोकप्रिय बने रहने वाली घाषणाओं और योजनाओं के बीच बजट झुलता नजर आया है. मोदी सरकार-2 को लेकर कॉरपारेट की अपेक्षाओं का साफ असर बजट पर है.
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भारी जनसमर्थन से दूसरी बार जीते मोदी लोगों के विश्वास को भी बनाये रखने के लिए तत्पर हैं. सुब्रमण्यम ने इसे ही मुख्यतः नीले आसमान मुक्त उड़ान की संज्ञा दी है. इस उड़ान की दिशा को लेकर अनेक तरह की आशंकाएं अर्थशास्त्रियों के बीच है. लेकिन इस उड़ान में वंचना के शिकार समूह किस तरह शामिल होंगे, इस पर स्पष्ट विचार नहीं दिख रहा है.
पिछले साल गुलाबी रंग के कवर के साथ छापे गए आर्थिक सर्वेक्षण के संदेशों की वास्तविकताओं को लेकर सरकार के भीतर और बाहर संदेह व्यक्त किया जाता रहा है. इस बार कवर का रंग नीला कर दिया गया है.
अब चीन का उदाहरण देते हुए 8 प्रतिशत ग्रोथ रेट बनाए रखने और मुदा स्फीति को 4 प्रतिशत से कम रखने का लक्ष्य रखा गया है. भारत के पांच खरब की इकोनॉमी के लिए यह विकास दर अगले पांच सालों तक बनाये रखना जरूरी है.
हालांकि इस बार 7 प्रतिशत गोथ रेट की बात ही की गयी है, जबकि अनेक विशेषज्ञ यहां तक मोदी के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहमण्यम विकास संबंधी आंकड़ों के दावों को गलत बता चुके हैं. उन्होंने कहा है कि वास्तविक आंकड़े दावों की तुलना में कम है. ग्रोथ रेट भी 4-5 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है.
इस हालात में आठ प्रतिशत ग्रोथ रेट एक बड़ी चुनौती है. चीन ने केवल निजी या कॉरपारेट के सहारे अपनी इकोनॉमी का विस्तार नहीं किया है. चीन की इकोनॉमी अब भी उसके सार्वजनिक क्षेत्र पर ही मुख्यतः निर्भर है. बजट भाषण में निर्मला सीतारमण ने निवेश बढ़ाने पर जोर दिया है.
आर्थिक समीक्षा में भी बचत और निवेश के साथ निर्यात आधारित करने पर जोर दिया गया है. सीतारमण ने बजट पेश करते हुए रिटेल क्षेत्र में सौ प्रतिशत एफडीआइ की घोषणा की है और खुदरा व्यापारियों के लिए पेंशन की घोषणा कर असंतोष को रोकने का प्रयास किया है.
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अनेक तबकों के लिए राहत की घोषणाओं के बीच अनेक अहम क्षेत्रों में एफडीआइ 100 प्रतिशत करने का एलान कर मोदी सरकार ने विदेशी और देशी कॉरपारेट को आकर्षित करने का प्रयास किया है. सरकारी क्षेत्र में भारी विनिमेश किया जायेगा और सरकारी कंपनियों के निजीकरण की राह आसान करने की बात भी निर्मला सीतारमण ने की.
निश्चित तौर पर इससे उभरने वाले संकटों से निपटने के उपायों पर वित्त मंत्री का भाषण खामोश है. भारत ने अब रिचर्ड थेलर के नज अर्थशास्त्र के रास्ते पर चलने का इरादा जता दिया है.
थेलर नोबल पुरस्कार से सम्मानित हैं. ब्रिटेन के निजीकरण की प्रक्रिया को तेज करने में उनके विचारों और सुझावों का योगदान रहा है. उन्होंने ही ब्रिटिश रेल के निजीकरण पर जोर दिया था.
निजीकरण के बाद रेलवे की तबाही के बाद अब फिर राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया ब्रिटेन में शुरू हुई है. मुकेश असीम ने थेलर की इकोनॉमी पर बेहतरीन टिप्पणी की है. उनकी टिप्प्णी है: रिचर्ड थेलर का नोबेलः महान अर्थशास्त्र
थेलर को अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार मिला है. अर्थशास्त्र के व्यवहारवादी सिद्धांतों के उनके योगदान पर. इस महान योगदान को समझने के लिए भारी भरकम सिद्धांतों को पढ़ने की बजाये 2008 में शुरू वैश्विक आर्थिक संकट के इनके विश्लेषण को जानना बेहतर होगा. 2009 के थेलर के इंटरव्यू से पढ़िए.
‘संकट के कई कारण हैं मगर मैं दो व्यवहारवादी कारणों पर जोर देता हूं. पहला दुनिया बहुत जटिल हो गई है. एक आम व्यक्ति से इन्वेस्टमेंट बैंक के सीइओ तक दोनों को ही इस जटिलता में काम करना सीखना होगा. दूसरी वजह आत्म नियंत्रण की है. बहुत से लोग कर्ज लेने के लालच से मुक्त नहीं हो पाए. आगे कहते हैं, 2009 विश्व के लिए मुश्किल वर्ष है पर अर्थव्यवस्था वापस उछाल लेगी. पूंजीवाद और डॉलर दोनों के लिए कोई खतरा नही.
बताइये बैंक बेचारे क्या करें इतनी जटिल स्थिति है! लोग लालच में कुछ समझते-मानते ही नहीं, ना चाहते हुए भी कर्ज देना पड़ता है! सौ, दो सौ, पांच सौ करोड़ तक के वेतन वाले बेचारे सीइओ भी इंसान ही हैं, उनकी ही क्या गलती और सैंकड़ों ख़रब डॉलर के मुनाफे कमाने वाले बैंकों के मालिक तो बेबस हैं. इन नासमझ आम लोगों के सामने जिन्हें आत्मनियंत्रण आता ही नहीं!
तो जनाब, पूंजीवादी व्यवस्था में कोई संकट नहीं, कोई शोषण नहीं, कोई असमानता नहीं, एक और भयानक पूंजी संकेन्द्रण, दूसरी ओर सब कुछ लुटा-खो चुके मेहनतकश नहीं, कोई अति-उत्पादन, बेरोजगारी, गरीबी नहीं. पूंजीपति तो बहुत प्रतिभा, परिश्रम, निष्ठा से समाज को संचालित करने में लगे हैं, पर ये लालसा भरे आत्म नियंत्रण हीन काहिल, कामचोर, बदमाश, मुफ्तखोर गरीब लोग हैं कि संकट लाते ही रहते हैं. पूंजीपतियों ने इनसे सब संपत्ति छीनकर अपने मालिकाने में इसीलिए तो ले ली है कि कहीं ये सब बरबाद न कर डालें!
विज्ञान की तो नहीं कहता पर शांति, अर्थशास्त्र, साहित्य, आदि में आमतौर पर नोबेल पुरस्कार कितने महान योगदान पर मिलता है. इस इंटरव्यू से समझा जा सकता है. हमारे मुख्य आर्थिक सलाहकार इन्हीं थेलर के शिष्य हैं और उन्हीं की नीतियों को भारत में लागू करना चाहते हैं.
आने वाले समय में भारत की इकोनॉमी किस तरह नीले आसमान में मुक्त उड़ान भरेगी. पहले बजट की उड़ान पर सवार सीतारमण की घोषणाओं में इकोनॉमी के क्षेत्र में ठहराव के उपाय शायद ही पर्याप्त हों.
बावजूद इसके उन्होंने बड़ी कंपनियों पर टैक्स लगाने की घोषणा कर अच्छा कदम उठाया है. हालांकि, इसका प्रभाव शेयर बाजार पर क्या पड़ेगा ये तो आनेवाला वक्त बतायेगा. हालांकि, बजट भाषण के दौरान ही घरेलू बाजार में गिरावट देखी गयी.
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