Opinion

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नोबेल विजेता बनर्जी के विचार कितने मददगार हो सकते हैं

Faisal Anurag

कोलकाता जिनकी रगों में धड़कता है, वैसे छह लोगों को अब तक विभिन्न क्षेत्रों में पाथ ब्रेकिंग कार्य के लिए सम्मानित किया गया है. रवींद्र नाथ टैगोर से शुरू हुए सिलसिले की कड़ी अभिजीत विनायक बनर्जी हैं. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में योगदान के लिए प्रो. अमर्त्य सेन के बाद वे दूसरे व्यक्ति हैं जिन्हें यह पुरस्कार दिया गया है. प्रो सेन को 1998 का  मिला था.

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जब कि इस बार बनर्जी को उनकी पत्नी इस्थर डुफलो और माइकल क्रेमर के साथ दिया गया है. बंगाल से जुड़े रवींद्र नाथ टैगोर, रोनाल्ड रॉश, सर सीवी रमन, मदर टेरसा,  प्रो सेन और, जीबीएस हाल्डेन बनर्जी से पहले नोबेल हासिल कर चुके हैं.

अर्थशास्त्र में विचारों और स्थापनों की कड़ी प्रतिस्पर्धा होती रहती है. दुनिया को बदलने और लोगों की उन्नति के विविध मार्गो पर प्रतिस्पर्धा बताती है कि आखिर कोई भी अर्थशास्त्री का मुख्य योगदान उसके क्षेत्र में अनोखा और स्थापनाओं को बदलने वाला क्यों साबित होता है. कार्ल मार्क्स ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में वर्गीय नजरिये से जिन स्थापनाओं को समायोजित किया था, उसे उनके विरोधियों ने कई तरह से चुनौती देने का प्रयास किया है.

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लगभग डेढ़ शताब्दी से पूरी बहस इसके आसपास ही केंद्रित होती रही है. जिस तरह मार्क्स की स्थापनाएं सर्वहारा वर्ग की नयी फिलॉसफी का सृजन कर गया. उसी तरह बाद के अर्थशास्त्रियों के अनेक स्कूलों ने इसे चुनौती देने का प्रयास किया है.

मार्क्स की स्थापना जहां पूरे आर्थिक तंत्र को सर्वहारा शासन के सहारे बदलने की है, वहीं अनेक अर्थशास्त्रियों ने पूंजीवादी व्यवस्था के संरक्षण के लिए उसमें कुछ सुधार का प्रयास किया है. भारत जैसे देश में यह बहस आमतौर पर होती है कि केवल शासक वर्गीय नजरिया ही आर्थिक नीतियां लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों और प्रगति की राह प्रशस्त नहीं कर सकता है.

जबकि एक विचार स्कूल जनतंत्र को ही विचारधारा मानते हुए वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिकने के लिए और उसे प्रभावित करने के लिए,  लोगों की आय को बढाने की राह पकड़ लेता है. एक तबका विकास और लोगों को सशक्त बनाने के लिए क्लास, कास्ट ओर जेंडर न्याय को अहम मानता है.

एक बड़ा सवाल, अभी पूरी तरह तय नहीं हो पाया है कि गरीबी उनमूलन का सवाल व्यवस्था जनित संरचनात्मकता से जुड़ा हुआ है या और किसी अन्य से.

यदि हम पिछली सदी को ध्यान से देखें तो जिन अर्थशास्त्रियों का वैश्विक प्रभाव पड़ा है उसमें जान मेनार्ड, कीन्स बेहद महत्वपूर्ण हैं. लोक कल्याणकारी राज्य की उनकी अवधारणा का असर दुनिया में देखा जा सकता है.

पिछली सदी के छठे दशक में जब से अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिलना शुरू हुआ, उसमें इसका प्रभाव भी आसानी से देखा जा सकता है. कीन्स ने न केवल लोकतंत्र बल्कि राज्य के कल्याणकारी होने पर जोर दिया था.

सोवियत संघ, चीन और क्यूबा की कम्युनिस्ट प्रणाली मार्क्स के रास्ते चल कर अलग-अलग आर्थिक नीतियों के सहारे इस मान्यता को बड़ी छलांग देने में कामयाब रही हैं. हालांकि उसके आलोचक आमतौर पर उस प्रणाली में लोकतंत्र के अभाव की बात करते रहे हैं. कल्याणकारी राज्य का मसला हो या मिश्रित  अर्थव्यवस्था का, उस पर इसका असर देखा जा सकता है.

टकिल डाउन की थियूरी आमजनों के असंतोष को थामने के लिए कारगर हथ्यिार की तरह पेश की गयी थी.

गुन्नार मिर्डल और अर्मत्य सेन की आर्थिक अवधारणाओं का तीसरी दुनिया पर गहरा असर रहा है. इन दोनों ने भारत के अर्थशास्त्र को भी गहरे तौर पर प्रभावित किया है. अंगंस डिटन जिन्हें छह साल पहले नोबेल मिला था, उन्होंने भी भारत के अर्थशास्त्रियों पर असर डाला था. डिटन के साथ अनेक शोध और सहलेखन करने वालों में ज्यां द्रेज भी शामिल रहे हैं.

द्रेज प्रो सेन की कई पुसतकों के भी सहलेखक हैं. इन सब ने गरीबी के सवाल को व्यापक स्तर पर संबोधित किया है. अमिजीत बनर्जी, डुफलो और क्रेमर ने भी गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में  बड़ा कार्य किया है. बावजूद इसके वे मानते हैं कि गरीबी किन्ही संरचनात्मकता के संकट की ऊपज नहीं है. बल्कि वह एक मानसिक अवधारणा है, जिसे व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा से खत्म किया जा सकता है.

10 देशों में उनके प्रयोग का अनुभव इस अवधारणा का आधार है. जहां 50 लाख से अधिक लोग गरीबी से बाहर आये हैं. हालांकि बनर्जी सेन के ही छा़त्र रहे हैं. लेकिन दोनों ने गरीबी से लड़ने की अलग-अलग राह पकड़ी है.

कई  समानताओं के बावजूद यह स्प्ष्ट है. आर्थिक सामाजिक असमानता से निपटने के क्षेत्र में भारत के लिए कई अर्थशास्त्रियों ने बड़ा कार्य किया है. इस समय थॉमस पिकेटी और रघुराम राजन उनमें काफी चर्चा में हैं.

विचारों की विविधता, असमहत होने का अधिकार ओर लोकतांत्रिक संथानों की स्वयत्ता को ले कर इन सब की चिंता एक समान है. मध्य मार्ग पर चलने वाले उदारवादी इन अर्थशास्त्रियों के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि वे भारत सहित दुनिया के अनेक हिस्सों में दक्षिणवाद के प्रभाव और एकाधिकारवादी राजनीति के मुखर आलोचक हैं.

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