Opinion

मुस्लिम समाज- गुजरात में कितना आसान है मुसलमानों का घर खरीदना

MZ KHAN

2017 में बड़ौदा के निलीपुरा गांव की नीलोफर पटेल चुनी सरपंच चनी गयी. ये गुजरात के लिए बिल्कुल अनोखी घटना है. क्योंकि ये हिन्दू आबादीवाला गांव है और मुस्लिम आबादी मात्र 120 है. गुजरात जैसे  राज्य में  जो लाख कोशिशों के बावजूद अभी भी साम्प्रदायिक आधार पर बंटा हुआ है, यहां साम्प्रदायिक सोच कुछ ज़्यादा ही गहरी है. ऐसी घटना किसी चमत्कार से कम नहीं दिखती और बड़ी मुश्किल से ऐसी खबरों पर यक़ीन हो पाता है. ऐसा नहीं है कि 2002, गोधरा कांड के बाद ही ये सोच गहरी हुई है, बल्कि उससे पहले या 1969  या उससे आसपास कहा जा सकता है कि ये सोच गहरी हुई है. इसका भरपूर फायदा राजनीतिक दलों ने उठाया है. कभी इस गहरी खाई को पाटने की कोशिश नहीं की गयी, बल्कि उसे और एक्सप्लॉइट किया.
2002 के बाद नफरत और तीखी होती गयी. जिसका राजनीतिक लाभ बीजीपी को मिला. यही नहीं, इस कटुता और नफ़रत का लाभ बीजीपी अबतक ले भी रही है. दूरियां बढ़ी हुई हैं. घर, व्यापार, रिश्ते सब अलग हैं. राजनीति इन्हें न मिलने देती है और न क़रीब आने देती है.  परिणाम ये है कि हिन्दू आबादी में मुसलमानों को घर नहीं मिलता. गुजरात के कई क्षेत्र अभी भी अशांत घोषित क्षेत्र में आते हैं.
अहमदाबाद में सरकारी आंकड़े के हिसाब से कुल 770 अशांत क्षेत्र हैं जिनमे 167 केवल शाहपुर में है. ये कानून साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में संपति की बिक्री को नियमित करने के लिए बनाया गया था. इस कानून के तहत डीएम की अनुमति ज़रूरी है.
रियल स्टेट एजेंट धर्म जानने के बाद ही कीमत बताते हैं. अशान्त क्षेत्र में जो मकान पांच  लाख में आसानी से मिल जाता है, वही मकान मुसलमानों को 10 लाख देने पर भी नहीं मिलता.
शाहपुर के रियल स्टेट एजेंट मिथिलेश शाह बीबीसी को बताते हैं कि एक संपति का एक हिन्दू खरीदार ने 36 लाख में सौदा तय कर लिया था और कुछ मुस्लिम खरीदार इसी संपति का 70 लाख दे रहे थे. लेकिन उन्हें संपति नही दी गयी. क्योंकि वीएचपी और बजरंगदल जैसे हिंदुत्वादी संगठन काफी सक्रिय हैं और वे मुस्लिम को घर बेचने नहीं देते. हिन्दू परिवार इनके डर से मुस्लिमों को  घर नहीं बेचते.

मुम्बई में भी दो साल पहले आमिर खान और इमरान हाशमी को हिन्दू इलाक़ों में घर न मिलने की खबर अखबारों की सुर्खी बनी थी. 2014 के बाद निस्संदेह विभाजन तेज़ हुआ है. लोगों की सोच में बदलाव आया है. असहिष्णुता बढ़ी है. कट्टरता में भी इज़ाफ़ा हुआ है.

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