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दुमका में बाहा पर्व की धूम, संथाल समुदाय में उमंग

Dumka : कुकुरतोपा सहित पूरे संतालपरगना में इन दिनों संथाल समुदाय बाहा पर्व मनाने में जुटा है. आदिवासी बहुल गांवों में हिन्दुओं के प्रमुख त्योहार होली की तरह मनाये जा रहे बाहा पर्व को लेकर विशेष उमंग और उत्साह देखने को मिल रहा है. बाहा पर्व में संथाल समाज के लोग कोरे पानी से होली खेलते हैं. पर्व में साल वृक्ष के फूलों का विशेष महत्व होता है.

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दिसोम मारंग बुरु युग जाहेर आखड़ा द्वारा दुमका जिला के जामा प्रखंड के कुकुरतोपा गांव में बाहा पर्व बहुत धूम धाम और हर्षोल्लास के साथ गांव के जाहेर थान में मनाया गया. आज बुधवार को बाहा पर्व का दूसरा दिन है, जिसे बोंगा माह कहते हैं. पहले दिन को ही जाहेर थान में जाहेर का छावनी (पुवाल का छत) बनाते हैं, जिसे जाहेर दाप माह कहते हैं. आज बाहा पर्व का दूसरा दिन बोंगा माह है. इसपर ग्रामीण गांव के नायकी (पुजारी) मंगल मुर्मू को उसके आंगन से नाच-गान के सम्मान के साथ जाहेर थान ले गए. वहां पहुंचने पर नायकी बोंगा दारी(पूज्य पेड़) सारजोम पेड़ (सखुवा पेड़) के नीचे पूज्य स्थलों का गेह-गुरिह किया. अर्थात् गोबर और पानी से सफाई/शुद्धिकरण किया. उसके बाद उसमें सिंदूर लगाये, उसके बाद मातकोम(महवा) और सारजोम(सखवा) का फूल चढ़ाते हैं. बाहा पर्व में जाहेर ऐरा, मारांग बुरु, मोड़ेकू-तुरुयकू धोरोम गोसाई आदि इष्ट देवी-देवताओं के नाम बलि दी गयी. नायकी  सभी महिला-पुरुष और बच्चे भक्तों को सारजोम पेड़ (सखुवा पेड़) का फूल देते हैं. फूल ग्रहण करने पर सभी ग्रामीण नायकी को डोबोह करते हैं. जिसे पुरुष भक्त कान में और महिला भक्त बाल के खोपा में लगाये. बाद में आखड़ा के सचिव सह गुरु बाबा मंगल मुर्मू ने बाहा गान के माध्यम से मानव सृष्टि की कहानी कही और ग्रामीणों ने टमाक, तुन्दाह आदि बजाकर बाहा नाच-गान किया. नाच-गान और प्रसादी ग्रहण करने के बाद सभी ग्रामीण नायकी को फिर से नाच-गान करते हुए गांव ले जाते हैं. जहां नायकी गांव के सभी घरों में सारजोम(सखुवा) का फूल देते हैं और सभी ग्रामीण घर वाले नायकी के सम्मान में उसका पैर धोते हैं. फूल मिलते ही ग्रामीण एक-दूसरे पर सादा पानी की बौछार करते हैं और इसका आनंद लेते हैं. तीसरे और अंतिम दिन को शरदी माह कहते हैं. इस दिन भी सभी ग्रामीण एक-दूसरे पर सादा पानी डालते हैं, नाच-गान करते हैं और एक-दूसरे के घर जाते हैं और खाना-पान करते हैं. संताल आदिवासी बाहा पर्व सृष्टि के सम्मान में मनाते हैं. इसका प्रकृति और मानव के साथ सीधा संबंध है. इसी समय सभी पेड़ों में फूल आते हैं. बाहा का शाब्दिक अर्थ फूल होता है.

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इस पावन अवसर पर बालेश्वर टूडू, सोनोत मुर्मू, सग्राम टुडू, बबुधन टुडू, बारिश मुर्मू, नोरेन मुर्मू, पालटन मुर्मू, लुखिन मुर्मू, लुखीराम मुर्मू, विलियम मुर्मू, सोनेलाल मुर्मू, दिलीप मुर्मू, बुधराय मुर्मू, गिरीश मुर्मू, निलमुनी हेम्ब्रोम, रसमती किस्कू, मिनी मरांडी, सुकुरमुनी मुर्मू, मोनी टुडू, एलिजाबेद हेम्ब्रोम,सुनीता टुडू, मोनिका हांसदा, सुनीता सोरेन, मर्शिला हेम्ब्रोम, सोनोती मुर्मू के साथ काफी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे.

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