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फर्जी नक्सली सरेंडर मामलाः हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से 7 अगस्त तक मांगा जवाब

जवाब नहीं देने की सूरत में हाजिर हो गृह सचिव- HC

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Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट में फर्जी नक्सली सरेंडर मामले पर बुधवार को सुनवाई हुई. मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस रत्नाकर भेंगरा की बेंच ने इस मामले में राज्य सरकार के रवैये पर असंतुष्टि जतायी. कोर्ट ने रघुवर सरकार के गृह सचिव को 7 अगस्त तक जवाब देने करने का आदेश दिया है. साथ ही कहा कि अगर सात अगस्त तक जवाब पेश नहीं होता है, तो सरकार के गृह सचिव को हाजिर होना होगा.

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बता दें कि पूरे मामले में पूर्व में केन्द्र सरकार के जवाब पर कोर्ट ने राज्य सरकार को अपना जवाब पेश करने का आदेश दिया था. याचिकाकर्ता झारखंड काउंसिल फोर डेमोक्रेटिक के अधिवक्ता राजीव कुमार ने कोर्ट से कहा कि चार डेट दिए गए, लेकिन सरकार की ओर से अबतक कोई जवाब नहीं आया. वर्ष 2019 में चुनाव होने वाला है. तब तक इससे मामले को लटका कर रखा जाए. और इस मामले से संबंधित कई अधिकारी रिटायर हो जाएंगे. राज्य सरकार की ओर से किसी प्रकार का कोई जवाब कोर्ट में पेश नहीं किया गया, जिसको लेकर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की. मामले की अगली सुनवाई 7 अगस्त को होगी.

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इधर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से इस मामले में सीबीआई जांच की मांग पर विचार करने और पूरे मामले के जल्द से जल्द निष्पादन के लिए उचित आदेश पारित करने का आग्रह किया है.

क्या है मामला

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रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा के भोले-भाले 514 युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने का ये पूरा मामला है. जहां एजेंट और अफसरों ने सरेंडर करनेवाले युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर लाखों रुपये वसूले, ताकि सरेंडर के समय उन्हें वह हथियार उपलब्ध कराया जा सके. यहां उल्लेखनीय है कि जिस वक्त 514 युवकों को कोबरा बटालियन के जवानों की निगरानी में पुरानी जेल परिसर में रखा गया था और हथियार के साथ उनकी तस्वीरें ली जा रही थी, उस वक्त सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आइजी डीके पांडेय हुआ करते थे. डीके पांडेय अभी राज्य के डीजीपी हैं. और इस मामले में डीजीपी डीके पांडेय, एडीजी एसएन प्रधान समेत सीआरपीएफ के अन्य अफसर संदेह के घेरे में हैं.

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वही मामले की जांच को लेकर रांची पुलिस पर लापरवाही बरतने का भी आरोप है. रांची पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस रिपोर्ट पर गौर ही नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि पुलिस के सीनियर अफसरों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए नक्सली सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया. वही इस मामले को लेकर झारखंड डेमोकेट्रिक संस्था की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी.

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