
- ईद उल फितर पर विशेष
इमाम हाशमी
Ranchi: ईद मुबारक ! जी हां आज ईद है. ईद उल फितर भूख, प्यास सहन करके एक महीने तक सिर्फ खुदा को याद करने वाले रोजेदारों को अल्लाह का खास तोहफा है. सेवइयां में लिपटी मोहब्बत की मिठास इस त्योहार की खूबी है. मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व न सिर्फ हमारे समाज को जोड़ने का मजबूत सूत्र है बल्कि यह इस्लाम के प्रेम और सौहार्द्र भरे संदेश को भी पुरअसर ढंग से फैलाता है.
मीठी ईद भी कहा जाने वाला यह पर्व खासतौर पर भारतीय समाज के ताने-बाने और उसकी भाईचारे की सदियों पुरानी परंपरा का वाहक है. इस दिन विभिन्न धर्मो के लोग गिले शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और सेवइयां अमूमन उनकी तल्खी को मिठास में बदल देती है. ईद.उल.फितर एक रूहानी महीने में कड़ी अजमाइश के बाद रोजेदार को अल्लाह की तरफ से मिलने वाला रूहानी इनाम है. ईद समाजी तालमेल और मोहब्बत की मजबूत धागा है. यह त्यौहार इस्लाम धर्म की परंपराओं का खूबसूरत आईना है. 1442 साल से यह त्योहार बराबर मुसलमान सारी दुनिया में लगभग दो अरब लोग मनाते हैं और यह एक तरह से अल्लाह की इबादत का दिन है. अल्लाह के शुक्र का दिन है.
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दुआ करने का दिन है. दूसरों की दुआएं लेने का दिन है. प्यार-मोहब्बत बांटने का दिन है. एक रोजेदार के लिए इसकी अहमियत का अंदाजा अल्लाह के प्रति उसकी कृतज्ञता से लगाया जा सकता है. दुनिया में चांद देखकर रोजा रहने और चांद देखकर ईद मनाने की पुरानी परंपरा है और आज के हाईटेक युग में तमाम बहस-मुबाहिसे के बावजूद यह रिवाज कायम व दायम है. व्यापक रूप से देखा जाए तो रमजान और उसके बाद ईद व्यक्ति को एक इंसान के रूप में सामाजिक जिम्मेदारियों को अनिवार्य रूप से निभाने का दायित्व भी सौंपती है.
रमजान में हर सक्षम मुसलमान को अपनी कुल संपत्ति के ढाई प्रतिशत हिस्से के बराबर की रकम निकाल कर उसे गरीबों में बांटना होता है. इससे समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी का निर्वहन तो होता ही है साथ ही गरीब रोजेदार भी अल्लाह के इनामरूपी त्यौहार को मना पाते हैं. व्यापक रूप से देखें तो ईद की वजह से समाज के लगभग हर वर्ग किसी न किसी तरह से फायदा होता है. चाहे वह वित्तीय लाभ हो या फिर सामाजिक फायदा हो.
भारत में ईद का त्यौहार यहां की गंगा-जुमनी तहजीब के साथ मिलकर उसे और जवां और खुशनुमा बनाता है. हर धर्म और वर्ग के लोग इस दिन को तहेदिल से मनाते हैं. ईद के दिन सेवइयों या शीरखुरमे से मुंह मीठा करने के बाद छोटे-बड़े, अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन गले मिलते हैं तो चारों तरफ मोहब्बत ही मोहब्बत नजर आती है. एक पवित्र खुशी से दमकते सभी चेहरे इंसानियत का पैगाम माहौल में फैला देते हैं. अल्लाह से दुआएं मांगते व रमजान के रोजे और इबादत की हिम्मत के लिए खुदा का शुक्र अदा करते हाथ हर तरफ दिखाई देते हैं और यह उत्साह बयान करता है कि लो ईद आ गई.
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जमाना चाहे जितना बदल जाएए लेकिन ईद जैसा त्योहार हम सभी को अपनी जड़ों की तरफ वापस खींच लाता है और यह अहसास कराता है कि पूरी मानव जाति एक है और इंसानियत ही उसका मजहब है. ईद का संदेश समतामूलक मानव समाज की रचना है. यही कारण है कि हाशिये पर खड़े दरिद्र और दीन-दुःखी, गरीब-लाचार लोगों के दुख-दर्द को समझें और अपनी कोशिशों से उनके चेहरों पर मुस्कान लाएं तभी हमें ईद की वास्तविक खुशियां मिलेंगी.




