Opinion

दिल्ली पुलिस-वकील विवादः क्या देश में नई जाति व्यवस्था “पेशेगत जाति” उभार ले रही है

Ranjit Kumar Singh

पिछले कुछ वर्षों में मैंने जैसा अनुभव किया है उसके कुछ विचार मैं आप मित्रों से साझा कर रहा हूँ  –

  1. क्या आये दिन जिस तरह से समस्या समाधान के लिए दबाव समूह के रूप में उभर रहे पेशवर वर्ग एक अलग जाति के रूप में दिख रहा है? पूर्व के जिस रूढ़िगत जाति व्यवस्था की हम अक्सर आलोचना करते रहे हैं, आज उसी का परिष्कृति स्वरूप पेशेगत जाति के रूप में नहीं उभर रहा है ? -आये दिन डॉ की जाति ,वकीलों की जाति,पुलिस कर्मियों की जाति इसी उभरते पेशेगत जाति दबाव समूह को नहीं दिखा रहा है ?
  2. विकास का मानक क्या होना चाहिए? क्या हम सिर्फ quantetive development को विकास का मानक मान बैठे हैं ? जब शिक्षा प्राप्त वर्ग के विरोध का पैमाना इस रूप में परिलक्षित होता हो, तो मानक विकास का पैमाना quality development न होकर quantetive development जान पड़ता है?
  3. यदि पढ़े लिखे वर्ग जिसे मैं अब नये जातिगत उभार के रूप में देखता हूं, के विरोध का तरीका ऐसा हो? तो ऐसी शिक्षा का औचित्य क्या?, फिर पढ़े लिखे और अनपढ़ जन के वर्गीकरण की आवश्यकता है?
  4. एक वर्ग जो लोगों के न्याय दिलाने का भरोसा देता हो?,न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा बनकर लोगों का भरोसा प्राप्त करता हो? अब उनके द्वारा न्याय दिलाने की मांग करना हास्यस्पद लगता है? अब तक जिस व्यवस्था के हिस्सा होने को लेकर उन उभर रहे जातिगत समुदाय को गर्व था, उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा नहीं दिख रहा?

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  1. एक अन्य उभर रहा जातिगत समूह जिसने लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिलाया है, आज उनके द्वारा सुरक्षा की मांग की जा रही है? साहब जब आप अपनी उभरती हुई जाति को ही असुरक्षित मान रहे हैं तो फिर जन समूह की रक्षा किसके जिम्मे हो?
  2. दिल्ली पुलिस यूनियन निर्माण की मांग रख रही है, क्या ये भविष्य के लोकतांत्रिक व्यवस्था पर खतरे की ओर इंगित नहीं कर रहा है? यूनियन का निर्माण किसी भी सैन्य बल, अर्द्ध सैन्य बल ,पुलिस बल के लिए संवैधानिक रूप में निरुद्ध है,फिर ऐसी मांग को तर्कपूर्ण कहा जा सकता है?
  3.  हाल के गतिरोधों ने मॉब लिंचिंग की नई परिपाटी गढ़ी है ? एक विद्वजनों के जाति गत समूह द्वारा दूसरे विद्वजनों के जन पर भीड़तंत्र के हमले ने Mob linching के नए उभर रहे स्वरूप को नहीं रखा है ?

सभी उभर रहे जातिगत समूह से अपेक्षाए हैं कि इस नयी विकसित हो रही परिपाटी को, इसके भयावह स्वरुप को समझने पर चिंतन किया जाये. हम जिस लोकतांत्रिक संस्कृति के पोषक रहे, उन लोकतांत्रिक मूल्यों को, न्यायिक व्यवस्थाओं को, सुरक्षातंत्र के उन्हीं मूल्यों को बनाये रखें.

उक्त घटनाएं जनमानस के बीच अच्छी छवि प्रस्तुत न करके, लोगों के आपके भरोसेमंद सहयोगी होने पर संदेह उत्पन्न कर रहे हैं ?  अतः मनन करें,चिंतन और विश्लेषण करें और एक आदर्श परिपाटी प्रस्तुत करें.

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