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CM के प्रधान सचिव सुनील बर्णवाल, खनन सचिव अबू बकर सिद्दिकी ने कोर्ट में नहीं रखी अपनी ही बनायी रिपोर्ट

सरयू राय ने CM से कहा- अधिकारियों पर हो कार्रवाई

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: अवैध खनन को लेकर हाईकोर्ट में मंत्री सरयू राय की जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान तत्कालीन खनन सचिव सुनील बर्णवाल और तत्कालीन खनन निदेशक अबू बकर सिद्दिकी को कोर्ट ने सशरीर उपस्थित होने को कहा था. दोनों उपस्थित तो हुए, लेकिन कोर्ट में उस रिपोर्ट का जिक्र नहीं किया जिन्हें उन्होंने खुद बनायी थी. इतना ही नहीं, दोनों अधिकारियों ने इस मामले में कोर्ट में कहा कि मामले को लेकर ऐसा कोई साक्ष्य विभाग के पास नहीं है, जो कोर्ट में रखा जा सके.

कोर्ट में दोनों अधिकारियों के ऐसा करने से कोर्ट एक बड़े फैसले तक नहीं पहुंच सका. अब फिर से सरयू राय के वकील मामले में सारी बातों को लेकर आईए (interlocutory application) लगाने की तैयारी कर रहे हैं. सरयू राय के वकील का कहना है कि सरकार की तरफ से कुछ खनन लीज धारियों को फायदा पहुंचाया गया है. साथ ही अधिकारियों ने कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की है. मामले में सीबीआई जांच हो इसके लिए आईए लगाया जा रहा है.

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क्या थी वो रिपोर्ट और किसने बनायी थी

2003 से 2009 तक लौह अयस्क खनन कारोबार चरम पर था. वजह पड़ोसी देश चीन में स्टील उत्पादन का बुम पर होना था. इस दौरान लौह अयस्क के खनन में काफी अनियमितता बरती गयी. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की जांच करने के लिए जस्टिस एमबी शाह की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया. आयोग ने परत दर परत कई सारी अनियमितताओं को उजागर किया. आयोग ने अपनी जांच में यह साबित किया कि खनन नियमावली 1960 के नियम 37 का उल्लंघन हो रहा है कि नहीं.

आयोग की रिपोर्ट की वजह से कई लौह अयस्क पट्टाधारियों की लीज कैंसिल हुई. झारखंड में आयोग अपना काम पूरा करता, इससे पहले ही आयोग की समय सीमा समाप्त हो गयी. फिर भी कम समय में आयोग ने झारखंड में अच्छा काम किया. आयोग की रिपोर्ट पर खननकर्ताओं पर करीब 13,000 करोड़ का जुर्माना लगाया गया.

2013 से 2015 के बीच आयोग की अनुशंसा के बाद झारखंड में भी जांच के लिए तीन स्तर पर समिति बनी. पहली समिति पश्चिमी सिंहभूम के तत्कालीन अपर समाहर्ता (एसी) अजित शंकर जो अभी खनन विभाग में रिटायरमेंट के बाद ओएसडी के पद पर नियुक्त हैं की अध्यक्षता में बनी. अपर समाहर्ता को अपनी रिपोर्ट तत्कालीन डीसी अबू बकर सिद्दिकी को सौंपनी थी, जो अभी खनन विभाग के सचिव हैं. दूसरी समिति खान विभाग के उपनिदेशक की अध्यक्षता में बनी. उपनिदेशक को अपनी रिपोर्ट तत्कालीन खनन सचिव सुनील कुमार बर्णवाल को सौंपनी थी, जो अभी सीएम के प्रधान सचिव हैं और तीसरी रिपोर्ट तत्कालीन विकास आयुक्त की अध्यक्षता में बननी थी.

रिपोर्ट में माना होती है अनियमितता, लेकिन कोर्ट में नहीं पेश की रिपोर्ट

जांच करने के लिए जो समिति बनी, उस समिति में यह तीनों अधिकारी मौजूद थे. और इनमें से दो अभी भी खनन विभाग में पदस्थापित हैं. जबकि सुनील कुमार बर्णवाल सीएम के प्रधान सचिव के पद पर हैं. इन तीनों समितियों ने जो रिपोर्ट बनायी, उसमें इस बात का साफ उल्लेख था कि खनन करने वाले खनन नियमावली 1960 के 37 वें नियम का उल्लंघन करते हैं. रिपोर्ट के आधार पर कुछ लीजधारियों की लीज कैंसिल हुई.

लेकिन कोर्ट में खनन को लेकर मामले की सुनवाई के दौरान सशरीर हाजिरी के दौरान इन अधिकारियों ने ऐसे किसी भी रिपोर्ट का जिक्र नहीं किया. कहा विभाग के पास ऐसा कोई साक्ष्य ही नहीं है, जिससे यह साबित हो कि खनन नियमावली 1960 के 37वें नियम का उल्लंघन हो रहा है. जबकि इस संबंध में खनन विभाग के पास सारे कागजात मौजूद हैं.

सरयू राय ने सीएम को लिखा पत्र कहा- दोषी अधिकारियों पर हो कार्रवाई, केस स्टडी भी गिनवायी

इस मामले पर मंत्री सरयू राय ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को एक पत्र लिखा है. पत्र में उन्होंने कहा है कि खनन विभाग में ऐसी गलतियां करने वाले कनीय या वरीय अधिकारियों पर सरकार के स्तर से कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए. साथ ही कहा कि अगर खान विभाग और राज्य प्रशासन के ऐसे वरीय अधिकारी ही अवैध खनन के पुख्ता सबूतों को इस तरह दबाएंगे,अवैध खननकर्ताओं को प्रोत्साहन और संरक्षण देंगे. नियमों का उल्लंघन कर छद्म खनन करने के दोषियों की इस कदर मदद करेंगे और महाधिवक्ता सदृश्य राज्य सरकार के विद्वान वकील न्यायालय के समक्ष पूर्व प्रमाणित सबूतों को प्रस्तुत नहीं करेंगे, तो राज्यहित और नियम-कानून को ताक पर रखकर दोषियों का समूह अपने फायदे के लिए नियम-कानून तोड़ता रहेगा. और राज्यहित साथ ही जनहित पर करारा चपत लगाता रहेगा. उन्होंने कुछ केस स्टडी भी गिनवाए.

केस स्टडी 1: नियम 37 का उल्लंघन कर छद्म खनन करने वालों में प्रमुख एक खनन पट्टा धारी एनकेपीके (निर्मल कुमार प्रदीप कुमार) के पक्ष में राज्य के महाधिवक्ता अजीत कुमार ने 20 किश्तों में बकाया अर्थदंड का भुगतान करने की सहमति हाईकोर्ट की खंडपीठ के सामने राज्य सरकार से बिना पूछे ही अपने विवेक से दे दी. उन्होंने हाई कोर्ट को यह नहीं बताया कि यह पट्टाधारी खनिज नियमावली 1960 के नियम 37 के उल्लंघन यानी छद्म खनन का दोषी है. इन्होंने 2003-2004 में अपनी लौह अयस्क खदान खनन के लिए टोरियन नामक एक कंपनी को दे दी. टोरियन ने कई सालों तक इन खनिज लीज क्षेत्र पर छद्म खनन किया.

खनन की बिक्री से हुए फायदे को एनकेपीके के बैंक खाते में जमा किया. खुद अपने खाते से कमर्शियल टैक्स उत्पादन शुल्क और इनकम टैक्स आदि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों का भुगतान किया. सरकार को रॉयल्टी का भुगतान भी अपने खाते से ही किया. यह सारी जानकारियां संबंधित बैंकों में टैक्स संग्रह करने वाले राज्य सरकार और केंद्र सरकार के दफ्तरों में और खुद राज्य सरकार के खनन विभाग की फाइलों में सबूत के तौर पर मौजूद है.

केस स्टडी 2: देवकाभाई भेलजी, पद्म कुमार जैन, रामेश्वर जूट मिल्स और कई दूसरे लौह अयस्क खनन पट्टे धारियों पर भी नियमावली 1960 के नियम 37 का उल्लंघन कर छद्म खनन कराने के पर्याप्त प्रमाण खनन विभाग और जांच समिति के फाइल में मौजूद हैं. लेकिन छद्म खनन के दोषी लौह अयस्क खनन पट्टाधारी चालान लेकर लौह अयस्क का खनन और व्यापार कर रहे हैं.

केस स्टडी 3: सिंहभूम मिनिरल्स ने 2013 में ही नियम 37 का उल्लंघन कर क्षेत्र में खनन करने का दोष स्वीकार कर लिया था. सिंहभूम मिनिरल्स ने क्षमा याचना कर लीज नवीकरण का अनुरोध सरकार से किया था. लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इसका लीज रद्द कर दिया. अब दोबारा से इसकी फाइल विभिन्न स्तरों की प्रक्रियाओं से होती हुई अनुमोदन के लिए सीएम के पास पहुंच गई है. कई महीनों से सीएम के पास पड़ी है. सरयू राय ने इस मामले में सीएम को लिखा है कि, सवाल है कि ऐसी फाइल को मुख्यमंत्री तक पहुंचाने वाले अधिकारियों पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए या नहीं.

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