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बुद्ध इस धरती से प्यासे गये थे

Geet Chaturvedi

आख़िरी समय था. शाक्यमुनि पेट में पीड़ा से त्रस्त थे. मल्ल-वन में, शाल के दो वृक्षों के बीच वह लेटे हुए थे. सारे भिक्खु उन्हें घेर कर खड़े थे. उन्होंने आनंद से पानी माँगा. आनंद पानी लेने गए, लेकिन ख़ाली हाथ लौट आए. शाक्यमुनि ने दुबारा पानी माँगा. और थोड़ी देर बाद तिबारा. वह आख़िरी प्यास, जब प्राण छोड़ती किसी देह को महज़ चार बूंद जल चाहिए होता है. उनके परमप्रिय आनंद, परछाईं की तरह हर पल साथ रहने वाले आनंद, उनके कहे हर शब्द को यथावत याद रखने वाले आनंद, उनके लिए कुछ भी कर देने वाले आनंद, आख़िरी समय में उनके लिए पानी नहीं लाए. . बुद्ध इस धरती से प्यासे चले गए.

उनके अवशेषों को लेकर बड़ा झगड़ा हुआ, लेकिन अंत तक हर चीज़ का प्रभार आनंद के पास था. उनकी पार्थिव देह के अंतिम दर्शन के लिए लोग क़तारबद्ध हुए. आनंद ने सारे वरिष्ठ भिक्खुओं को पीछे कर दिया और स्त्रियों को आगे. आनंद ने उनके अंतिम दर्शन का पहला अधिकार स्त्रियों को दिया. स्त्रियों को क्लेश मानने वाले भिक्खुओं को यह नागवार गुज़रा. आनंद तब तक अर्हत भी नहीं हो पाए थे. एक साधारण भिक्खु की तरह बुद्ध के साथ रहते थे, उनकी सेवा के लिए, फिर उन्हें इतना अधिकार कैसे प्राप्त हो गया कि वह इस तरह के निर्णय ले सकें? भिक्खुओं ने आनंद से असहयोग आरंभ कर दिया. बुद्ध का आख़िरी चीवर, जो कि बहुत बड़ा था, आनंद ने अकेले ही सिला. धरती पर बिछाकर. उस पवित्र चीवर पर पैर रखकर उन्होंने उसकी सिलाई की. भिक्खुओं का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

आनंद का बहिष्कार हो गया. कुछ समय बाद जब संघ के बुज़ुर्ग भिक्खुओं ने अपनी पहली परिषद आयोजित की, उसमें आनंद को न बुलाया गया. परिषद का काम रुक गया. विवश होकर, कुछ भिक्खुओं के विशेष अनुरोध पर आनंद को न्यौता भेजा गया, लेकिन साथ ही, उन पर नौ आरोप लगाए गए, जिनके स्पष्टीकरण के बिना आनंद को संघ में प्रवेश न दिया जाएगा. आनंद ने जवाब दिये.

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तुमने स्त्रियों को आगे क्यों किया?

क्योंकि हम उन्हें रोकना नहीं चाहते थे. शाक्यमुनि ने हमेशा उन्हें महत्व दिया.

तुमने पवित्र चीवर पर पैर क्यों रखे?

चीवर सिलते समय कोई मेरी मदद को नहीं आया. आप चीवर को धरती पर बिछाकर अकेले सिलेंगे, तो बिना पैर रखे उसे सिलना संभव नहीं.

तुमने बुद्ध को पानी क्यों नहीं पिलाया?

नदी का पानी गंदला था. मैं तथागत को वह पानी नहीं पिला सकता था.

और भी छह आरोप थे. आनंद के जवाबों से परिषद संतुष्ट हुई थी, लेकिन यह चर्चा बार-बार चलती कि आख़िरी समय में वह बुद्ध को पानी नहीं पिला पाए. जब आनंद ने अपनी देह त्यागी, तो उचित स्थान के रूप में नदी की बीच धार चुनी. वह नाव से गए और बीच धार में देह त्यागी. मृत्यु के लिए वह स्थान चुनना- क्या इसमें बुद्ध की आख़िरी प्यास और आनंद की आख़िरी असमर्थता की कोई प्रतिगूंज है?

कहते हैं, आख़िरी समय पानी न मिले, तो मनुष्य उस प्यास को मिटाने के लिए इस धरती पर फिर आता है. शाक्यमुनि आवागमन के इस तमाम झंझट से परे थे, फिर भी उन्हें लौटकर आना है. तमाम कथाएं कहती हैं कि उन्हें अपनी इच्छा से आना है. नये रूप में. नये समय में. नयी तरह से अपने काम पूरे करने के लिए आना है. क्या यही वह प्यास थी, जिसे आनंद ने जानकर पूरा नहीं किया था?

बुद्ध इस धरती से प्यासे गए थे. बुद्ध इस धरती पर मैत्रेय बनकर लौटेंगे.

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