
Ranjit kumar singh
Dhanbad : एक हाथ तो जन्म से ही नहीं था. दूसरा हाथ छोटा था लेकिन उसमें भी महज चार अंगुलियां ही थीं. एक तो दिव्यांग ऊपर से बेटी. दूसरे समाज के लोगों ने सवाल उठाने शुरू किये कि अब उसका क्या होगा? एक दिव्यांग बेटी का जीवन कैसे व्यतीत होगा?
लेकिन लोगों के सवालों का जवाब उसके हौसले ने दिया. हाथ नहीं है तो क्या हुआ, पैर तो है उसके पास. बचपन में ही एक सपना संजो लिया कि पढ़-लिखकर शिक्षिका बनूंगी. और फिर पैरों के सहारे ही उसने अपने सपनों में रंग भरना शुरू किया.
हम बात कर रहे हैं सिंदरी के डोमगढ़ की रहने वाली बसंती कुमारी की. दोनों हाथों से दिव्यांग रहने के बावजूद उसने अपने पैरों से लिखना शुरू किया. आज वे स्कूल के ब्लैक बोर्ड पर पैर की अंगुलियों से धारा प्रवाह लिख सकती है. बच्चों को बेहतरीन ढंग से पढ़ा सकती है.
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झरिया 2 में पारा शिक्षिका के पद पर कार्यरत है

बसंती उत्क्रमित मध्य विद्यालय रोहड़ाबांध झरिया 2 में पारा शिक्षिका के पद पर कार्यरत है. 2005 में बसंती की पारा शिक्षिका के रूप में नियुक्ति हुई थी. घर की आर्थिक स्थिति बहुत ठीक नहीं थी. माता-पिता जब उसको छोड़कर चले गये तो लगा पूरा परिवार ही बिखर जायेगा. लेकिन उसने घर की जिम्मेदारियों को भी अपने ऊपर ले लिया.
तीन बहनों का भरण-पोषण आज बसंती की कमाई से ही होता है. स्कूल के बच्चों ने बताया कि बसंती उनके लिए रोल मॉडल है. उन्हें बसंती से सिर्फ किताब की बातें ही सिखने को नहीं मिलती, बल्कि बसंती मैडम का जीवन उन्हें हौसले की लंबी उड़ान भरने के लिए प्रेरित भी करता है.
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सरकारी नीतियों से लगता है डर

हौसले की लंबी उड़ान भरने के बावजूद बसंती को कभी-कभी डर भी लगने लगता है. वे बताती हैं उनके इस डर के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेवार हैं. वे कहती हैं पारा शिक्षकों के प्रति सरकार का रवैया ठीक नहीं है.
ऐसी स्थिति में अगर उसकी नौकरी चली गयी तो उसके परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा? बसंती ने बताया कि 2016 में वह दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिली थी. उसने पीएम से सरकारी शिक्षिका बनाने की गुहार लगायी थी.
पीएम ने उसे आश्वासन भी दिया था लेकिन आज तक इस दिशा में कोई पहल नहीं की गयी. वह आज भी सरकारी शिक्षिका बनने की बाट जोह रही है. वह कहती है झारखंड में हेमंत सोरेन की नयी सरकार आयी है. अब इस सरकार से भी उसे उम्मीद है, देखिए क्या होता है.
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