
New Delhi: भारतीय रिजर्व बैंक ने 2 मई को मुंबई स्थित सीकेपी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड का लाइसेंस रद्द कर दिया था. 28 अप्रैल, 2020 के एक आदेश में केंद्रीय बैंक ने कहा कि बैंक की वित्तीय स्थिति अत्यधिक प्रतिकूल और अस्थिर है. महाराष्ट्र के इस को-ऑपरेटिव बैंक पर वित्तीय अस्थितरता के चलते आरबीआइ ने यह फैसला लिया है.
आरबीआइ के अवलोकन के अनुसार, बैंक के पास किसी अन्य बैंक के साथ विलय की कोई ठोस योजना या प्रस्ताव नहीं था. आरबीआइ ने बैंक के लिए लिक्विडेटर की नियुक्ति की मांग की है. आपबीआइ के मुताबिक बैंक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहा है और वित्तीय संकट से जूझ रहा है.
आरबीआइ ने प्रेस रिलीज में कहा है कि बैंक अब अपने जमाकर्ताओं का भुगतान करने लायक नही रह गया है, न ही इसका मर्जर हो सकता है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश का आरबीआइ अब तक क्या कर रहा था…?
ग्राहकों पर पड़ेगा असर
खाताधारकों की जमा राशि के बारे में स्पष्ट करते हुए आदेश में कहा गया है कि बैंक के जमाकर्ताओं को केवल 5 लाख रुपये की मौद्रिक सीमा तक पुनर्भुगतान का अधिकार है.
आरबीआइ द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, इसके लाइसेंस को रद्द करने के बाद सीकेपी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड किसी भी तरह के बैंकिंग ऑपरेशन नहीं कर सकेंगे. जिसमें डिपॉजिट लेना और जमा पैसे देना दोनों ही शामिल है.
आरबीआइ के इस फैसले के बाद सीकेपी को-ऑपरेटिव बैंक के ग्राहकों की मुश्किलें बढ़ गयी हैं. अब बैंक में कोई नया फिक्सड डिपॉजिट अकाउंट नहीं खुलेगा और न ही बैंक की ओर से नये लोन जारी किये जा सकते हैं.
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भुगतान करने की प्रक्रिया की जाएगी निर्धारित
लाइसेंस रद्द करने और परिसमापन कार्यवाही शुरू होने के साथ, DICGC अधिनियम, 1961 के अनुसार सीकेपी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड के जमाकर्ताओं को भुगतान करने की प्रक्रिया निर्धारित की जाएगी.
प्रत्येक जमाकर्ता डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) के अनुसार केवल 5 लाख रुपये की मौद्रिक सीमा तक उसकी जमा राशि के पुनर्भुगतान का हकदार है.
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