
Hari Narayan Singh
परिवार में जब कोई नया सदस्य जुड़ता है, तो हमें असीम खुशी होती है. लेकिन जब कोई सदस्य असमय हमें छोड़ कर चला जाता है, तो वह दुख भी बहुत गहरा होता है. आज मन अशांत है. एक अजीब-सा खालीपन महसूस हो रहा है.
अभी दो घंटे पहले हम रिम्स के ट्रामा सेंटर में अजय से मिलने गये थे. उनके पिता जी वहां भर्ती हैं, वेंटिलेटर पर हैं. वहीं पर पत्रकारिता के एक सच्चे प्रहरी सतीश के बारे में चर्चा चल पड़ी. सतीश कुछ दिनों से कैंसर से जंग लड़ रहे थे. वहां से हम ऑफिस आये. कुछ देर बाद ठीक साढ़े ग्यारह बजे मेरे मोबाइल की घंटी बजी. जैसे ही हमने हेलो कहा, उधर से मनहूस खबर आयी. सतीश नहीं रहे.
यह आवाज संजय की थी. मन भारी हो गया. उद्विग्न भी. मैं तरह-तरह की यादें संजाये बैठा था सतीश को लेकर, तब तक दूसरा फोन आया. यह आवाज अजय की थी-सतीश जी नहीं रहे. सुनने के बाद अजय भी स्तब्ध और मैं भी कहीं खो गया.
सोचने लगा, अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है, जब हम उससे रिम्स में मिलने गये थे. आभास तो उसी दिन हो गया था. लेकिन न जानें क्यों मन के किसी कोने में यह उम्मीद भी बची थी कि शायद सतीश अभी इस दुनिया को छोड़ कर नहीं जायेगा. कारण उसे अभी अपने बेटे और बेटी के प्रति पिता का फर्ज जो निभाना है. पत्नी से किये गये वायदे भी निभाने हैं.
सतीश कहता था- जिंदगी में बहुत काम करना है. यह भी कि फिर साथ काम करना है कभी. उसकी यही बात दिलासा दे जाती थी कि शायद वह इतनी जल्दी हम लोगों के बीच से नहीं जायेगा. लेकिन अंतत: सतीश जिंदगी की जंग हार गया. और इस प्रकार हमने अपनी 460 लोगों की सक्रिय टीम में से एक और सच्चा प्रहरी खो दिया.
जी हां, सतीश सहित पत्रकारिता जगत के लगभग 460 सच्चे प्रहरियों के साथ हम काम कर चुके हैं (प्रभात खबर, हिंदुस्तान, न्यूज 11, सन्मार्ग, खबर मंत्र और आजाद सिपाही संस्थानों से जुड़ कर). सचमुच में बहुत कष्ट होता है, जब अपना कोई सहयोगी असमय यात्रा के बीच में साथ छोड़ देता है. हम सतीश की आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं.
ईश्वर के पास उस परिवार को कष्ट सहने की क्षमता देने की अर्जी भी लगाते हैं. सतीश ने पत्रकारिता जगत को बहुत कुछ दिया है, अब हम पत्रकारों की कुछ जिम्मेदारी है. अगर हम उस परिवार के किसी काम आ सकें, तो यही सतीश के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. अभी बस इतना ही.
(आजाद सिपाही के संपादक हरिनारायण सिंह के फेसबुक वॉल से)
ई कोय जाए के टाइम हलु सतीश भइया
ई कोय जाए के टाइम हलु सतीश भइया…जइसे तू चल गेलीं वइसे कउन जा हऊ है जी…. काश, इस उलाहना पर सतीश जी हमेशा की तरह पलटकर मुस्कुराते हुए आज भी जवाब देते! ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह हमलोगों की किसी नोंकझोंक, झिड़की, उलाहना पर निरुत्तर रहे हों. जानता हूं कि हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गये सतीश वर्मा जी की ओर से कोई जवाब नहीं आयेगा, लेकिन मन रत्ती भर यह मानने को तैयार नहीं.
सतीश वर्मा ‘हैं’ नही, ‘थे ‘- यह सच स्वीकार कर पाना बेहद मुश्किल है.
दैनिक भास्कर के पॉलिटिकल एडिटर सतीश जी उम्र में भले सात-आठ साल बड़े रहे हों, लेकिन दोस्ताना ऐसा कि दिल की हर बात हमलोग शेयर कर लेते. अगर उन्हें पता चल जाता कि हमलोगों के ग्रुप ने उन्हें छोड़कर कभी किसी होटल-ढाबे में पार्टी कर ली तो वे हम सब को कहीं का नहीं छोड़ते. पेनाल्टी लगाना उनका अधिकार था. काश, आज वह पेनाल्टी लेने के ही बहाने लौट आते.
गुजरे लोकसभा चुनाव के दौरान एक रोज दोपहर अमित के पास उनका फोन आया- केन्ने हीं रे भाई! … पाटी-साटी कुछ होतु ??
-आव ना जी…कहिया पीछे हटले हिऊ! कहां हीं? आ जो आकशवाणी के पास… शम्भुआ भी साथे हऊ. अमित ने यह जवाब दिया और थोड़ी देर बाद हमलोग एक साथ रेस्टोरेंट में थे. सतीश जी के साथ रवि गुरु भी आये. लंबे वक्त के बाद यह संयोग बना था. हिन्दुस्तान में जब एक साथ थे हम सब, तो यह सिलसिला महीने-दो महीने पर चलता ही रहता था. अब किसी बैठकी में सतीश जी नहीं होंगे, यह स्वीकार कर पाना मुश्किल है.
हिन्दुस्तान में लगभग आठ साल साथ काम करते हुए कभी ऐसा नहीं देखा कि उन्होंने कोई असाइनमेंट पूरा ना किया हो. पता नहीं, आज कौन-सा असाइनमेंट पूरा करने की हड़बड़ी में वो निकल गये.
आखिरी बार कुछेक रोज पहले रिम्स में बिस्तर पर अशक्त पड़े सतीश जी से मिला, तब भी वह हिम्मत नहीं हारे थे. तब कहा था उन्होंने- ठीक होने दो जल्दी…बैठते हैं एक साथ. कैंसर ने उनकी जान जरूर ले ली, लेकिन उन्होंने शायद आखिरी सांस तक हार नहीं मानी. सतीश जी का जिस्म कैंसर से जंग में भले हार गया, लेकिन उनकी जिजीविषा के स्वर, उनके ठहाके, उनके उलाहने, उनकी झिड़कियां, उनकी संतुलित रिपोर्टिंग, उनकी यारबाशी, उनकी अनगिन यादें जिंदा रहेंगी. अंतिम प्रणाम सतीश भइया!
(वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ चौधरी के फेसबुक वॉल से)




