
Faisal Anurag
चुनाव के नजदीक आते ही बिहार राज्य के लिए नीतीश कुमार विशेष दर्जे की मांग शुरू कर रहे हैं. पांच सालों तक इस सवाल पर एक तरह से खामोश रहने के बाद पूर्वी क्षेत्रीय परिषद में यह मांग की गयी है. डा. मनमोहन सिंह की सरकार के वक्त बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग को एक राजनीतिक जुमले की तरह इस्तेमाल किया गया.
इस सवाल पर नीतीश कुमार ने बिहार में आंदोलन का माहौल बनाया था. 2015 के विधानसभा में यह स्वर बेहद कमजोर सुनाई पड़ा. लेकिन दो साल के भीतर ही भाजपा से हाथ मिलाने के बाद नीतीश कुमार ने कभी भी इस सवाल को गंभीरता से नहीं उठाया.
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अब जब बिहार एक बार फिर चुनाव से कुछ महीने ही दूर है तब विपक्ष की धार को कमजोर करने के लिए इस मांग को उठाया जा रहा है. आर्थिक समीक्षा में बिहार के गुलाबी दृश्य की चर्चा हुए अभी एक सप्ताह भी नहीं बीता है. लेकिन यह चर्चा उठायी गयी है.
दरअसल किसी भी मांग की टाइम्रिंग का राजनीतिक महत्व होता है. यदि नीतीश सरकार विशेष राज्य की मांग पर निरंतरता बनाये रखती तो शायद यह सवाल नहीं उठता कि चुनाव के दस्तक देते ही यह मांग क्यों की जा रही है. बिहार सरकार का दावा है कि राज्य का ग्रोथ डबल डिजिट में है.
लेकिन बिहार के आर्थिक हालात इसकी गवाही नहीं देते हैं. विकास के किसी भी मानक पर बिहार का स्थान प्रथम दस में तो नहीं ही है. यह ठीक है कि विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से बिहार के विकास की रफ्तार प्रभावित रही है. लेकिन सुशासन और बिहार प्रथम पर जोर देने वाले नीतीश कुमार के शासन के पंद्रह वर्ष पूरे हो चुके हैं.
इन पंद्रह सालों में आर्थिक सामाजिक विकास को ले कर सरकार के दावों पर भरोसा कम ही लोग कर रहे हैं. तो इसके कारणों की तलाश सरकार को ही करने की जरूरत है. देश में जब आर्थिक आंकड़ों को मन के अनुसार करने का प्रचलन हो तो सवाल उठना लाजिमी ही है.
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झारखंड में भी आजसू ने विेशेष राज्य के दर्जे की मांग को लेर राजनीतिक लाभ की पहल की थी. लेकिन उसकी मांग परवान ही नहीं चढ़ पायी. बल्कि लगातार सरकारों में बने रहने के बावजूद आजसू शायद ही कभी एनडीए से इस मांग को हासिल करने के लिए ईमानदार प्रयास करती दिखी.
नीतीश कुमार के अभियान का एक लाभ जरूर दिखा था कि डा मनमोहन सिंह ने डा. रघुराम राजन के नेतृत्व में ऐक सीमक्षा कमेटी बनायी थी. तब आंध्रप्रदेश से अलग तेलांगना के निर्माण की चर्चा अंतिम रूप ले रही थी. राजन कमेटी ने देश के सभी राज्य खास कर आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों का अध्ययन कर जो सिफारिश की थी, वह डा. सिंह की सरकार के जाने के बाद कभी चर्चा में नहीं लायी गयी.
आंध्रपदेश के लिए विशेष राज्य की मांग के आधार पर ही चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा के साथ हाथ मिलाया और फिर टकराव में भी गये. लेकिन आंध्रपद्रेश के लिए न तो विशेष पैकेज ही मिला न ही विशेष राज्य का दर्जा. हां, राज्य पुनर्गठन के समय किये गये कुछ वायदे जरूर अमल में लाये गये. नायडू का मोदी से अलगाव भी इसी सवाल पर हुआ. अब एक बार फिर दोनों करीब आ रहे हैं.
नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग हाने और भाजपा से हाथ मिलाते हुए कहा था कि वे बिहार के लिए यह कदम उठा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि न्याय के साथ विकास उनकी अंतर-आत्मा की आवाज है. लेकिन बिहार के विकास के साथ नाइंसाफी आर्थिक जानकारों के लिए हमेशा चिंता का विषय रही है.
बिहार विधानसभा चुनाव के समय तो नरेंद्र मोदी ने बिहार के लिए एक बड़ी राशि के पैकेज का वायदा किया था. भाजपा के साथ साझा सरकार चलाने के बावजूद नीतीश कुमार उस पैकेज को हासिल नहीं कर सके. इसके कारणों पर कभी खुल कर उन्होंने चर्चा भी नहीं की है. जबकि विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव इस सवाल को पिछले पांच सालों से सदन के भीतर और बाहर उठाते रहे हैं.
सवाल यह है कि आखिर चुनाव के वक्त ही इस तरह के जुमले क्यों उछाले जाते हैं. केंद्र की वित्त मंत्री कह रही हैं कि आर्थिक मंदी से सरकार अकेले नहीं निपट सकती है. तो क्या माना जाए कि अपनी जिम्मेदारियों को दूसरे पर आरोपित करने की प्रवृति आर्थिक क्षेत्र में भी प्रचलित होने जा रही है. सवालों की गंभीरता को इस आधे अधूरे मन से आकलित करने से देश की लगातार गिरती विकास दर की गति नहीं थामी जा सकती.
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