
New Delhi : महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत मोदी सरकार के आखिरी साल में नौकरियों की मांग में बढ़ोतरी दर्ज की गयी है. नौकरी की मांग में बढ़ोतरी ग्रामीण संकट का भी देती है. आधिकारिक आंकड़ो के मुताबिक यह बात सामने आई है कि साल 2018-19 में पिछले साल के मुकाबले दस प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
वित्तीय वर्ष संख्या में बढ़ोतरी होने की उम्मीद
वहीं अगर साल 2010-11 की बात की जाए तो इस योजना के तहत काम करने वाले लोगों की संख्या में सबसे अधिक बढ़ोतरी हुई थी. जनसत्ता में Shalini Nair की रिपोर्ट के मुताबित इस वित्तीय साल 25 मार्च तक मनरेगा के तहत उत्पन्न कामों में 255 करोड़ व्यक्ति थे और इनकी संख्या में और बढ़ोतरी होने की उम्मीद है.
वहीं इसके उलट साल 2017-18 में इस योजना ने 233 करोड़ व्यक्तियों ने रोजगार उत्पन किए. गौरतलब है कि साल 2016-17 व 2015-16 में मनरेगा में काम कर रहे व्यक्तियों की संख्या 235 करोड़ थी.
मोदी सरकार ने अपने पहले साल में यूपीए सराकार के नाकामियों को बताते हुए मनरेगा योजना को खारिज कर दिया था. तब मात्र 166 करोड़ व्यक्तियों को इस योजना के तह7त रोजगार मिले थे. वहीं इस योजना के तहत एक व्यक्ति दिन की इकाई को आमतौर पर आठ घंटे काम के लिए लिया जाता था.
सूखा या बाढ़ जैसी स्थितियां खेत की आय में कमी के मुख्य कारण
इस योजना से जुड़े सरकारी अधिकारियों का मानना है कि सूखा या बाढ़ जैसी स्थितियां खेत की आय में कमी का मुख्य कारण हैं. इस योजना की स्थिति का जमीनी स्तर पर आंकलन करने वाले लोगों का कहना है कि मनरेगा में काम का बढ़ा हुआ भाव बेरोजगारी की पूरी स्थिति को दिखाता है. मनरेगा योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर से एक व्यक्ति को 100 दिनों का रोजगार दिया जाता है. वहीं सूखे की स्थिति में काम के दिनों में संख्या 100 से बढ़ाकर 150 कर दी जाती है.
झारखंड के अधिकतर जिलों में योजना के तहत 150 दिन काम दिए जाने की घोषणा
मजदूर किसान शक्ति संगठन के निखिल देव का इस मामले में कहना है कि बेरोजगारी और सूखे की स्थिति में लोग कोई भी काम करने को तैयार हो जाते हैं. वहीं बेरोजगारी के कारण मनरेगा के काम की मांग बढ़ जाती है. क्योंकि ग्रमीण इलाके के लोगों के पास दूसरा कोई चारा नहीं रहता है पैसे कमाने का.
लेकिन वित्त मंत्रालय द्वारा इस योजना के लिए अपर्याप्त धनराशि आवंटित किए जाने के कारण काम का प्रावधान अक्सर प्रतिबंधित था. 18 मार्च को मंत्रालय में झारखंड और कर्नाटक के अधिकतर जिलों में योजना के तहत 150 दिन काम दिए जाने के प्रावधान की घोषणा की.
झारखंड के 18 जले सूखाग्रस्त घोषित
उल्लेखनीय है कि झारखंड में मनरेगा योजना के तहत इसमें काम करने वाले लोगों को सबसे कम 168 रुपए मेहनताना दिया जाता है. पिछले कुछ महीनों में झारखंड के 24 में से 18 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है. साथ ही कर्नाटक के सभी 30 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया है. इस योजना के तहत सूखा प्रभावित राजस्थान, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्र प्रदेश के बड़े हिस्से के साथ-साथ बाढ़ से प्रभावित केरल और चक्रवात की मार से प्रभावित तमिलनाडु में काम उपलब्ध कराया जाना था.




