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बिना लीगल नोटिस रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन पर बैन असंवैधानिक : ट्रेड यूनियन

Md. Asghar Khan

Ranchi : “सरकार सरासर गलत है. आप व्यक्ति को बैन कर सकते हैं, संगठन को नहीं. मजदूर संगठन को इस तरह से प्रतिबंधित करना आलोकतांत्रिक है. सरकार ने सही से कानून का पालन नहीं किया है. जो तरीका बैन के लिए अपनाया गया है, उससे स्वाभाविक न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है.” झारखंड में मजदूर संगठन समिति पर लगे बैन के खिलाफ ट्रेड यूनियन कानून के जानकार और उनके नेताओं की ये प्रतिक्रिया है. झारखंड सरकार ने 22 दिसंबर 2017 को अपराध नियंत्रण संशोधन कानून-1908 के तहत मजदूर संगठन समिति को प्रतिबंधित कर अवैध घोषित कर दिया है. जिसके बाद कई मजदूर संगठनों ने सरकार की इस कार्रवाई पर सवाल खड़ा करते हुए इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक करार दिया है. इस मजदूर संगठन पर लेवी वसूल, जन अदालत लगाने, सशस्त्र दस्तों को ठहराने समेत शासन विरोधी कार्य में संलिप्त पाये जाने का आरोप है.

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आरोपी को बंद या बैन कर सकते हैं, संगठन को नहीं

हटिया मजदूर यूनियन के अध्यक्ष और ट्रेड यूनियन कानून के जानकार भवन सिंह ने ट्रेड यूनियन को बैन करने पर काफी तीखी प्रतिक्रिया दी है. उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी गलत काम या राष्ट्र विरोधी कार्यों में संलिप्त है, तो उसे बंद या बैन किया जा सकता है. लेकिन मजदूरों के सामूहिक संगठन या रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन पर प्रतिबंध लगाना जनतांत्रिक प्रक्रिया और ट्रेड यूनियन कानून के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि यह बहुत निंदनीय है और भाजपा का ये हिटलरशाही शासन है. झारखंड सीटू ट्रेड यूनियन के महासचिव प्रकाश विप्लव कहते हैं कि किसी भी रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन को बिना लीगल नोटिस दिए बैन करना ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 के का उल्लंघन है. मजदूर संगठन को इस तरह से प्रतिबंधित करना अलोकतंत्रिक है. उन्होंने कहा कि रघुवर सरकार ने कानून का पालन नहीं किया है. ये असंवैधानिक है. वहीं एक्टू ट्रेड यूनियन नेता शुभेंदू सेन का कहना है कि मजदूर संगठन समिति को बैन करने में जो प्रक्रिया अपनायी गयी है, वह गैर संवैधानिक है.

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प्रतिबंध मजदूरों के खिलाफ साजिश

वर्तमान में मजदूर संगठन समिति के गिरिडीह, धनबाद और बोकारो स्थित कार्यालय को सील कर दिया गया है. साथ ही कहा गया है कि समिति को चंदा देना और सदस्य बनना या संस्था से जुड़े किसी भी कार्य में सक्रिय रहना अपराध की श्रेणी में आयेगा. इस मामले में संस्था के महासचिव बच्चा सिंह, दमोदर तूरी समेत 12 लोगों पर एफआईआर भी दर्ज की गयी है. उधर बच्चा सिंह ने कहा कि जो आरोप सरकार ने संस्था के उपर लगाए हैं वह वेबुनियाद है. अगर राष्ट्र या देश विरोधी कार्य में संलिप्त होने का कोई साक्ष्य है तो उसे पेश करना चाहिए. बिना कोई नोटिस भेजे या स्पष्टीकरण मांगे ही बैन करना मजदूर और ट्रेड यूनियनों की आवाज को दबाना है. दमोदर तूरी का कहते हैं कि संगठन पर प्रतिबंध करना मजदूरों के खिलाफ साजिश है. उनका कहना है कि मैं ना इस संगठन का पदधारी हूं और न ही सदस्य, फिर भी मुझे इसका संचालक बताकर एफआईआर दर्ज की गयी. दरसअल बैन से जुड़ी सभी जानकारी 22 दिसंबर 2017 को झारखंड गृह सचिव एसकेजी रहाटे और निधि खरे ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दी थी.

कोर्ट में चुनौती

मजदूर संगठन समिति के लोगों ने बैन को लेकर सात फरवरी को रांची हाइकोर्ट में रिट दायर की है. उनका कहना है कि चूंकि हमारी 29.04.1989 की रजिस्टर्ड संस्था है. संस्था अपने बायलॉज और ट्रेड यूनियन कानून के तहत चलती आयी है. हर साल रिटर्न फाइल समेत संबंधित सभी कागजात अपडेट है. बैन की प्रक्रिया असंवैधानिक और गैर कानूनी है. गौरतलब हो कि संगठन पर बैन को लेकर वामदलों और बुद्धिजीवियों ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर झारखंड सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताया था.

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