Opinion

पीएम मोदी जल्द चुनाव का फैसला ले सकते हैं, अगले चुनाव की रणनीतियां हो रही हैं स्पष्ट

Faisal Anurag

लोकसभा में अविश्वाास प्रस्ताव के बाद देश में 2019 के लिए चुनावी माहौल पूरी तरह तैयार होता नजर आ रहा है. भारतीय जनता पार्टी सहित सभी दलों की चुनावी तैयारी भी शुरू हो गयी है. सत्ता के शीर्ष गलियारे में यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्दत चुनाव का फैसला ले सकते हैं और हो सकता है कि वर्तमान लोकसभा के लिए मानसून सत्र ही अंतिम है. इसकी संभावना प्रधानमंत्री के हाल में दिए गए भाषणों से बनी है. लोकसभा में जिस तरह का भाषण उन्होंने दिया, उसे प्रेक्षकों के एक समूह ने भावी चुनाव को ध्यान में रखकर दिया गया भाषण कहा है. कांग्रेस ने भी अपना चुनावी एजेंडा साफ कर दिया है और सरकार की विफलताओं के साथ राफेल डील के सवाल को उसने आगे किया है. राफेल पारदर्शिता को जितना नुकसान होगा, कांग्रेस की रणनीति में उसका महत्व और बढ़ता जाएगा.

इसे भी पढ़ें- टंडवा की तरह धनबाद के छह कोलियरियों में भी कोल ट्रांसपोर्टरों से हर माह 8.40 करोड़ की अवैध वसूली !

अंबानी के साथ हुए करार को लेकर अनेक संदेह पैदा हुए हैं. कांग्रेस की रणनीति में स्पष्ट है कि वह प्रधानमंत्री को कॉरपरेट घराने के मित्रों का हितचिंतक साबित कर चुनावी रणनीति में सरकार को गरीब विरोधी और युवा विरोधी बनाना चाहती है. कांग्रेस की नई कार्यसमिति की बैठक में भी चुनाव की रणनीति पर काफी चर्चा हुयी. कांग्रेस की इस बैठक में गठबंधन राजनीति की अनिवार्यता पर जोर दिया गया और कांग्रेस अब कह रही है कि प्रधानमंत्री पद के लिए उसकी कोई जिद नहीं है. कांग्रेस को पता है कि विपक्ष के कई दल हैं, जो राहुल गांधी का नेतृत्व तुरंत स्वीकार करने को तैयार नहीं है. इसका एक प्रमुख कारण है कि देश के कई राज्यों में कांग्रेस की स्थिति अब पहले जैसी मजबूत नहीं रह गयी है. क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को कमजोर किया है. हाल के वर्षों के राजनीतिक वोट समीकरण भी बदले हैं और अनेक जाति और समूहों की अस्मितावादी राजनीति जोरों पर है. इन अस्मिताओं को मुखर आवाज देने वाली राजनीतिक क्षेत्रीय दल तैयार हुए हैं और उनकी मजबूत पकड़ भी बनी है.

इसे भी पढ़ें- सरकार ने कुछ खास वर्गों को बिना आधार कार्ड के जमीन रजिस्ट्री कराने की दी छूट

2014 के चुनाव के बाद कांग्रेस के लिए हालात को अपने अनुकूल करना भी आसान नहीं रहा है. कांग्रेस ने विपक्ष के तौर पर अब आक्रामक रूख अपनाया है, लेकिन यह देरी से उठाया गया कदम है. भारतीय जनता पार्टी की चुनावी तैयारियां किसी भी दल की तुलना में आगे है. सत्ता विरोधी रूझान को थामने के लिए भाजपा की अपनी रणनीति है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ा है. भाजपा आरएसएस और उसकी अनुशंगी इकाइयों ने ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तरजीह देना प्रारंभ कर दिया है. प्रायोजित गिरोह जिस तरह की हिंसा कर रहा है और एक खास समूह को टारगेट किया जा रहा है उससे जाहिर होता है कि ध्रुवीकरण की राजनीति का ही वह हिस्सा है.

इसे भी पढ़ें- मॉब लिंचिंग : प्रायोजित भीड़ की हिंसा व पुलिस के रवैये पर उठते सवाल

भाजपा और अनेक मीडिया हाउस के आंतरिक सर्वे जो कि प्रकाशित नहीं किए गए हैं, उससे भाजपा की सत्ता आकांक्षा को ठेस लग रही है. प्रधानमंत्री भी आकड़ों को सच-झूठ के आधार पर पेश कर यह साबित करने में लगे हुए हैं कि उनकी सरकार ने अपने वायदों को पूरा किया है. विपक्ष ने अपने हमले में स्वीकार किया की इन्हीं विफलताओं को केंद्र में रख रहा है. साथ ही केंद्र जिस तरह सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल अपने विरोधी नेताओं को दबाने के लिए कर रहा है, उसे भी विपक्ष ने हथियार बनाया है. अर्थव्यवस्था संबंधी जितने भी आंकडे उपलब्ध है, उससे सरकार और अर्थव्यवस्था की सेहत पर नकारात्मक असर ही हो रहा है. पिछले कुछ समय के बैंकिग घोटालों ने अर्थव्यवस्था की रीढ़ को प्रभावित किया है और जीडीपी के आंकड़ों के बावजूद अन्य के आंकड़े निराशाजनक प्रदर्शन का ही संकेत दे रहे हैं.

इसे भी पढ़ें- अशोक नगर तो निजी आवासीय कॉलोनी है, सरकार हरमू हाउसिंग कॉलोनी के BJP ऑफिस को भी करायेगी खाली ?

विपक्ष के साझा चुनावी रणनीति में इस नकारात्मकता के साथ दलित आदिवासी और अल्संख्यनकों के सवालों के साथ किसानों के समक्ष मौजूद संकट को प्राथमिकता के तौर पर लिया जा रहा है. युवाओं के सामने रोजगार के संकट को विपक्ष इस पर पूरी तत्परता से अपने पक्ष में करने में लगा हुआ है, क्योंकि 2014 के चुनावों में इन्हीं युवाओं ने भाजपा के बहुमत के सपने को अमली जामा पहनाया था. लेकिन भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल को आगे कर अपनी रणनीति बना रही है, जिसमें विपक्षी दलों के बीच बिखराव करने की रणनीति शामिल है.

इसे भी पढ़ें- अशोक नगर में जब खुल रहे थे सरकारी कार्यालय और राष्ट्रीय बैंक, तब क्यों सोया रहा विभाग

भाजपा उन राज्यों को ज्यादा फोकस कर रही है, जहां 2014 में सफलता नहीं मिली थी. भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के प्रमुख घटक टीडीपी उससे अलग जा चुकी है और शिवसेना के बागी तेवर सामने आ चुके हैं. भाजपा अध्यक्ष हाल ही में मुंबई दौरे में संकेत दे चुके हैं कि उनकी पार्टी अगला चुनाव महाराष्ट में अकेले लड़ सकती है. एनडीए के कुछ अन्य घटकों में भी बेचैनी है और हो सकता है कि चुनाव की घोषणा तक वे अपना अलग रास्ता ले लें. भाजपा के लिए राहत यह है कि जदयू और अन्न द्रमुक उसके साथ है. लेकिन तमिल राजनीति की विशेषताओं को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता है कि तमिल राजनीति का ऊंट क्यात करवट लेगा.

विपक्षी दलों के साझा गठबंधन की संभावना लगातार प्रबल होती जा रही है और इसे भाजपा अपने लिए संकट और संभावना दोनों ही मान रही है. लेकिन देश के अनेक तबकों का रूझान भाजपा की सत्ता आकांक्षा के लिए खतरनाक संकेत दे रहा है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.

Related Articles

Back to top button