
Mahesh Poddar
हिन्दुस्तान की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाकों में रहता है और कृषि कार्यों से जुड़ा हुआ है. ऐसे मंब किसानों का आन्दोलन भी इस देश के लिए कोई नयी या अप्रत्याशित घटना नहीं. लेकिन फिलहाल जारी किसान आन्दोलन का सन्दर्भ, उद्देश्य और इसके पीछे या इसकी आड़ में काम कर रही शक्तियां तमाम पूर्वोदाहरणों से अलग दिखाई दे रही हैं, देश की बड़ी आबादी की चिंता इस वजह से है.
स्वतन्त्रता आन्दोलन में चम्पारण के नील आन्दोलन ने उत्प्रेरक की भूमिका निभायी, पूरे स्वतंत्रता संग्राम को एक निर्णायक मोड़ दिया. किसानों द्वारा नील की खेती के विरोध की मूल वजह यही थी न कि किसानों को अंग्रेजों की मर्जी से खेती करनी पड़ती थी. अंग्रेज सरकार चाहती थी कि किसान को नियंत्रण में रखा जाये, बांधकर रखा जाये.
इसे भी पढ़ें :किसानों के साथ हूं, स्वतंत्र विचरण के अधिकार को बाधित करने का समर्थक नहीं
जिन मंडियों को बचाने की बात आन्दोलनकारी किसान कर रहे हैं उससे जुड़ा APMC एक्ट 150 वर्ष पहले बना था, अंग्रेजों का बनाया हुआ. अंग्रेजों को मैनचेस्टर के वस्त्र उद्योग के लिए रुई की जरुरत थी इसलिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने यह एक्ट बनाया और किसानों को मजबूर किया कि वे कपास की फसल मंडियों में ही बेचें.
बेचने के सारे नियम – कायदे, किसानों के शोषण के लिए जमींदारी-जागीरदारी व्यवस्था की तर्ज पर कमीशन एजेंटों की प्रभावी भूमिका तय की गयी, जो अंग्रेजों ने ही बनाए थे. ये पूर्णतः ब्रिटिश शासन की स्वार्थपूर्ति का मामला था. वही क़ानून अबतक चला आ रहा है, रूप बदल गया है कहीं – कहीं.
अब जबकि किसान जागरूक हुए हैं, मंडियों की कमीशनखोरी से त्रस्त हैं तो इनसे आज़ादी की मांग करने लगे हैं. कई बार ये मांग हुई है, लगभग हर राजनीतिक दल के एजेंडे में शामिल रहा है ये. अब बात होने लगी है कि किसान की उपज मंडी में ही क्यों जायें जहां उसके शोषण के दसियों उपकरण बने हुए हैं. किसान को अपनी पसंद से कारोबार करने और खरीददार चुनने की आज़ादी क्यों नहीं?
इसे भी पढ़ें : बड़ी खबरः IIT धनबाद ने फीस नहीं चुकाने पर 214 स्टूडेंट्स को किया टर्मिनेट
लेकिन मोदी सरकार द्वारा बनाए गए तीन नए कृषि कानूनों के जरिये अब जब किसानों के मुक्त होने की बारी आयी है तो स्वार्थी तत्व चाहते हैं कि किसान मुक्त न हो सकें. नए कृषि कानूनों में तो उनके पास विरोध के लायक कुछ है नहीं, इसलिए वे मुद्दे को ही भटकाने में लगे हैं. कभी MSP की गारंटी, कभी पराली जलाने का मामला, तो कभी एक्टिविस्ट्स की रिहाई का मामला.
सरकार वार्ता करना चाहती है तो जिद होती है कि सारे के सारे एक साथ बैठेंगे और उनमें मतैक्य होगा नहीं, तो कुल मिलाकर कोशिश ये है कि किसानों और सरकार के बीच सुलह के सारे रास्ते बंद कर दिए जायें. बड़ी बात नहीं कि कुछ विघ्नसंतोषियों को इंतज़ार हो कि कोई हिंसा हो और मूल मुद्दा गायब हो जाये, उन्हें अपना एजेंडा आगे बढ़ाने का मौक़ा मिल जाये.
आन्दोलनकारी तीनों नए कृषि क़ानून रद्द कराने पर अड़े हैं, सरकार से हां या न में जवाब चाहते हैं. सरकार भी कह सकती थी कि क़ानून मूल रूप में ही लागू होगा, आन्दोलनकारी हां या न में जवाब दें. तब तो बीच का यानि बातचीत का रास्ता ही बंद हो जाता. ये सवाल भी पूछा जा सकता था कि इसको लागू करने में आपको क्या दिक्कत है? लेकिन सरकार ने बड़ा दिल दिखाया और किसानों की तमाम मांगे सुनीं, जहां वाजिब लगा संशोधन का भरोसा दिया. उन मांगों पर भी जिनका नए कृषि कानूनों से कोई लेना देना नहीं था – चाहे वो बिजली का मामला हो या पराली जलाने का. सरकार जिद कर सकती थी कि हम सिर्फ नए कृषि कानूनों के बारे में ही बात करेंगे.
इसे भी पढ़ें : बिना लाइसेंस या अनुमति के तंबाकू उत्पाद बेचनेवालों को डीसी ने दी कार्रवाई की चेतावनी
आन्दोलनकारियों ने शुरुआत में सिर्फ आठ मांगें रखीं, उसमें भी वारवरा राव से सहानुभूति रखनेवाले कवि सहित कई एक्टिविस्ट्स को रिहा करने की बात कही. इन विषयों पर अलग से छिटपुट आन्दोलन चल रहे हैं, अभी भी अलग से करें, किसने रोका है, किसानों के मुद्दों में इन मुद्दों की मिलावट क्यों? नए तीन कृषि कानूनों से स्टेन स्वामी या वारवरा राव का क्या सम्बन्ध? सरकार संयम दिखा रही थी, बातचीत चल रही थी इसलिए जान बूझकर भी चुप थी लेकिन मीडिया के जरिये ये मिलावट सामने आ ही गयी.
वार्ता करने का तरीका भी स्वस्थ परम्परा का द्योतक नहीं, कुछ लोग नहीं – सभी लोग जायेंगे, कोई छूट न जाये. ये दर्शाता है कि इन लोगों को आपस में भी एक दूसरे पर विश्वास नहीं है. सबके अपने-अपने अलग-अलग एजेंडे हैं. हो सकता है इसमें कुछ ऐसे समूह भी होंगे जिनका एजेंडा केवल और केवल मोदी विरोध होगा. जो भी बातचीत अबतक हुई है उसमें नए कृषि कानूनों से दिक्कत क्या है, इसपर तो कोई बात करने को तैयार ही नहीं था.
ऊपर से सुर्खियाँ पाने के लिए, जमीन पर बैठकर खाना, गुरुद्वारे से इनके लिए भोजन और चाय आना, सिखों के नाम पर आन्दोलन करना, विदेशों में खालिस्तान के मुद्दे पर प्रदर्शन. बताईये, कहां कृषि क़ानून और उसे कौन सा रंग दिया जा रहा है? इसका आयाम अनायास बड़ा नहीं हो रहा है, ये एक सोची समझी साजिश का हिस्सा लगने लगा है.
अब बात किसानों के असली मुद्दे पर और सन्दर्भ झारखंड का. देश में इतना अनाज उपज रहा है तो एक ही राज्य से ही सारी खरीद क्यों हो? झारखंड जैसे राज्यों को सोचना होगा. अगर FCI अपनी कुल खरीद का 10-5% भी झारखंड से ले तो राज्य के सभी किसान MSP पर फसल बेच पायेंगे, इनकी दशा सुधर जायेगी. झारखंड में धान में नमी बताकर खरीद रोकी गयी है तो ये क्यों नहीं माना जाये कि राज्य सरकार ने पंजाब में MSP पर खरीद को बढ़ावा देने के लिए यहां पर खरीद को रोक दिया है.
इसे भी पढ़ें : अगले साल गुलजार होगा खेलगांव, सीनियर नेशनल कुश्ती प्रतियोगिता का होगा आयोजन
झारखंड के किसान 1000-1200 रुपये प्रति क्विंटल धान बेचने को मजबूर हैं, MSP राज्य का मुद्दा, APMC की यहां कोई समस्या नहीं, राज्य सरकार इमानदारी से काम करे तो यहां के किसानों की आमदनी तो वैसे भी दोगुनी हो जायेगी. लेकिन इतना खाद्यान्न राज्य सरकार खरीद नहीं पायेगी. पिछले साल का पैसा अबतक नहीं दिया गया ऐसी ख़बरें मीडिया में आ रही थीं.
सरकार या FCI द्वारा खाद्यान्न खरीद की एक सीमा है, MSP पर धान की खरीद होती है और इसका चावल PDS के जरिये गरीब जनता तक रियायती दर पर पहुंचता है. अगर सरकार ही MSP के जरिये देश की कुल उपज खरीदने लगे तो बड़ी बात नहीं कि देश का पूरा बजट भी कम पड़ जाये. MSP मार्केट सपोर्ट मैकेनिज्म है, ताकि किसानों को उसकी उपज का वाजिब मूल्य मिल सके, आर्थिक समर्थन मिल सके.
खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ा है, खुले बाज़ार में बेचेंगे तो किसान को प्रतियोगिता के कारण वाजिब दाम नहीं मिलेगा, उसके आर्थिक हितों की सुरक्षा नहीं हो पायेगी. निजी क्षेत्र को शामिल करने की वजह ये है कि यदि झारखंड का किसान धान छोड़कर कोई दूसरी खेती फसल उगाना चाहे तो उसे वाजिब दाम पर फसल की बिक्री का आश्वासन मिल सके. ये काम सरकार अकेले नहीं कर सकती, निजी क्षेत्र कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिये ये भरोसा किसानों में पैदा कर सकते हैं.
किसानों को आर्थिक समर्थन देने के नाम पर सरकारें ऋण योजनायें लाती हैं. लोन बंटने के वक्त किसान भ्रष्टाचार का शिकार होता है, चुका नहीं पाता तो कुछ सालों के बाद लोन माफी का दौर शुरू होता है, किसान एक बार फिर बिचौलियों का शिकार बनता है. जिसने चुका दिया, उसे कोई फायदा नहीं. किसान का शोषण भी होता है और सरकारी रकम की लूट भी होती है.
इसे भी पढ़ें : रोहित फिलहाल फिट हैं, लेकिन आखिरी दो टेस्ट में खेलने पर फैसला जांच के बाद: BCCI
बीच का एक रास्ता और है, खुला हुआ है. बतौर मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने पिछले कार्यकाल में ही भावान्तर योजना की शुरुआत की थी. किसान की कृषि योग्य भूमि और उसमें होनेवाली उपज का आकलन कर, उसे उस फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाज़ार मूल्य के अंतर का भुगतान सीधे उसके खाते में कर दी जाती है. किसान खुले बाज़ार में अपनी फसल बेचता है और उसे कोई आर्थिक नुकसान नहीं होता, एमएसपी का लाभ मिल जाता है. झारखंड सरकार वाकई किसानों की आर्थिक सुरक्षा के लिए चिंतित है तो इसे झारखंड में इसे लागू करे.
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इससे अलग भी एक पहल की. खेती किसान को घाटे का सौदा न लगे, उसके घाटे की भरपाई हो सके, उसके पास खाद-बीज के लिए नकदी हो, इसके लिए भारत सरकार ने देश के हर किसान को सालान 6000 रूपये का नकद समर्थन डीबीटी के जरिये देना शुरू किया. इसका और विस्तार करते हुए झारखंड की पूर्ववर्ती रघुवर दास सरकार ने किसानों को सालाना प्रति एकड़ 5000 रुपये देना शुरू किया, पांच एकड़ तक यानि 25000 के भुगतान की अंतिम सीमा तय की.
कल्पना कीजिये कि पांच एकड़ जोत वाले किसान को अगर सालाना 31 हजार रूपये सरकार की ओर से मिल जाते हैं तो एमएसपी पर फसल न बेच पाने और बैंक से लोन न मिलने के बावजूद वो आर्थिक तौर पर कितना सुदृढ़ होता. लेकिन झारखंड की नयी सरकार ने कामकाज संभालते ही इस योजना को बंद कर दिया और किसान आन्दोलन की हिमायती भी बन रही है.
कुल मिलाकर, किसान आन्दोलन को मुद्दों के भटकाव से बचाना जरुरी हो गया है, किसानों की जरूरतों पर ईमानदार विमर्श जरुरी हो गया है और किसान आन्दोलन को विघ्नसंतोषी ताकतों के खतरनाक इरादों से अलग करना जरुरी हो गया है. स्वाभाविक तौर पर ये जिम्मेवारी किसान आन्दोलन से जुड़े वास्तविक किसान नेताओं को ही लेनी होगी. जरुरी नहीं कि दिल्ली घेरकर ही, झारखंड के किसान अपने खेतों में खड़े होकर भी किसान हित के असली मुद्दों पर मजबूती से अपनी बात रखने की शुरुआत करें.
(Disclaimer : लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं. लेख में व्यक्त विचारों से न्यूजविंग का कोई लेनादेना नहीं है)




