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#Herd_Immunity: कोरोना वायरस को खत्म करने में होगी कितनी मददगार?

NW Desk:  देश और दुनिया कोरोना वायरस की चपेट में है. दुनिया भर में कोरोना वायरस से 37.40 लाख लोग संक्रमित हैं जबकि इससे अब तक 2.58 लाख लोगों की मौत हो चुकी है. वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए भारत समेत दुनिया के कई देशों में लॉकडाउन किया गया है. भारत में भी 17 मई तक लॉकडाउन है. लेकिन जिस तरह से संक्रमण फैल रहा है, ऐसे में इसकी रोकथाम और इससे बचने के तरह-तरह के उपाय तलाशे जा रहे हैं.

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इस दहशत के माहौल के बीच, कोरोना से उबरने के लिए बड़ी संख्या में एक्सपर्ट्स ‘हर्ड इम्युनिटी यानी सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता’ की थ्योरी भी दे रहे हैं. एक रिपोर्ट में भी यह बात आयी है कि लोगों में हर्ड इम्युनिटी विकसित हो जाए तो कोरोना वायरस का मुकाबला करने में आसानी हो सकती है. हालांकि कुछ एक्सपर्ट इसे बेहद खतरनाक मान रहे हैं.

ग्रीन जोन में हर्ड इम्युनिटी टेस्टिंग सा माहौल

कोरोना संक्रमण के केस के आधार पर देश को तीन जोन, रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन में बांटा गया है. ग्रीन जोन यानी जहां संक्रमण का केस नहीं है. और भारत के कुल जिलों में से 43 फीसदी से ज्यादा ग्रीन जोन में हैं. और इन ग्रीन जोन में लोगों के आने-जाने और काम करने पर लगी रोक हट गई है. दूसरे शब्दों में कहे तो देश का 43 फीसदी हिस्सा अब कोरोना संकट के बीच सामान्य जनजीवन की तरफ बढ़ चला है. वास्तव में देश के ग्रीन जोन में हर्ड इम्युनिटी का टेस्ट भी शुरू हो चुका है.

ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता मैट हैनकॉक का कहना है कि हर्ड इम्युनिटी किसी भी महामारी का स्वाभाविक सह उत्पाद है. यानी महामारी के फैलने के साथ ही अपने आप हर्ड इम्युनिटी विकसित हो जाती है.

क्या है हर्ड इम्युनिटी?

हर्ड इम्युनिटी का मतलब है- किसी समाज या समूह के कुछ प्रतिशत लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास के माध्यम से किसी संक्रामक रोग के प्रसार को रोकना है.

सरल शब्दों में कहा जाये तो, जब किसी जगह पर लोगों को किस महामारी से लड़ने के लिए बड़ी संख्या में वैक्सीन दी जाती है तो इससे बाकी लोगों में उस गंभीर बीमारी के फैलने का खतरा कम हो जाता है. जिन्हें उस महामारी की वैक्सीन नहीं लगी है या फिर वैक्सीन नहीं दी जा सकती, उन्हें भी यह बीमारी अपनी चपेट में कम ले पाती है. इसे ही हर्ड इम्युनिटी या सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता कहते हैं. हर्ड इम्युनिटी से गंभीर बीमारी को उन लोगों तक पहुंचने से रोका जा सकता है, जिन्हें इससे सबसे अधिक खतरा हो या जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है.

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कैसे काम करती है हर्ड इम्युनिटी?

किसी संक्रामक बीमारी के प्रसार और उसके लिये जरूरी प्रतिरक्षा (इम्यून) सीमा का अनुमान लगाने के लिए महामारी वैज्ञानिक एक मानक का उपयोग करते हैं जिसे ‘मूल प्रजनन क्षमता’ (Basic Reproductive Number-R0) कहा जाता है.

यह आरओ नबंर बताता है कि किसी रोगी के संपर्क में आने पर कितने अन्य लोग उस बीमारी से संक्रमित हो सकते हैं. एक से अधिक R0 होने का मतलब है कि एक व्यक्ति कई अन्य व्यक्तियों को संक्रमित कर सकता है.

फिलहाल चीन से उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर एक्सपर्ट का मानना है कि कोविड-19 का R0 2 से 3 के बीच हो सकता है.

कोई भी संक्रमण किसी समाज या समूह में तीन तरीके से फैल सकता है-

पहला- जहां समूह में किसी भी व्यक्ति का टीकाकरण न हुआ हो ऐसे ग्रुप में यदि 1 गुणांक वाले R0 के दो मामले आते हैं तो पूरा समुदाय संक्रमित हो सकता है.

दूसरा- यदि किसी समूह के कुछ ही लोगों का टीकाकरण हुआ हो तो उन लोगों को छोड़कर समूह के बाकी लोग संक्रमित हो सकते हैं.

तीसरा- यदि किसी समूह में पर्याप्त लोग प्रतिरक्षित हों तो ऐसी स्थिति में समूह के वही लोग संक्रमित होंगे जो बहुत ही कमज़ोर होंगे या जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत ना हो. इसी थ्योरी पर हर्ड इम्युनिटी काम करती है.

क्यों हर्ड इम्युनिटी को खतरनाक मान रहें कुछ विशेषज्ञ

एक्सपर्ट की मानें तो फिलहाल कोरोना वायरस के बारे में अधिक जानकारी नहीं है. ऐसे में इम्युनिटी प्राप्त करने के लिये समाज के अधिक लोगों को कोविड-19 से संक्रमित होने देना जोखिम भरा कदम होगा. अमेरिका के मैरीलैंड के डॉक्टर फहीम यूनुस का कहना है कि अगर देश की दो तिहाई आबादी को इन्फेक्ट किया गया तो यह संख्या 20 करोड़ पहुंच जाएगी। इनमें से अगर 1 प्रतिशत लोगों की भी मौत हुई तो ये आंकड़ा 20 लाख हो जाएगा. अगर 15 % लोग गंभीर हालात में पहुंच गए तो 3 करोड़ लोगों की मौत हो जाएगी. अमेरिका के बारे में जताई गई यह आशंका भारत की आबादी को देखते हुए भी मालूम पड़ती है.

विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों में COVID-19 के प्रति इम्युनिटी के विकास में बहुत समय लग सकता है, जिससे कई खतरे हो सकते हैं. खासकर जब हमें पता यह है कि हार्ट पैसेंट और हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग इस संक्रमण से सबसे अधिक असुरक्षित हैं. हर्ड इम्युनिटी के कारण पहले से ही दबाव में कार्य कर रहे स्वास्थ्य केंद्रों पर बोझ और बढ़ जाएगा जो वैश्विक आपदा के समय में सही निर्णय नहीं होगा.

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