Opinion

सिंघवी और जयराम रमेश के बयान राहुल के चुनाव में अकेले लड़ने वाले बयान की है पुष्टि

Faisal Anurag 

कांग्रेस के दो बड़े नताओं ने हर सवाल पर नरेंद्र मोदी को खलनायक बताने की प्रवृति से बचने की बात की है. अभिषेक मनु सिंघवी और रमेश जयराम ने इस आशय का बयान दिया है. संकट से घिरी कांग्रेस के लिए इन दोनों नेताओं का इस तरह सार्वजनिक तौर पर बयान देने की घटना के कई राजनीतिक संकेत हैं.

इन बयानों की टाइमिंग भी सामान्य नहीं है. पी चिदंबरम की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ये बयान दिये गये हैं. हाल ही में जम्मू कश्मीर से 370 और 35 ए हटाये जाने के सवाल पर कांग्रेस के भीतर का अंतरविरोध खुलकर सामने आया है. इसकी आग अभी बुझी भी नहीं है कि हरियाणा में तो दीपेंद्र हुड्डा और उनके पिता भूपेंद्र हुड्डा विद्रोही तेवर अपना चुके हैं. उपरी तौर पर इस सवाल पर बड़े नेताओं की खामोशी जाया दिख रही है. लेकिन हालात सामान्य नजर नहीं आ रहे हैं.

2019 के आम चुनाव की हार के बाद अनेक कांग्रेसी नेता जिन्होंने चुनावी रणनीति बनाने और संचालित करने में प्रमुख भूमिका निभायी थी, अब असंतोष प्रकट कर रहे हैं.

चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि वे भारतीय जनता पार्टी, नरेंद्र मोदी और आरएसएस के खिलाफ लड़ाई में अकेले थे. इस कथन की अब यह प्रासंगिकता है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं के वर्तमान रूख को राहुल गांधी ने महसूस कर लिया था.

2009 के चुनाव अभियान में राहुल अकेले पड़ गये थे. अब कांग्रेस के बड़े नेता तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनकी राजनीतिक दिशा क्या होनी चाहिए. कांग्रेस को नवजीवन देने के बजाए वे अपने विचारों को सार्वजनिक कर रहे हैं और इससे भारतीय जनता पार्टी के द्वारा बनायी गयी अवधारणाओं को मजबूती ही मिल रही है.

कांग्रेस के नेतृत्व के लिए तो यह कोई बेहतर आलोचना नहीं है. कार्यसमिति में अक्सर खामोश रहने वाले इन नेताओं का रूख बताता है कि वे आत्ममूल्यांक करने के लिए तैयार नहीं है. सत्ता से नजदीकी बनाये रखने की उनकी चाहत का भी इस पर असर है.

विपक्ष खासकर कांग्रेस इस आलोचना का प्रहार झेल रहे हैं कि बतौर विपक्ष वह अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं. संसद के बीते सत्र में विप़़क्ष की भूमिका आलोचना के केंद्र में है. कुछेक को छोड़ दिया जाये तो बहुमत का दबाव उनपर साफ दिख रहा है.

बीते सत्र को जिस आकस्मिक अंदाज में इन दलों ने लिया है, वह भारत के संसदीय इतिहास का एक नया मामला है. 1952 से 1962 तक भी संसद में विपक्ष का संख्याबल प्रभावी नहीं था, बावजूद नेहरू के लिए परेशान हालात का सामना करना पडता था. लेकिन इस बार संयुक्त विपक्ष उतना कमजोर भी नहीं है. बावजूद वह उसे बहुसंख्यक वोटर के प्रति ईमानदार नहीं है, जिसने उसे वोट दिया है. इसका कारण ऐसे नेता हैं, जिनका अपना नजरिया ही स्पष्ट नहीं है.
आम चुनाव के दौरान कांग्रेस ने लोकतंत्र की रक्षा और संविधान बचाने का नारा दिया था. यह रणनीति केवल राहुल गांधी की नहीं थी, बल्कि कांगेस के सभी बड़े नेताओं ने मिलकर ही यह लाइन तय किया था. अब जबकि लोकतंत्र और संविधान को लेकर अनेक संशय हैं, तब इन नेताओं का रूख बताता है कि वे जिस तरह की सकारात्मक नजरिया अपनाने की बात कर रहे हैं.

वह किसी सामान्य राजनीतिक प्रवृति का द्योकत नहीं है. विपक्ष की रचनात्मक भूमिका का बार-बार उल्लेख किया जाता है. स्वस्थ लोकतंत्र में इसी राजनीतिक प्रवृति की अपेक्षा की जाती है, लेकिन विपरीत हालातों में कही जाने वाली बातों का इस प्रवृति से ज्यादा लेना देना नहीं होता है.

कांग्रेस के अनेक नेता दलबदल कर भाजपा का हिस्सा बन चुके हैं. कर्नाटक में तो कांग्रेस के विधायकों ने सरकार गिराने का सौदा किया है. गोवा में भी देखा गया कि कांग्रेस विधायक दल का नेता बडी संख्या में दलबदल कर भाजपा का हिस्सा बन सरकार में शामिल हो गया.
हिंदी पट्टी के कई नेता भाजपा में शामिल हो संसद में है. राज्यसभा में तो विपक्ष के कई नेता इत्तफाक से भाजपा में जा चुके हैं. उनमें कई उपचुनाव लड़कर भाजपा के राज्यसभा सदस्य बन चुके हैं. यह कोई सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया या प्रवृति नहीं है.

कांग्रेस को एक ओर जहां भाजपा के प्रहारों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं उसे अपने ही प्रमुख नेताओं द्वारा खड़ी की जा रही परेशानी से रूबरू होना पड़ रहा है.

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