Roopak Raag
हर चौक-चौराहे पर झारखण्ड के सीएम हाथ हिलाते-मुस्कुराते नजर आते हैं. जेहन में दो विरोधाभासी स्थितियां उभरती हैं. क्या वाकई राज्य उस स्थिति में है कि राज्य का मुखिया इतना खिलखिला रहा है.
जिस वक्त रघुवर दास जी जमशेदपुर में मोमेन्टम झारखंड में उद्योगपतियों और केन्द्रीय नेताओं के साथ विकास की बड़ी-बड़ी बातें करने में मशगूल थे. उसी वक्त रामगढ में कई मजदूर खदानों में फंसकर दम तोड़ रहे थे. गुमला में मासूम बच्चे ईलाज के बिना मां की गोद-कोख में मर रहे थे और साहिबगंज में उग्र भीड़ महिलाओं-बच्चों को पत्थरों से कूच कर मार रही थी. जो उद्योगपति सड़क मार्ग से जमशेदपुर कार्यक्रम में गये अौर लौटें, उनकी शरीर का मोमेन्टम खराब हो गया.
क्या हमारा राज्य किसी व्यवस्था के तहत संचालित हो रहा है या नहीं. क्या राज्य शासन की जनता के प्रति कोई जिम्मेदारी है या नहीं. रघुवर दास, राजबाला वर्मा समेत तमाम मंत्रियों-अफसरों के दिलों में मानवीय संवेदनाएं जीवित हैं भी या नहीं. वरना राज्य ऐसी चौतरफा अराजकता के भंवर में कैसे पहुंच गया है.
दो विरोधाभासी परिस्थितियां
जब से रघुवर दास ने सत्ता संभाली है, तब से बस वे इसी फिराक में हैं कैसे अखबारों की सुर्खियां बटोरी जाए. कैसी तस्वीरें चौक-चौराहों पर लगाई जाए और कैसे उद्योगपतियों को बुलाकर तमाशा किया जाए. जबकि यह बात कोई मूर्ख भी जनता है कि उद्योगों की स्थापना के लिए झारखंड में न्यूनतम आधारभूत संरचना भी नहीं है. कैग की रिपोर्ट में यह सब खुलासा हो चुका है. तब सवाल उठता है कि रघुवर दास किसे मूर्ख बना रहे हैं. जनता को या फिर अपनी पार्टी भाजपा को. इतना तो अब हर कोई जान चुका है कि रघुवर सरकार के कार्यकाल में काम से अधिक हंगामा ही हुआ है. पूरा राज्य हिंसक रूप से अशांत रहा है.
शासकीय संवेदनाओं का सवाल
सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन बिल को वापस लिया तो धर्मान्तरण और भूमि अधिग्रहण को लेकर एक नया बखेड़ा झारखंड में शुरु कर दिया. आखिर एक राज्य के सीएम की जिम्मेदारी क्या होती है. जनता उनसे क्या आशा करती है. बस इतना कि राज्य में सामाजिक शांति कायम रहे और सभी वर्गों का विकास होता रहे. रघुवर दास ने सत्ता संभालते ही सबसे पहले उसी वर्ग की अनदेखी शुरु की जो सबसे उत्पीड़ित, वंचित हैं और जिनकी जिन्दगी बिना सरकारी मदद के डेग भर भी नहीं चल सकती.
जीने का संघर्ष बनाम निवेश का कटोरा
झारखंड जैसे घोर गरीबी वाले राज्य में लगभग 90 फीसदी आबादी अपने ईलाज के लिए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर निर्भर है. ऐसे में बरसात के मौसम में सरकारी अस्पतालों, स्वास्थ्य केन्द्रों की क्या स्थिति है. क्या सरकार ने इसकी कोई सुध ली. दुनिया भर में झारखंड को ग्रेट इन्वेस्टमेन्ट डेस्टिनेशन के रूप में प्रसिद्ध करने से पहले अगर सीएम अपने राज्य में ही घूम लेते तो शायद उन्हें दुखद जमीनी स्थिति का पता होता.
बीते दो सालों में राज्य किस सिथति में पहुंच गया है. इसकी उन्हें भनक हो पाती. लेकिन इसे फील करने के लिए मानवीय हृदय का होना भी जरूरी है. अगर गरीबों और वंचितों को जीवित मानव की श्रेणी में रखा जाए तो कोई संवेदनशील जन-नेता पहले अंतिम लोगों के दुखों को दूर करेगा. उसके बाद ही कोई प्राथमिकता तय करेगा. मगर रघुवर दास ने क्या किया. सीएम बनते ही निकल पड़े निवेश का कटोरा लेकर दुनिया भर में घूमने. और घूमे भी तो इसका क्या लाभ मिला झारखंड को और यहां के लोगों को.
हम रघुवर सरकार को उन्हीं के दावों और घोषणाओं पर परखने की कोशिश करते हैं.
सवाल प्राथमिकता की
झारखंड जैसे पिछड़े गरीब आधारभूत संरचना विहीन राज्य में सरकार की स्वाभाविक प्राथमिकता क्या होनी चाहिए. अभी तक तो झारखंड की बड़ी आबादी जीवन की मूलभूत जरूरतों यानी भोजन, आवास और वस्त्र के संघर्ष में ही जूझ रही है. सामाजिक सुरक्षा जिसमें स्वास्थ्य व्यवस्था शामिल है. वह भी असल में सरकार के प्राइमरी एजेंडे में नहीं है. इसके बाद इंफ्रास्ट्रक्चर का सवाल आता है जिसमें सड़क, बिजली, पानी, नागरिक सुरक्षा आदि शामिल होते हैं. इनकी स्थिति कैसी है राज्य में, इसे जनता खुद जानती है.
चिकित्सा व्यवस्था की दुर्गति
– आबादी की जरूरत के मुकाबले सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या 51 फीसदी कम है. वहीं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और स्वास्थ्य उपकेन्द्रों की संख्या जरूरत के हिसाब से 79 और 60 प्रतिशत कम है.
– आवश्यक दवाईयों की कमी की बात प्राइमरी हेल्थ सेन्टरों में तो छोड़ ही दें. जिला और सदर अस्पतालों तक में यह कमी 32 से 92 फीसदी तक है.
– अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सा पदाधिकारियों की 92 से 78 प्रतिशत कमी है. चिकित्सा पदाधिकारियों की 61 से 36 प्रतिशत कमी है. जबकि नर्स की 27 से 26 प्रतिशत और चिकित्सा सहायकों की 52 से 40 फीसदी कमी है.
– चिकित्सा के लिए जरूरी उपकरणों की भी 42 से 92 फीसदी तक कमी है.
कैग के इन आंकड़ों से हम झारखंड में चिकित्सा के आभाव में मर रहे बच्चे-महिलाओं का विश्लेषण कर सकते हैं. रघुवर सरकार को क्या इनसे कोई वास्ता नहीं है. क्या मोमेन्टम झारखंड से पहले हेल्थ फैसिलीटीज को मोमेन्टम देने की जरूरत नहीं थी.
पीडीएस काम नहीं कर रहा
बीपीएल व एपीएल परिवारों को अनाज मिलने में भी देरी होती है. सरकार के पास अन्न भंडारण तक की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. कहीं गोदामों में रखा अनाज सड़ जाता है तो कहीं चूहे बर्बाद कर देते हैं. ज्ञात हो कि झारखंड में खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2015 से ही लागू है. इसके बावजूद केन्द्र से मिलने वाले अनुदान के भंडारण तक करने में राज्य सक्षम नहीं है. बीते पांच सालों में करीब 20 लाख मिट्रीक टन अनाज का उठाव झारखंड सरकार द्वारा इसलिए नहीं हो पाया. क्योंकि गोदामों की भारी कमी है राज्य में. इसका सीधा असर गरीबों पर होता है. उन्हें समय से अनाज नहीं मिल पाता.
20 अगस्त को चतरा के सिमरिया में 70 साल की बुंधनी भुइयां की भूख से मौत फेल पीडीएस की बनागी है. जबकि कुछ साल पहले चतरा के ही हिन्दकलिया गांव में करीब दो दर्जन बच्चों की मौत भूख से महज कुछ हफ्तों में हो गई थी. क्या एक संवदेनशील शासन व्यवस्था बच्चों और बुजूर्गों की भूख से मौत के बाद भी जनवितरण प्रणाली की अनियमितता की अनदेखी कर सकता है?
ऑनलाइन सेवाएं और डिजीटल झारखंड का ढिंढोरा
डिजीटल इंडिया के नारे को झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खूब प्रोमोट किया था. नोटबंदी के बाद भी उत्साहित होकर उन्होंने घोषणा कर दी थी कि गांव-गांव में अब डिजीटल ट्रांजेक्शन होगा. झारखंड कैसलेस होने की ओर. लेकिन झारखंड में डिजीटल और ऑनलाइन सेवाएं असल में पूरी तरह ठप हैं. किसी भी जिले की बेवसाइट तक अपडेटेड नहीं है. लोगों की भीड़ अब भी प्रज्ञा केन्द्रों पर देखी जा सकती है. जहां लोगों से अवैध वसूली के मामले तो आते ही रहते हैं.
इसी तरह ऑनलाइन एफआइआर लॉजिंग सर्विस की भी शुरुआत राज्य सरकार ने की थी. उसका क्या हुआ. विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन एडमिशन व ट्रांजेक्शन नहीं शुरू हुई. सिंगल विंडो सिस्टम की नाकामी पर सीएजी की रिपोर्ट आ ही चुकी है. डिजीटल लिटरेसी, कौशल विकास कर रोजगार सृजन, कुछ भी जमीन पर नजर नहीं आ रहा. नजर आ रहा है विकास का हौवा और शिलान्यास का कार्यक्रम.
मोब लिंचिन्ग : राज्य भर में भीड़ द्वारा निर्दोश लोगों को जान से मार देने की घटनाएं हो रही हैं. कुछ महीने पहले 18 मई 2017 को सराईकेला-खरसावां में भीड़ ने सात लोगों की हत्या कर दी थी. लातेहार में दो पशु व्यापारियों को मारकर पेड़ से लटका दिया गया था. इसी साल रामगढ और साहिबगंज में भी भीड़ ने निर्दोष लोगों की पीटकर बर्बर हत्या कर दी थी. इसके अलावे डायन-बिसाही के नाम पर तो झारखंड में हत्याएं होती रहती हैं. एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड बनने के बाद से अब तक डायन-बिसाही प्रताड़ना- हत्याओं के कुल 500 मामले दर्ज किए गए हैं.
खान धंस रहे, मजदूर मर रहे : बीते साल के अंतिम दिनों में गोड्डा के ललमटिया में खदान दुर्घटना हुई थी जिसमें दर्जनों लोग मारे गए थे. इसके बाद भी राज्य सरकार ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई. 16 अगस्त को फिर से रामगढ़ में खदान हादसा हो गया. तीन लोगों के शव अभी तक नहीं मिले. 19 अगस्त को झरिया के धनुडीह में करीब 10 घर जमींदोज हो गए. विषेशज्ञों का मानना है कि झारखंड की जमीन अंदर ही अंदर खोखली होती जा रही है. ऐसे में रघुवर दास का खनन और औद्योगिक क्षेत्र में निवेश के लिए विश्व भ्रमण झारखंड को और तबाह ही करेगा.
धार्मिक उन्माद की राजनीतिक : जनहित और विकास के कार्यों में फेल झारखंड सरकार का पूरा ध्यान अब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर केन्द्रित रह गया है. रघुवर दास अब खुलकर अपने संगठन की विचारधारा को समस्त झारखंड की जनता पर लादने की कोशश में है. पिछले दिनों तमाम बड़े अखबाऱों में गांधीजी के नाम पर छपे धार्मिक विद्वेष को बढ़ाने वाला सरकारी विज्ञापन देश भर में चर्चा का विषय बन गया था. संविधान के मौलिक अधिकारों में शुमार नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को राज्य सरकार निरस्त करने पर तुली है.
दूसरी ओर राज्य के आदिवासी सरना धर्म कोड की मांग को लेकर जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं. ईसाई और सरना आदिवासी समुदायों के बीच सामाजिक तनाव को सरकार की गलत नीतियों के कारण बढ़ावा मिल रहा है.
नया भूमि अधिग्रहण बिल : सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन विधेयक तो सरकार ने वापस ले लिया मगर उसी समय नया भूमि अधिग्रहण बिल विधानसभा से पास करा लिया. अब इस विधेयक को लेकर राजनीतिक दलों में विरोध शुरु हो गया है. इसे लेकर भी झारखंड में तनाव का माहौल बनना शुरु हो गया है.
इन सब स्थितियों को देख कर लगता है कि राज्य तंत्रविहीन और जनता नेतृत्वविहीन हो गयी है.




