मुंबई: विनोद चोपड़ा के बैनर की पिछली फिल्मों ने नाम और दाम दोनों ही कमायें। अब वे पूरी तरह से स्वस्थ्य मनोरंजन का पर्याय बन चुके है। अपने सहायकों के सहारे विनोद, यषराज फिल्म्स की ही तरह निर्देषकों की नई पौध को अवसर देकर उन्हें स्थापित करने की दिषा में कदम बढा रहे हैं। प्रदीप सरकार और राजकुमार हिरानी के बाद इस बार उन्होंने राजेश मापुसकर को यह अवसर दिया हैं।
मापुसकर ने एक साधारण से सब्जेक्ट को ध्यान में रखकर एक सुंदर और मर्मस्पर्शी कथा को मूर्तरूप दिया हैं। इंसान ख्वाब तो देखता हैं, लेकिन उसे पूरा करने की दिषा में जब वो कदम बढाता हैं। तब उसे बहुत बुरा लगता हैं। ख्वाबों का टूटना और उस ख्वाब को साकार करने के लिए तीन पीढियों के बीच का अंतर पाटने और सत्य के धरातल पर उसे प्रमुखता से दिखाने की कल्पना प्रभावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत की गई हैं। राजेश मापुसकर की कल्पना को बोमन ईरानी, शरमन जोशी और ऋत्विक सहारे केे किरदारों ने पंख दिये हैं और इस फिल्म रूपी पक्षी ने उंॅची उडान भरने का भरपूर प्रयास किया हैं।
इस फिल्म की कहानी मुंबई में रह रहे एक पारसी परिवार के ईद-गिर्द घूमती है। इस परिवार के मुखिया बेहराम आर्देसर देबू (बोमन ईरानी) हैं। तीन पीढियों के इस परिवार में कोई महिला सदस्य नहीं है। दादा देबू घर की हर गतिविधि से वाकिफ हैं। वे अपनी किशोरावस्था में रणजी खेल चुके थे, लेकिन नेशनल टीम में चुनाव के दिन दोस्त दिलीप धर्माधिकारी (परेष रावल) की साजिश का वह षिकार हो गए थे। क्रिकेट में छल-कपट भुगत चुके देबू नहीं चाहते कि उनका बेटा क्रिकेटर हो। बेटा रुस्तम बेहराम देबू (शर्मन जोशी) जो आरटीओ आॅफिस में हेड क्लर्क है, मान तो जाता है, लेकिन पोते कायोजी रुस्तम देबू (मास्टर ऋत्विक) में आनुवंशिक गुण आ जाता है। एक बार रुस्तम अपने स्कूटर पर बेटे कायोजी को बिठा कर जाते समय सिग्नल तोड़ने की गलती कर बैठता है। आरटीओ का हेड क्लर्क होने के बावजूद जुर्माने की रसीद हवलदार से कटवाता हैं। असल में, रुस्तम को अपने बेटे कायोजी से बेहद प्यार है, इसलिए उसके सामने वह कोई गलत काम नहीं करना चाहता। कायोजी बहुत अच्छा क्रिकेट खिलाडी है। उसका ख्वाब इंग्लंैड जाकर लॉर्ड्स स्टेडियम में खेलना। बेटे के इस ख्वाब को पूरा करने के लिए रुस्तम को डेढ लाख रूपयों की आवष्यकता हैं। दूसरी तरफ एक कॉर्पाेरेटर है, जिसके बेटे की अपनी शादी को लेकर जिद है कि वह फेरारी में ही बैठ कर बारात लेकर जाएगा। उस शादी की वेंिडंग प्लानर बब्बू दीदी (सीमा पाहवा) रूस्तम को जानती है। वह उसे ऑफर देती है कि वह उसे दो दिनों के लिए फेरारी दिला दें तो वह उसे डेढ लाख रुपए दे देगी। ईमानदार रूसी बेटे के भविष्य के लिए अपनी ईमानदारी से डिगता है। उसे कुछ घंटों के लिए अपने पिता के संपर्क से सचिन तेंदुलकर की लाल फेरारी किसी को उपलब्ध करानी है। इस दौरान घटनाएं कुछ इस तरह घटती हैं कि वह सचिन तेंदुलकर को बताए बगैर उनकी फरारी लेकर निकल जाता है। रात भर फेरारी चलती रहती है और ऐसी-ऐसी घटनाएं होती हैं कि इसमें कई लोगों की जिंदगी में बदलाव आता है।
इस फिल्म का स्टोरी ट््रीटमेंट कुछ इस तरह का हैं कि फस्र्ट हाॅफ प्रभावित करता हैं लेकिन् सेकण्ड हाॅफ में वह बात नहीं आ पाई हैं जो आना चाहिये थी। यह भी मनोरंजक होता तो फिल्म और भी बेहतर बन सकती थी। इसमें पिता-पुत्र के संबंध को लेखक-निर्देशक राजेष मापुसकर ने मर्मस्पर्षी बनाया हैं। अपनी डेब्यू फिल्म के हिसाब से वे कामयाब कहे जा सकते हैं। उसूलों के पक्के दादा बनें बोमन का फेरारी मांॅगने के लिए तैयार हो जाना, शर्मन को आरटीओ में हेड क्लर्क दिखाना समझ से परे हैं। भावुक दृष्यों का बडा जबर्दस्त प्रभाव फिल्म में देखने को मिलता हैं। जिन्दगी में अभाव हर किसी के पास हैं। लेकिन ख्वाबों की ताबीर को बुनना और उसे धरातल पर लाना हर किसी को झकझोर देता हैं। ये ख्वाब तभी पूरे हो सकते हैं जब उन्हें सही वातावरण और अवसरों की उपलब्धता हो। यह फिल्म मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षाओं को दर्षाती हैं। इसमें सचिन तेंदुलकर और उसकी फेरारी का प्रतीक रूप में प्रयोग किया गया हैं। नाईट में बोमन और मास्टर ऋत्विक के बीच खेला गया मैच अच्छा खेला गया हैं।
निर्देषक मापुसकर ने उस वातावरण को बखूबी दर्षाया हैं जो कभी-कभी हंॅसी का पात्र भी बना देती हैं वरन् हम जो नहीं करना चाहते वह करवा भी देती हैं। उनकी मेहनत साफ तौर पर इसमें उभरकर आई हैं। दर्षक इस फिल्म से जुडाव महसूस करता हैं। इसके बावजूद फेरारी निकालकर लाने वाले दृष्य अविष्वसनीय प्रतीत होता हैं। मराठी नेता और उसके पुत्र वाले दृष्यों को इतना लम्बा करने की कोई आवष्यकता नहीं थी। क्रिकेट की पाॅलीटिक्स को उन्होंने बखूबी दर्षाया हैं। परेष और बोमन के बीच के दृष्यों को वे बहुत अच्छा फिल्मा गये। लोन के लिए मेडल, ट््राॅफिया और सर्टिफिकेट दिखाने वाले दृष्य अतिरेकता पैदा करते हैं। फेरारी में से डेढ लाख रूपये निकालने वाले दृष्यों को बहुत ही सिचुएषनल टच दिया हैं। सच्चाई का बखान करने के चक्कर में दृष्य कई जगह लम्बे-2 हो गए हैं। पहली फिल्म के हिसाब से निर्देषक का काम अनुभवी निर्देषक की तरह हैं।
कलाकारों के अभिनय की बात करें तो ऋत्विक सहारे, शरमन जोशी और बोमन ईरानी तीनों ने ही अपना काम ईमानदारी से और प्रभावषाली तरीके से किया हैं। दादा-पोते और बाप बेटे के बीच के दृष्यों में एक-दूसरे के साथ खूब एंजाय किया हैं। शरमन ने अपनी इमेज के विपरीत मेहनत की लेकिन वे इसमें विविधता लाते तो और अच्छा होता। ऋत्विक के साथ कई दृष्यों में शरमन अपने एक्सप्रेषंस से प्रभावित कर गये। वहीं बोमन के साथ वाले दृष्यों में भी वे जमें। बोमन ने यह दिखाया हैं कि वे सिर्फ काॅमेडी के लिए ही नहीं बने हैं। अन्य कलाकारों में सीमा पाहवा, सत्यदीप मिश्र, अच्युत पोत्दार और दीपक षिर्के ने भी अपनी छाप छोडी है।
इसमें राजकुमार हिरानी के संवादों ने कोई बहुत बडा जादू जगाया हो ऐसी बात नहीं हैं। इसकी पटकथा में और कसाव की जरूरत थी। एडिटर दीपा भाटिया ने अधूरा काम किया हैं। छायाकार सुधीर पलसाणे ने फेरारी की गति के साथ-साथ कलाकारों के भावों को बखूबी प्रस्तुत किया हैं। गीत-संगीत की बात करें तो फिल्म के अनुरूप हैं। खासकर विद्या बालन पर फिल्माया गया ‘मला जाउ दें, मुझे जाने दे‘ मराठी भाषियों के लिए तो आकर्षण का केन्द्र हैं हिन्दी के दर्षकों को भी यह भा सकता हैं। इसकी गायिका उर्मिला धनगर ने बडी मस्ती से इसे गाया हैं। विद्या भी बहुत खूबसूरत लगी हैं। कुल मिलाकर फिल्म दिल को छूती हैं। लेकिन कहीं-कहीं बोर भी करती हैं जिसे निगलेक्ट किया जा सकता हैं।
– संजय एम. तराणेकर




