
Newdelhi : नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की पहल से विपक्ष के हाथ पांव फूल रहे है. नीति आयोग इस पर मंथ्रन कर रहा है. कहा जा रहा है कि एक साथ चुनाव होने से लगभग हर साल होते रहने वाले चुनाव और उस पर आनेवाले खर्च कम किया जा सकता है. साथ ही विकास कार्यों में बाधा न आकर उसमें तेजी आयेगी. लेकिन पीएम मोदी की एक देश, एक चुनाव की योजना का विरोध किया जा रहा है. इस संबंध में आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के अध्ययन के अनुसार एक देश, एक चुनाव के परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं. इसके अनुसार लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने पर विपक्ष को अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ सकता है. इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे 77 फीसद ऐसी संभावना बन सकती है कि वोटर राज्यों में भी उसी पार्टी को वोट दें, जिसके लिए उन्होंने केंद्र में वोट दिया है. इसका मतलब केंद्र के साथ राज्यों में भी एक ही पार्टी काबिज होगी. ऐसे में देश से विपक्ष का वजूद खत्म होने की संभावना बलवती होगी. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया है तो देश में हर साल औसतन छह राज्यों में चुनाव होते हैं.
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देश के संघीय ढांचे को खतरा
थिंक टैंक सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार के अनुसार इससे देश का संघीय ढांचा तबाह हो जायेगा. कहा कि लोकसभा चुनाव के कारण विधानसभा के चुनाव भी प्रभावित होंगे और यह क्षेत्रीय दलों के हितों के खिलाफ जायेंगे. साथ ही कई आलोचक एक देश, एक चुनाव’ की योजना को लोकतंत्र और देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा बता रहे हैं. उनके अनुसार ऐसा होने से किसी भी राज्य की सरकार को सत्ता से बेदखल करना आसान होगा. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी कहते हैं कि वर्ष 2019 में एक साथ चुनाव लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने में परेशानी होगी. कहा कि इस मसले पर राजनीतिक सहमति बनाना संभव नहीं लगता. देश भर में एक चुनाव कराने के लिए सरकार को संविधान में संशोधन करना पड़ेगा. संसद के साथ दो-तिहाई राज्यों की विधानसभाओं का समर्थन भी जरूरी होता है. यह सरकार के लिए आसान नहीं होगा.
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एक साथ चुनाव हों तो 45 अरब रुपए की बचत
नीति आयोग का आकलन कहता है कि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभाचुनाव एक साथ कराने पर 45 अरब का खर्च आयेगा. बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 38.7 अरब रुपए खर्च हुए थे. इस पर विचार करें तो सात अरब रुपए और खर्च कर देश भर में एक साथ चुनाव कराये जा सकते हैं. हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव में 11 अरब रुपए खर्च हुए थे. आईडीएफसी की रिपोर्ट के अनुसार हर विधानसभा चुनाव में औसतन तीन अरब रुपए खर्च होते हैं. भारत में विधानसभा चुनावों में ही लगभग 90 अरब खर्च हो जाते हैं. यानी एक साथ चुनाव हों तो देश को 45 अरब रुपए की बचत होगी.
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