Praveen Kumar
Khunti/Ranchi, 25 October : दिसंबर का महीना आते ही गांव में पानी की किल्लत होने लगती है. झरना, डोभा, जलाशय सूखने लगते है. अप्रैल-मई के महीने में गांव के पालतु पशु पानी की कमी से मरने लगते हैं. यह सिलसिला 2015 से शुरू हुआ. ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2016 में पानी के अभाव से 12 बकरियों और 2 बैलों की मौत हो गयी. वहीं गांव के लोग भी पानी के लिए त्राही-त्राही कर रहे थे.
कहां पर है गांव
खूंटी जिला के सीमा पर तांबा गांव का गोयांग टोला स्थित है. इसके बाद पश्चिम सिंहभूम के सोनुआ प्रखंड की सीमा शुरू हो जाती है. रनिया प्रखंड मुख्यालय के तांबा पंचायत के तांबा गांव का गोयांग प्रमुख टोला के रूप में जाना जाता है. यह प्रखंड मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस गांव तक पहुंचने के लिए पहाड़ों के उबड़-खाबड़ रास्ते से होकर जाना पड़ता है. 2016 में टोले के लोगों ने श्रमदान कर सड़क भी बनाया था. उन्हें आशा थी कि सड़क बनने के बाद बोरिंग करने वाली गाड़ी टोला तक आ जायेगी और पानी की किल्लत खत्म हो जायेगी.
ठंड के मौसम से ही ग्रामीणों को सताने लगता है गर्मी आने का भय
क्षेत्र में घना जंगल होने के बावजूद यहां पानी की किल्लत रहती है. गर्मी तो दूर की बात है, ठंड के मौसम में भी लोगों को भरपूर पानी नहीं मिलता. यहां इंसान तो किसी तरह अपनी जरूरतों को पूरा कर लेते हैं. वहीं बिना पानी के पशुओं की मौत हो जाती है.
बिजली के बिना तो जी रहे हैं, पर पानी-सड़क के बिना कैसे जी पाएंगे
गांव के बारे में गांव की ही एक महिला बताती हैं कि गांव में पानी, सड़क, बिजली की भारी दिक्कत है. अभी तक हमारे गांव में बिजली नहीं पहुंच पायी है. अगर सरकार हमारे गांव के लिए पीने का पानी और सड़क की व्यवस्था कर दे तो बहुत अच्छा होगा. बिजली के बिना तो हमलोग जी ही रहे हैं, और जी भी लेंगे. लेकिन पानी और सड़क के बीना रहना मुश्किल है. टूटी फूटी सड़क से हम लोग बरसों से काम चलाते आ रहे हैं. महिला ने कहा कि हमलोगों ने स्वयं सड़क भी बनाया, ताकि बोरिंग करने वाली गांडी गांव में आए और हमारी पानी की समस्या को सुलझा दे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. तीन कोशिशों के बाद भी बोरिंग की गाड़ी गांव में प्रवेश नहीं कर सकी. पिछले 10 सालों से वर्षा कम हो रही है. हमारे गांव के तालाब बड़ा परब (क्रिस्मस) के बाद से ही सूखने लगते है. जनवरी के बाद पशुओं को पानी पिलाने के लिए गांव से 8-9 किलोमीटर दूर पश्चिम सिंहभूम के सोनुआ प्रखंड में जाना पड़ता है. जहां पहाड़ से निकलने वाली पतली झरना के पानी से उनकी प्यास बुझती है. अगर हम लोग वहां तक अपने पशुओं को पानी पिलाने नहीं ले जाएं तो पानी के अभाव में वह मरने लगते हैं.
गांव के लोगों की आजीविका का साधन सिर्फ कृषि और पशुपालन
गांव के एक भी परिवार के पास रोजगार का साधान नहीं है. यहा के लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए के कृषि के साथ पशुपालन कर आर्थिक अर्थोपार्जन करते हैं. अकारण पशुओं की मौत से गांव वालों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है.
पीने का पानी भी 7 किमी चलकर लाना पड़ता है
गांव के इंटर पास 22 वर्षीय जॉनसन भेंगरा अपने गांव के बारे में बताते हैं कि गांव के लोग खेतीबाड़ी से ही अपनी आजीविका चलाते हैं. दिसंबर महीना से पानी की काफी दिक्कत हो जाती है. अपने टोले से करीब 5-7 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि गर्मियों में हम लोग को पीने के लिए पानी उस पहाड़ से लाना पड़ता है. यह क्षेत्र पश्चिम सिंहभूम का सोनुवा प्रखंड है. पिछले साल मई की शुरुआत में पावेल भेंगरा का एक बैल अब्राहम भेंगरा की 6 बकरियां, पावर नूनीया की एक बकरी, संदीप नूनीया की एक बकरी, संदीप गुड़िया की एक बकरी, मंगलू डुंगडुंग के एक बैल और 6 बकरियों की मृत्यु पानी के अभाव में हो गयी.
सड़क जर्जर, साइकिल भी चलाना मुश्किल
गांव में पहुंचने के लिए जो सड़क है उसकी हालत बहुत ही खराब है. गांव के बच्चे पढ़ाई के लिए रनिया जाते हैं. उन्हें मजबूरीवश पैदल ही जाना पड़ता है. सड़क की स्थिति जर्जर होने की वजह से गांव में साइकिल से भी चलना मुश्किल होता है. सरकारी योजना की बात करें तो अब तक 20 परिवारों को शौचालय बनाने का योजना मिली है. वहीं अभी तक सिर्फ चबूतरे का ही निर्माण किया गया है. दीवार नहीं बन पाया है. गांव वालों का कहना है कि शौचालय निर्माण के लिए बालू, ईंटा, सिमेंट आदि लगते हैं. पर इन सब सामानों को गांव तक लाने में काफी परेशानी होती है.
शौचालय तो बन रहा है, पर बिना पानी के उपयोग कैसे करेंगे
गांव में शौचालयों का निर्माण तो किया जा रहा है. लेकिन ग्रामीणों को यह चिंता सता रही है कि बिना पानी के वो शौचालयों का उपयोग कैसे करेंगे. क्योंकि गांव में तो पानी ही नहीं है.
प्रखंड मुख्यलाय में लगा चुके हैं पानी और मवेशियों को बचाने की गुहार
ग्रामीणों ने बताया कि पानी की समस्या को लेकर वर्ष 2016 अप्रैल में रनिया के बीडीओ शेखर कुमार से वे लोग मिले थे. बीडीओ गांव भी आए थे. उन्होंने गांव में पानी की समस्या को देखते हुए चापाकल लगाने की बात कही थी. लेकिन बोरिंग करने वाली गाड़ी गांव तक नहीं पहुंच पायी. गांव के लोगों ने श्रमदान कर सड़क भी बनाया, फिर भी गाड़ी गांव तक नहीं पहुंच पायी. गांववाले कहते हैं कि आज भी हम लोगों के गांव में पेयजल के साधनों का अभाव है.
गर्मी आने से पहले तैयार बकरियों को बेच देंगे
गांव के संदीप गुड़िया बताते हैं कि उनके पास 15 बकरी और 5 बैल है. यही उनके आजीविका का स्रोत है. इसी से हम खेती-बारी करते हैं और अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करते हैं. पिछले वर्ष गर्मियों में हमारी बकरी मर गयी थी. इसलिए हम कोशिश कर रहे हैं कि इस साल हम अपनी बकरी को जो तैयार हो चुका है उसे बेच दें, नहीं तो गर्मियों में फिर कुछ मवेशी मर जायेंगे.
बिजली नहीं, पानी नहीं, सड़क नहीं तो फिर हम वोट क्यों दें
गांव की महिलाएं काफी दुखी हैं. वे कहती हैं कि सरकार की विकास योजना हमारे गांव तक आज भी नहीं पहुंच पाया. ऐसे में सांसद और विधायक हम लोग क्यों चुने. पानी की समस्या से जिस कदर हम लोग जूझ रहे हैं, उससे हम लोगों ने तय किया है कि अभी आने वाली विधानसभा चुनाव में अपना वोट किसी और को देंगे. पहले जिन्हें वोट दिया वो विधायक-सांसद हमारे गांव को कभी देखने भी नहीं आये. बिजली नहीं, पानी नहीं, सड़क नहीं तो फिर हम वोट क्यों दें.
आजीविका के लिए पलायन करना बनते जा रही गांव की नियती
गांव के युवा इतवा डुंगडुंग सरकारी योजना के बारे में बताते हैं कि मनरेगा के तहत आज तक गांव में कोई काम नहीं हुआ. जॉब कार्ड रहते हुए भी हम लोगों को काम नहीं मिलता. मजबूरी में गांव के करीब 15 से 20 परिवार के लोग पलायन कर उत्तराखंड, सोनीपत, हरियाणा और राजस्थान चले गये हैं ताकि कुछ कमाई करके अपने परिवार का गुजर बसर कर सकें. पिछले साल तीन परिवारों को इंदिरा आवास मिला है. जबकि गांव के सभी परिवार बीपील के अंतर्गत आते हैं. गांव के लोगों के पास राशन कार्ड तो है लेकिन इसे लाने में पूरा दिन निकल जाता है. गांव के लोग व्यवस्था से निराश हैं लेकिन अमीद भी कायम है.
क्या कहते हैं रनिया के बीडीओ
रनिया के बीडीओ अनील कुमार मिंज से जब इस संबंध में जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि यह समस्या अभी उनकी जानकारी में नहीं आया है. उन्होंने कहा कि जल्द ही गोयांग टोला की समस्या का समाधान करेंगे. वहीं, पूर्व बीडीओ शेखर कुमार ने कहा कि गांव में पेयजल की समस्या थी. पशु भी गर्मीयों में मरते थे. हमने समस्या दूर करने की कोशिश की थी. इसके लिए मुखिया को भी कहा था. आज तक समस्या हल नहीं हुई. अब मेरा ट्रांसफर हो चुका है. मैं दूसरे स्थान पर पदस्थापित हूं, फिर भी मैं गांव की समस्या दूर करने की पुन: प्रसास करूगां.




