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आरटीआई के आवेदनों को निरस्त करने में सबसे आगे हैं देश के सरकारी बैंक

News Wing Desk

जहां एक ओर स्वीडन, कनाडा, फ्रास ,मैक्सिको के बाद भारत में भी पारदर्शिता युक्त शासन व्यवस्था और भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने के लिए 12 मई 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 संसद में पास कर लागू किया गया, वहीं देश के सरकारी बैंक सूचना अधिकार के आवेदन को खारिज करने में आगे हैं. यह खुलासा सीएचआरआई के हाल ही में जारी शोध-अध्ययन रिपोर्ट से हुआ है. सीएचआरआई ने अपने शोध-अध्ययन में केंद्रीय सूचना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट (2016-17) के आंकड़ों को बेस बनाया है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016-17 में आरटीआई का आवेदन निरस्त या खारिज करने में सबसे आगे स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद है, इस बैंक ने रिकॉर्ड 71 प्रतिशत आरटीआई आवेदन को खारिज कर दिया है. वहीं दूसरे स्थान पर आरटीआई के आवेदन को निरस्त करने में  ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स है. इस बैक के से मांगी गई सूचना में से आधे आवेदन को खारिज करने का काम 2016-17 में किया है. रिपोर्ट में आरटीआई के आवेदन को खारिज करने के मामले में तीसरे स्थान पर कार्पोरेशन बैंक है जिसने अपने यहां कुल मांगी गई सूचना के आवेदन में से 47 प्रतिशत से अधिक आवेदन को खारिज किया. सरकारी बैकों में आरटीआई के आवेदन को खारिज करने में  देना बैंक और केनरा बैंक ने भी 40 प्रतिशत के आंकड़े को छुआ है. वही पंजाब नेशनल बैक ने भी 2016-17 में आरटीआई के तहत आए आवेदनों में से 30 प्रतिशत को खारिज किया….

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25 बैंकों को मिले 73 हजार आरटीआई के आवेदन

सीएचआरआई के एक शोध-अध्ययन के मुताबिक साल 2016-17 में सरकारी क्षेत्र के 25 बैंकों को सूचना का अधिकार के तहत लगभग 73 हजार नये आवेदन मिले, वहीं देश के केन्द्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को लगभग 13 हजार मिले. जबकि अन्य सरकारी बैकों में आरटीआइ के तहत मिले आवेदनों को खारिज करने का 33 हजार के आस पास रहा. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार के अधीन रहने वाले संस्थानों की तुलना में सरकारी बैक आरटीआई के आवेदन को खारिज करने के मामले में सबसे आगे रहे.

आरटीआई के आवेदन को निपटाने का बोझ भी नहीं है बैंको पर

जहां देश के सरकारी बैंक एक ओर एनपीए के बोझ से खोखले होते जा रहे हैं, वहीं ऐसे सवाल पर सूचना मांगने से संबंधित आवेदनों से बैक बचने की भी कोशिश कर रहे हैं. बैंको से कभी-कभी ही सूचना मांगी जाती है. वहीं इस बात का भी खुलासा सीएचआरआई के अध्ययन से हुआ है कि 2016-17 में किस बैक में कितने आवेदन आये. इनमें से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में (1.39 फीसदी), स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर तथा पंजाब नेशनल में (1.25 फीसदी) आरटीआई के आवेदन इन तीन बैकों में हर शाखा को 2016-17 में औसतन एक से ज्यादा आरटीआई के तहत आवेदन मिले. वही आंकाड़ो के विश्लेषण से रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि सरकारी बैंकों की शाखाओं में 2016-17 में औसतन 1 या उससे कम आरटीआई आवेदन का ही निपटारा किया गया.

बैंकों ने आवेदन को किस कानून और किस श्रेणी के तहत खरिज किया

सीएचआरआई की रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने कुल 6625 अर्जियों को अन्य की श्रेणी के अंतर्गत खारिज किया है जबकि 6616 अर्जियों को सूचना का अधिकार अधिनियम के सेक्शन 8(1) (i) के अंतर्गत निरस्त किया गया है. यह सेक्शन व्यक्तिगत सूचनाओं तथा निजता की हिफाजत से संबंधित है. आरबीआई ने साल 2016-17 में आधे से ज्यादा (57 फीसदी) आरटीआई अर्जियों को अन्य की श्रेणी के अंतर्गत खारिज किया है.

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आरटीआइ के आवेदन खारिज करने पर सीएचआरआई की आपत्ति

सीएचआरआई ने अपने शोध-अध्ययन में अर्जियों को खारिज करने के तरीके पर भी सवाल उठाये हैं. रिजर्ब बैंक सहित ज्यादातर सरकारी बैकों ने आरटीआई की अर्जियों को खारिज करने की वजह बताते हुए ‘अन्य‘ शब्द का प्रयोग किया है जबकि यह ‘अन्य‘  शब्द कहीं परिभाषित नहीं है. वहीं कानून में  आरटीआई की अर्जियों को खारिज करने के लिए सूचना अधिकार अधिनियम के सेक्शन 8, 9, 11, तथा 24 में व्यवस्था दी गई है.

किस देश में सूचना का अधिकार कानून कब से है लागू ?

विश्व में सबसे पहले स्वीडन ने सूचना का अधिकार कानून 1766 में लागू किया, जबकि कनाडा ने 1982, फ्रांस ने 1978, मैक्सिको ने 2002 तथा भारत ने 2005 में लागू किया. विश्व में स्वीडन पहला ऐसा देश है, जिसके संविधान में सूचना की स्वतंत्रता प्रदान की है, इस मामले में कनाडा, फ्रांस, मैक्सिको तथा भारत क संविधान उतनी आज़ादी प्रदान नहीं करता.

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