
Ranchi : अब वह दिन दूर नहीं है, जब गिद्धों के बारे में बच्चों को सिर्फ कहानियों के बारे में सुनने को मिलेगा. क्योंकि पर्यावरण के रक्षक के रूप में पहचानी जाने वाली गिद्ध प्रजाति संरक्षण के अभाव में पूरे देश से समाप्ती की कगार पर है. एक अनुमान के मुताबिक 40 साल पहले जहां देश में लगभग चार करोड़ गिद्ध थे, वो अब चार लाख भी नहीं बचे हैं. देश में गिद्ध की संख्या को देखते हुए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय कई योजनाओं पर काम कर रही है. इसके तहत झारखंड में भी गिद्ध संरक्षण की योजना पर वन विभाग की ओर से काम किया जा रहा है. इसके तहत राज्य का पहला गिद्ध प्रजनन केंद्र रांची से 30 किमी की दूरी पर मुटा में बनाया गया है. लेकिन इस दिशा में की गई विभागीय पहल आज भी पूरा नहीं हो सकी है. इस वजह से गिद्ध प्रजनन केन्द्र शुरू नहीं किया जा सका है.
गिद्धों की मौत की मुख्य वजह पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनेक है. पशुओं के उपचार में डाइक्लोफेनेक दवा के इस्तेमाल पर सरकार की ओर से प्रतिबंध लगा हुआ है. लेकिन विडंबना यह है कि देश में आज भी पालतू पशुओं के उपचार के लिये प्रतिबंधित दवाओं का ही इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है. जिससे पालतू पशुओं के शव के सेवन से गिद्धों के शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने लगती है. जिससे इस तरह के मांस के सेवन से गिद्धों के किडनी पर असर पड़ता है. वहीं इस मामले के जानकारों के अनुसार डाइक्लोफेनेक की वजह से ही देशभर से 99 फीसदी गिद्ध विलुप्त हो चुके हैं.
Pravin Kumar
Ranchi : अब वह दिन दूर नहीं है, जब गिद्धों के बारे में बच्चों को सिर्फ कहानियों के बारे में सुनने को मिलेगा. क्योंकि पर्यावरण के रक्षक के रूप में पहचानी जाने वाली गिद्ध प्रजाति संरक्षण के अभाव में पूरे देश से समाप्ती की कगार पर है. एक अनुमान के मुताबिक 40 साल पहले जहां देश में लगभग चार करोड़ गिद्ध थे, वो अब चार लाख भी नहीं बचे हैं. देश में गिद्ध की संख्या को देखते हुए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय कई योजनाओं पर काम कर रही है. इसके तहत झारखंड में भी गिद्ध संरक्षण की योजना पर वन विभाग की ओर से काम किया जा रहा है. इसके तहत राज्य का पहला गिद्ध प्रजनन केंद्र रांची से 30 किमी की दूरी पर मुटा में बनाया गया है. लेकिन इस दिशा में की गई विभागीय पहल आज भी पूरा नहीं हो सकी है. इस वजह से गिद्ध प्रजनन केन्द्र शुरू नहीं किया जा सका है.
इसे भी पढ़ें – मानवता हुई शर्मसार : डायन के आरोप में दो महिलाओं का सिर मुंडाकर पूरे गांव में घुमाया, मल-मूत्र भी पिलाया
क्या है वन विभाग का कार्यक्रम
वनसंरक्षक कमलेश पांडे बताते हैं गिद्धों को यहां रखने के लिए तमाम तरह की व्यवस्था कर ली गयी है. सभी तरह का ढांचागत सुविधा भी तैयार किया जा चुका है. इसके तहत कॉलोनी अवेरी, कैरनडायन अवेरी, हॉस्पिटल अवरी, नर्सरी अवरी का निर्माण भी हो चुका है. जिसमें 400 फीट की कॉलोनी अवरी का निर्माण भी कराया गया है. वहीं विभाग ने केन्दीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से गिद्ध लाने की सहमती भी ले ली है.
इसे भी पढ़ें – बैंगलुरु के बिजनेसमैन हरि प्रसाद एसवी का दावाः 2016 में ही पीएमओ को दी थी नीरव मोदी की गड़बड़ियों की जानकारी
क्यों हो रही परियोजना शुरू करने में देरी

गिद्ध प्रजनन के शुरू करने के लिए बनायी गयी परियोना का अनुमोदन अब तक नहीं किया जा सका है. जबकि पिछले 4 महीने से विभाग के मंत्री के पास फाइल पड़ी हुई है. सरकार के अनुमोदन के बाद पीसीसीएफ और बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सेंटर के बीच एमओयू किया जाना है. इसके बाद राज्य में गिद्ध प्रजनन केन्द्र का कार्य शुरू हो पायेगा. इस पूरे कार्यक्रम में कितना समय लगेगा, इसपर विभाग के अधिकारी भी कुछ कहने तैयार नहीं हैं.
देश में गिद्ध संरक्षण के लिए 2012-13 में आठ केन्द्र को चिह्ति किया गया था
देश में गिद्ध के सरंक्षण की दिशा में हरियाणा में पहले प्रजनन केन्द्र की स्थापना की गयी थी. हरियाणा में गिद्ध सरंक्षण की दिशा में बेहतर परिणाम आने के बाद असम और पश्चिम बंगाल में गिद्ध प्रजनन केन्द्र बनाये गये. 2012-13 में झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश और गुजरात में भी प्रजनन केन्द्र शुरू करने की योजना पर काम किया जा रहा है. जिसमें ओडिशा और झारखंड का सेन्टर शुरू नहीं किया जा सका है.
इसे भी पढ़ें – कांग्रेस व केजरीवाल का आरोप, पीएनबी का 11,300 करोड़ लूटने वाला नीरव मोदी दावोस में पीएम नरेंद्र मोदी के साथ था
देश में गिद्धों की संख्या कम होने की वजह

गिद्धों की मौत की मुख्य वजह पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनेक है. पशुओं के उपचार में डाइक्लोफेनेक दवा के इस्तेमाल पर सरकार की ओर से प्रतिबंध लगा हुआ है. लेकिन विडंबना यह है कि देश में आज भी पालतू पशुओं के उपचार के लिये प्रतिबंधित दवाओं का ही इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है. जिससे पालतू पशुओं के शव के सेवन से गिद्धों के शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने लगती है. जिससे इस तरह के मांस के सेवन से गिद्धों के किडनी पर असर पड़ता है. वहीं इस मामले के जानकारों के अनुसार डाइक्लोफेनेक की वजह से ही देशभर से 99 फीसदी गिद्ध विलुप्त हो चुके हैं.
इसे भी पढ़ें – डीजीपी साहेब देखिए, आपकी तरह आपके जवान भी गले में सांप लटका कर कानून तोड़ने लगे हैं…
देश में गिद्धों की सरंक्षण नीति
भारत सरकार ने गिद्धों के प्रजनन के लिये बहुर्मुखी योजना कार्यान्वित की है. जिसके तहत एक्ससीटू संरक्षण कार्यक्रम में जंगलों में गिद्धों की जनसंख्या साल 2030 तक स्वत: स्थापित करने की है. इसके पहले चरण में कैप्टिव ब्रीडिंग (संरक्षित प्रजनन) द्वारा गिद्ध जनसंख्या बढ़ाने का प्रस्ताव है. साथ ही दूसरे चरण में इन गिद्धों को सुरक्षित प्राकृतिक महौल में पुन: स्थापित करने का भारत सरकार की योजना है. सरकार ने वैसे इलाकों को चिन्हित भी किया है, जहां गिद्धों की प्राकृतिक आबादी को बढ़ने में सहायक हो. साथ ही नये गिद्ध सुरक्षित माहौल में जन्म ले सकें. ऐसे क्षेत्रों के आस-पास डाइक्लोफेनेक मुक्त भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करके उन्हें गिद्धों के लिए सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है.
न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.




