रांची: झारखंड में राष्ट्रपति शासन के छह माह का कार्यकाल 18 जुलाई को पूरा होने जा रहा है। विधानसभा निलंबित है। कांग्रेस और झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) छोड़ बाकी दल विधानसभा भंगकर नए चुनाव की मांग कर रहे हैं। जबकि इस दौरान कांग्रेस (प्रदेश) और झामुमो मिलकर सरकार बनाने की लगातार जुगत लगाते रहे।
सफलता इसलिए नहीं मिली क्योंकि कांग्रेस आलाकमान ही इस मांग को नजरंदाज करता रहा। लेकिन, अब राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी ने एक बार फिर सभी दलों का ध्यान 2014 के आम चुनाव की ओर खींचा है। भाजपा ने जहां नरेंद्र मोदी को चुनावी रण का नेतृत्व सौंपा वहीं कांग्रेस भी अब तेजी दिखाने लग गई है। इसी क्रम में कांग्रेस ने झारखंड पर अपनी नजरें इनायत की है। 2014 के चुनाव को मद्देनजर कांग्रेस को झारखंड से लोकसभा सीटों में इजाफा की संभावना दिख रही है। खासकर, उस वक्त से जबसे झामुमो ने भाजपा से नाता तोड़कर अर्जुन मुंडा सरकार गिरायी। ऐसे में, कांग्रेस एक बार फिर झामुमो से पुरानी दोस्ती दोहराने की फिराक में है। लेकिन, उससे पहले झामुमो की मुराद पूरी करने की शर्त भी सामने है। यानी, झारखंड में कांग्रेस-झामुमो गंठजोड़ की नई सरकार। और वह भी बिना चुनाव कराये। चंद रोज पहले कांग्रेस आलाकमान ने इसी मसले पर अपने सिपाहसालारों के साथ बैठक कर झारखंड में ‘संभावना’ तलाशने का असाइनमेंट दिया है। और इसी के साथ एक बार फिर झारखंड में सरकार बनाने की चहलकदमी शुरू हुई है। कांग्रेस के केंद्रीय और क्षेत्रीय नेता झामुमो के संपर्क में हैं, और झामुमो.. सरकार की संभावना को देखते – ‘दिखाते’ हुए निर्दलीय विधायकों की जोड़तोड़ में जुट गया है। इस नई सरकार की संभावना पर भाजपा सहित दूसरे क्षेत्रीय दलों में भी बेचैनी है। हालांकि इन्होंने नए चुनाव की जिद लगा रखी है। इस हालिया घटनाक्रम पर झाविमो (झारखंड विकास मोर्चा) अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी की तीखी प्रतिक्रिया आयी है। आप भी सुनिये क्या कहते हैं बाबूलाल.. ‘ये लोग लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं। जंगल में जो उग्रवादी हैं वे तो लोकतंत्र को मानते ही नहीं हैं, इसलिए रोज हिंसा करते हैं। और ‘ये सब’ तो संविधान की शपथ लेते हैं और फिर भी लोकतंत्र की हत्या करते हैं। ऐसी हालत में लोकतंत्र कैसे बचेगा! जब झारखंड विधानसभा में किसी दल को कोई बहुमत नहीं है फिर जबरदस्ती सरकार बनाने के लिए यह खरीद फरोख्त, सौदेबाजी.. पिछले दस वर्षों में राज्य को इस हालत (बदहाली) तक पहुंचा दिया। कांग्रेस और कहां ले जाना चाहती है..?.. कांग्रेस और बीजेपी?!.. इस मामले में ये दोनों ही एक दूसरे से पीछे नहीं हैं। राज्यहित में सरकार बने तो बात समझी जा सकती है लेकिन अबतक ये लोग जिस तरह सरकार बनाते रहे हैं, वह राज्यहित में नहीं, बल्कि व्यक्तिहित सरकारें बनाते रहे.. चाहे वह मधु कोड़ा की सरकार रही हो, या अर्जुन मुंडा की अथवा शिबू सोरेन की। यहां की समस्याओं का कहीं कोई समाधान नहीं हुआ। न लॉ एंड ऑर्डर ठीक हुआ न कोई डेवेलॉप्मेंट हुआ। हां, इन लोगों के राज में, सत्ता के लोगों ने पैसे जरूर कमाये.. इसलिए आज इस प्रदेश में अफसर भी बेलगाम हो चुके हैं। थाने से लेकर जिला तक के सभी अफसर ‘जमीन’ की बढ़ोत्तरी में लगे हुए हैं।’




