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आधुनिक मुंबई भी चुनावों में जाति एवं भाषाई समीकरण से अछूती नहीं : राजनीति विश्लेषक

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Mumbai :  मुंबई भले ही भारत की आर्थिक राजधानी हो और विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं एवं फैशन का केंद्र हो लेकिन मतदान की इसकी पद्धति की जड़ें अब भी देश के अन्य हिस्सों की ही तरह जाति एवं भाषाई विमर्श के ईर्द-गिर्द घूमती है.

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अपने-अपने ग्रामीण क्षेत्र का यहां प्रतिनिधित्व करते हैं

भाजपा, कांग्रेस, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और अन्य राजनीतिक दलों के महानगर में कई गढ़ हैं. जिनमें से कई गढ़ ऐसे हैं, जहां विभिन्न गांवों के लोग आकर बसे हुए हैं. जो अपने-अपने ग्रामीण क्षेत्र का यहां प्रतिनिधित्व करते हैं. भाषा का भी यहां महत्व है. क्योंकि मराठी भाषी लोगों के लिए महाराष्ट्र राज्य बनाने के आंदोलन में यह शहर केंद्र में था. इससे पहले महाराष्ट्र बंबई राज्य था, जिसमें मौजूदा गुजरात के भी कुछ हिस्से थे.

भाषाई राजनीति का प्रवेश हो गया

थिंक टैंक ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ के सुधींद्र कुलकर्णी ने कहा, “शहर के अस्तित्व में आने के बाद से इसके मतदाताओं का अपना एक चरित्र रहा है. जिसमें जाति एवं धर्म की सीमित भूमिका है. हालांकि हाल में कुछ मोड़ आए हैं और भाषाई राजनीति का प्रवेश हो गया.’’

उन्होंने राज ठाकरे नीत महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का उदाहरण दिया. जिन्होंने मराठी भाषी एवं गैर मराठी भाषी समुदायों के आधार पर एक सख्त अभियान चलाया. यह अभियान महानगर में उत्तर भारत के राज्यों से आने वाले प्रवासियों की आमद के आस-पास केंद्रित था.

कुलकर्णी ने कहा, “शुक्र है कि बॉलीवुड जो विश्व के लिए भारत का पहचान पत्र है, वह ऐसी विभाजनकारी राजनीति से प्रभावित नहीं है. इसने सुनील दत्त जैसे लोक प्रतिनिधि दिए जिन्होंने सभी तरह के मतदाताओं का भरोसा जीता.”

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 मुंबई में भी समुदाय आधारित इलाके बना लिए हैं

पत्रकार से नेता बने संजय निरुपम के विचार में मुंबई के ज्यादातर लोग ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले प्रवासी हैं. शहर से लोकसभा के पूर्व सदस्य निरुपम ने कहा, “ये प्रवासी अब भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं. इसलिए उन्होंने साथ के साथ मुंबई में भी समुदाय आधारित इलाके बना लिए हैं. जैसे कि हमें यहां जैन, मारवाड़ी, उत्तर भारतीय, सिंधी और गुजराती समूह मिलते हैं. ये समूह सामूहिक विवेक विकसित करते हैं जो उन्हें समूह के बेहतरी के लिए प्रेरित करता है.”

मतदाताओं को लुभाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं

बंबई उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एवं जनता दल (एस) के राष्ट्रीय महासचिव न्यायमूर्ति बी जी कोलसे-पाटिल (सेवानिवृत्त) ने कहा कि जीतने की क्षमता पार्टियों के लिए मुख्य कारक है. न्यायमूर्ति पाटिल (सेवानिवृत्त) ने कहा, “मुंबई जैसा महानगर हो या कोई अन्य शहर, सभी पार्टियां एवं उम्मीदवार अपनी राजनीति आगे बढ़ाने के लिए जाति एवं समुदाय को भुनाते हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. वे मतदाताओं को लुभाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.”

पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं ने भी इनमें से कई की बात से इत्तेफाक रखा और कहा कि उनकी पार्टियों ने जाति, समुदाय एवं भाषा के आधार पर संबंधित उम्मीदवार के लिए प्रचार करने के निर्देश दिए हुए हैं. धर्म, जाति एवं भाषा आदि के आधार पर प्रचार करना प्रतिबंधित है। अतिरिक्त मुख्य चुनाव अधिकारी दिलीप शिंदे ने कहा है कि अगर ऐसी किसी घटना की जानकारी मिलती है तो चुनाव आयोग का प्रवर्तन विभाग सख्त कार्रवाई करेगा.

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