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Islamabad, 04 December : पाकिस्तान की सरकार और इस्लामवादी प्रदर्शनों के नेताओं के बीच हुए समझौते की वैधानिकता पर इस्लामाबाद हाइकोर्ट ने आज सवाल उठाए. कहा कि किसी भी शर्त को कानूनन सही नहीं ठहराया जा सकता. पिछले महीने धार्मिक समूहों तहरीक-ए-खत्म-ए-नबुव्वत, तहरीक-ए-लबैक या रसूल अल्लाह और सुन्नी तहरीक पाकिस्तान के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया था.
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हफ्तेभर तक चले प्रदर्शन ने राजधानी को ठप्प कर दिया था. इसके बाद सरकार और तहरीक ए लबैक या रसूल अल्लाह के नेताओं के बीच 26 नवंबर को एक समझौता हुआ जिसमें सरकार ने संगठन की मांगें मान ली. इसमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी मामले हटाने की मांग भी शामिल थी. डॉन न्यूज के मुताबिक राजधानी में हाल में हुए धरने प्रदर्शन से संबंधित मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अजीज सिद्दीकी ने पूछा, ‘‘आतंकवाद संबंधी कानून के तहत दर्ज मामले निरस्त कैसे किए जा सकते हैं?’’ इस्लामाबाद हाइकोर्ट ने समझौते की शर्तों पर कई गंभीर आपत्तियां जताई और प्रदर्शनकारियों के साथ हुए समझौते में सेना की भूमिका पर भी नाराजगी जताई.
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हाइकोर्ट ने पूछा,‘‘ मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाली सेना कौन होती है? किस कानून में मेजर जनरल को यह भूमिका दी गई है?’’ हाइकोर्ट ने कहा कि समझौते की वैधानिकता पर संसद के संयुक्त सत्र में चर्चा होनी चाहिए. इस पर पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल अश्तर औसाफ ने बातचीत में सेना की मध्यस्थ के रूप में भूमिका की कानूनी स्थिति तय करने के लिए कुछ और वक्त देने का अनुरोध किया.




