|| श्रीनिवास ||
आखिरकार वर्ष 1993 के मुंबई सीरियल बम विस्फोट मामले में अंतिम, यानी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। सुप्रीम कोर्ट ने यायूब मेनन की फांसी की सजा को बरकरार रखते हुए दस अन्य लोगों को टाडा कोर्ट से मिली मृत्यु दंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। मगर वे मृत्यु पर्यंत जेल में रहेंगे। अशर्फुल रहमान अजिमुल्ला की उम्रकैद को दस वर्ष में तब्दील कर दिया, जबकि इम्तियाज घावटे को बरी कर दिया। लेकिन मीडिया में इन सबके बजाय सिने अभिनेता संजय दत्त छाये हुए हैं। उनकी ख्याति को देखते हुए यह एक हद तक तो स्वाभाविक है, मगर इस कारण इस मामले से जुड़े अन्य तमाम मुद्दे गौण हो गये हैं।
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘खलनायक’ से ‘गांधीगिरी’ करनेवाले ‘मुन्ना भाई’ बने श्री दत्त को मिली छह साल कारावास की सजा को कम कर पांच साल कर दिया। इसमें से वे 18 माह जेल में बिता चुके हैं, यानी अब भी उन्हें डेढ़ साल जेल में बिताने होंगे। अब पूरी बहस इस पर हो रही है कि क्या संजय दत्त दया के हकदार हैं? क्या उनके देश और समाज के प्रति उनके परिवार, खास कर पिता सुनील दत्त के योगदान और उनमें आये बदलाव को देखते हुए उनकी बाकी बची सजा को माफ कर दिया जाना चाहिए? हालांकि उनके प्रशंसक और समर्थक भी इस बात से इनकार नहीं कर रहे कि संजय दत्त पर को जिन आरोप के आधार पर सजा हुई है, वे कहीं से गलत हैं। बेशक शायद ही कोई उन्हें सही मायनों में अपराधी या मानता होगा। मगर उनके बारे में जो जानकारी समने आती रही है, उससे तो यही पता चलता है कि किन्हीं कारणों से वे किशोरावस्था से ही गलत संगत में पड़ गये थे। फिल्मी चकाचौंध और आसानी से हासिल दौलत व प्रसिद्धि को वे पचा नहीं पाये। उनके पिता ने उन्हें बड़ी मेहनत से नशेबाजी की गिरफ्त से मुक्त कराया। मगर बाद में भी अंडर वर्ल्ड के लोगों से उनका संपर्क कायम रहा। हालांकि सच यह भी है कि 1992 के दंगों और ’93 के विस्फोटों से पहले तक मुंबई के बहुतेरे फिल्मी सितारों का रिश्ता दुबई में बैठे दाऊद इब्राहीम आदि अपराधी सरगनाओं से बना हुआ था और वे इसे छिपाते भी नहीं थे। यह भी कहा जा सकता है कि दिसंबर ’92 में मुंबई में हुए दंगों के दौरान, जब राज्य सरकार नागरिकों की सुरक्षा में अक्षम साबित हो रही थी; या कहें कि उसने लोगों को दंगाइयों के रहमो करम पर छोड़ दिया था, संजय दत्त ने दहशत में आकर अपने अंडर वर्ल्ड संपर्क के माध्यम से घातक हथियार जुटा लिये होंगे। मगर उन्हें ये हथियार उन्हीं लोगों ने मुहैया कराये, जो मुंबई में बम विस्फोट कर दहशत फैलाने की साजिश रच रहे थे। और उन्हें अच्छी तरह पता था कि वे जो कुछ कर रहे हैं, वह गैरकानूनी और अपराध है। तभी तो पकड़े जाने के भय से, बजाय पुलिस के समाने सच स्वीकार कर लेने के उन्होंने उन हथियारों के पहले छिपाने और फिर नष्ट करने का प्रयास किया। जाहिर है, जाने आ अनजाने उन्होंने जो गलती की, आज उसी कर प्रतिफल उन्हें भ्ाुगतना पड़ रहा है। इस लिहाज से भारतीय अदालतों ने एक सेलेब्रिटी को सजा देकर एक अच्छी मिसाल पेश की है। मगर यहां मामला सिर्फ संजय दत्त का नहीं है, देश की व्यापारिक राजधानी को दहला देनेवाली एक बड़ी आपराधिक के दोषियों को सजा देने में हुई देरी का भी है। यह बात तो सामने आ ही चुकी है कि पुलिस ने अनेक ऐसे लोगों को आतंकवादी बता कर जेल में डाल दिया, जिन्हें अदालत ने निरपराध मान कर छोड़ दिया।
इस फैसले को कुछ लोग ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ कह रहे हैं, तो कुछ की नजर में इससे भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति आम आदमी का भरोसा मजबूत होगा। लेकिन न्याय शास्त्र की ही एक मान्यता है, जिसके अनुसार देर से मिला/हुआ न्याय, दरअसल न्याय की अवहेलना है; और इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है। पूरी न्यायिक प्रक्रिया और सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जिन लोगों को दोषी करार दिया, उनके बचाव में कुछ कहने का अब कोई अर्थ नहीं है, लेकिन जिस एक अभियुक्त इम्तियाज घावटे को अदालत ने बरी कर दिया, वह बीते लगभग बीस साल से सलाखों के पीछे क्यों रहना पड़ा और इसके लिए किसे या किन्हें जवाबदेह ठहराया जाये, क्या यह विचार का मुद्दा नहीं होना चाहिए? जिन लोगों की सजा घटा कर दस साल कर दी गयी और दस के बजाय बीस साल जेल में बिता चुके हैं, क्या यह गंभीर मामला नहीं है? एक टीवी चैलल पर हुई बहस में बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट की वरीय अधिवक्ता गीता लूथरा ने बताया और ठीक ही कहा कि अनेक प्रजातांत्रिक देशों में इतने समय तक होनेवाली सुनवाई को गैरकानूनी माना जाता है। इस मान्यता के अनुसार तो इस फैसले का कोई नैतिक व न्यायिक औचित्य ही नहीं रहता है। इस आधार पर इस ‘विलंबित न्याय’ को दरअसल अधूरा न्याय या न्याय की अवहेलना ही कहा जाना चाहिए।




